सकीना का काम कान देखना था।

वह पशु सहायक थी। गाभिन कराना, टीका लगाना, और महीने की रिपोर्ट भरना। रिपोर्ट में हर जानवर का टैग नंबर लिखना होता है।

टैग कान में लगता है। पीला, प्लास्टिक का, और उस पर बारह अंक छपे रहते हैं। वही जानवर की पहचान है।

बीस बरस में सकीना ने उस इलाक़े के लगभग हर जानवर का कान देखा था।

उसका इलाक़ा चार गाँवों का था और उसमें लगभग नौ सौ बड़े जानवर थे। सबके नंबर उसे याद नहीं थे और याद रखने की ज़रूरत भी नहीं थी, क्योंकि नंबर रजिस्टर में रहता है। जो उसे याद रहता था वह कान था, जैसे लोगों को चेहरे याद रहते हैं।

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इस काम में एक और चीज़ है जो बाहर से नहीं दिखती। पशु सहायक हर घर के भीतर तक जाती है, बार-बार, बरसों तक, और जानवर के मामले में झूठ बोलना मुश्किल है क्योंकि जानवर सामने खड़ा रहता है।

टैग गिरते भी हैं। कान में खुजली होती है, जानवर खूँटे से रगड़ता है, और टैग निकल आता है। तब कान में एक छोटा गोल छेद रह जाता है, जो साफ़ होता है और किनारे से चिकना।

टैग खींचकर निकाला जाए तो छेद नहीं रहता। कान का किनारा फट जाता है।

यह फ़र्क़ देखने में एक सेकंड लगता है।

पूस में उसे रामरतन के घर बुलाया गया। एक भैंस गाभिन करानी थी।

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वहाँ चार जानवर थे। तीन उसके देखे हुए थे। चौथी नई थी।

नई भैंस के बाएँ कान का किनारा फटा हुआ था और वह फटन भर चुकी थी।

सकीना ने उस पर कोई बात नहीं छेड़ी और अपना काम कर दिया।

पूछने का कोई फ़ायदा भी नहीं था। कान कई तरह से फटता है। खूँटे में उलझ जाए तो फटता है। कुत्ता पकड़ ले तो फटता है। दूसरे जानवर की सींग लग जाए तो फटता है। इन सबका जवाब मौजूद रहता है और उनमें से कोई भी सच हो सकता है।

जो चीज़ जवाब से नहीं ढकती, वह गिनती है।

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घर आकर उसने अपनी पिछली रिपोर्टें निकालीं।

रामरतन के घर का दूध विभाग की डेयरी में जाता है और उसका हिसाब भी उसी रजिस्टर में चलता है, क्योंकि गाभिन का काम दूध के हिसाब से ही तय होता है।

अगहन में उस घर का दूध बत्तीस लीटर रोज़ था। पूस में इक्यावन।

बीच में उस घर में कोई जानवर ब्याया नहीं था।

दूध अपने आप नहीं बढ़ता। भैंस ब्याने के बाद ही दूध देती है और यह हिसाब बदला नहीं जा सकता।

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तो इक्कीस लीटर कहीं और से आ रहे थे।

इक्कीस लीटर एक अच्छी भैंस का पूरा दूध होता है। यानी वह भैंस दूध देने वाली थी और हाल में ब्याई हुई थी, और ऐसी भैंस कोई बेचता नहीं। जो बेचता है, वह मजबूरी में बेचता है, और तब वह मोल-भाव में गाँव भर को पता चल जाता है।

इस भैंस के आने का किसी को पता नहीं था। सकीना ने यह दो घरों में बात करके देख लिया, बिना कुछ पूछे।

सकीना के सामने अब वही चीज़ थी जो इस काम में हमेशा आती है।

रामरतन का घर उसका अपना गाँव है। उसने उस घर की तीन पीढ़ियों के जानवर देखे हैं। उसने उनकी पहली भैंस के पहले बच्चे को अपने हाथ से खींचा था, अठारह बरस पहले, रात में, और उस रात का ज़िक्र वह घर आज भी करता है।

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रिपोर्ट में वह भैंस बिना टैग के दर्ज नहीं की जा सकती। और बिना टैग वाले जानवर की सूचना ऊपर जाती है।

उसने सूचना दे दी।

जो हुआ वह इतना ही हुआ। एक आदमी आया, उसने देखा, और उसने कहा कि टैग दोबारा लगवा लो। नया टैग लगा और नया नंबर चढ़ गया।

कोई पूछताछ नहीं हुई। बिना टैग की भैंस चोरी की भैंस नहीं मानी जाती। साबित करने के लिए पुरानी पहचान चाहिए और वह उसी टैग में थी जो निकाल दिया गया था।

रामरतन के घर वालों को यह मालूम हो गया कि सूचना किसने दी।

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उन्होंने कोई शिकायत नहीं की। उस घर से बुलावा आना बंद हो गया, धीरे-धीरे, इस तरह कि उसे नाराज़गी भी नहीं कहा जा सकता। एक बार दूसरे गाँव से किसी को बुला लिया। फिर दूसरी बार।

यह उस काम की सबसे कमज़ोर जगह है। पशु सहायक की तनख़्वाह सरकारी है, पर उसका असली काम बुलावे से चलता है और हर बुलावे का अलग पैसा मिलता है। जिस घर से बुलावा बंद हो जाए, उसका असर महीने के आख़िर में दिखता है।

तीन बरस में सकीना का उस मोहल्ले का आधा काम चला गया।

अब उस बात का दूसरा हिस्सा, जो उसने सोचा नहीं था।

अगले बरस उसी गाँव में दो और जानवरों के कान फटे मिले।

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उसके अगले बरस चार।

इनमें से किसी में गड़बड़ नहीं थी। लोगों ने ख़ुद फाड़े थे।

वजह भी सीधी थी। कान का फटा किनारा एक पहचान बन जाता है, दूर से दिखने वाली, और भैंस चराने वालों के लिए यह टैग से आसान है, क्योंकि टैग पढ़ने के लिए पास जाना पड़ता है।

किसी ने किसी को यह सिखाया नहीं। एक ने देखा, दूसरे ने देखा, और तीन बरस में यह वहाँ का चलन बन गया।

अब उस इलाक़े में फटे कान वाली भैंसें बहुत हैं।

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सकीना अब भी कान देखती है। पहले वह एक सेकंड में बता देती थी। अब वह बता नहीं पाती।