राधा और मोहन का घर एक ही गली में था, दो दरवाज़े छोड़कर। दोनों साथ स्कूल जाते, साथ लौटते, और शाम को गली में तब तक खेलते जब तक कोई माँ आवाज़ न लगा देती। राधा शांत थी और सोचकर बोलती थी। मोहन पहले बोलता था और बाद में सोचता था। गाँव में लोग कहते थे कि दोनों में कुछ भी मिलता-जुलता नहीं है, और शायद इसीलिए दोनों साथ रहते हैं।
राधा के पिता की गली के नुक्कड़ पर किराने की दुकान थी। मोहन के पिता टेंपो चलाते थे, इंदौर से देवास और वापस, दिन में दो चक्कर। स्कूल तीन किलोमीटर दूर था और दोनों पैदल जाते थे, क्योंकि साइकिल एक ही थी और वह मोहन की बड़ी बहन ले जाती थी। रास्ते में एक पुलिया पड़ती थी और वहाँ वे रोज़ दो मिनट बैठते थे। दो मिनट से ज़्यादा कभी नहीं, क्योंकि राधा घड़ी देखती रहती थी।
नौवीं के बीच में मोहन के पिता का टेंपो देवास वाली सड़क पर पलट गया। वे बच गए। पर कूल्हे की हड्डी टूट गई, और डॉक्टर ने साफ़ कह दिया कि गाड़ी अब वे नहीं चला पाएँगे। घर में चार लोग थे। कमाने वाला कोई नहीं। मोहन ने स्कूल छोड़ दिया। किसी ने उससे यह करने को नहीं कहा था। एक सुबह वह बस्ता लेकर नहीं निकला, और फिर कभी नहीं निकला।
नीयत का फर्क
मोहन गैरेज में लग गया, सुबह छह बजे से रात आठ बजे तक। राधा स्कूल जाती रही। दोनों एक ही गली में रहते थे और महीनों तक उनकी बात नहीं हुई, इसलिए नहीं कि कोई नाराज़ था। मोहन तब निकलता था जब राधा सो रही होती थी, और तब लौटता था जब वह पढ़ रही होती थी। पुलिया पर अब राधा अकेली बैठती थी। दो मिनट। फिर उठकर चल देती थी।
राधा रोज़ शाम को गैरेज के सामने से निकलती थी, हालाँकि उसका घर दूसरी तरफ़ पड़ता था। वह रुकती नहीं थी। बस आवाज़ लगा देती थी, ‘मोहन।’ शुरू में मोहन जवाब देता था। फिर सिर्फ़ हाथ उठा देता था। फिर वह भी बंद हो गया। राधा तब भी रोज़ आवाज़ लगाती रही। गली में इस पर बातें हुईं और उसकी माँ ने दो बार उसे टोका। राधा ने अपना रास्ता नहीं बदला।
चार साल इसी तरह बीत गए। राधा ने बारहवीं अच्छे नंबरों से पास की। उज्जैन के कॉलेज में दाख़िला हो गया। घर में ख़ुशी थी और चिंता भी, क्योंकि हॉस्टल का ख़र्च दुकान से निकलना मुश्किल था। पिता ने दो जगह से उधार लिया। माँ ने कुछ नहीं बेचा, पर अलमारी दो बार खोली। तारीख़ तय हुई: जुलाई की पंद्रह। बारिश के ठीक बीच में, जब देवास वाली सड़क सबसे ख़राब रहती है।
जाने से एक रात पहले गली के लोग मिलने आए। मोहन नहीं आया। राधा ने उसका नाम नहीं लिया और देर तक सामान बाँधती रही। ट्रंक में जगह कम पड़ी तो उसने दो किताबें निकालकर रख दीं, फिर वापस डाल लीं, फिर निकाल दीं। नींद नहीं आई। उसने ख़ुद से कहा कि यह ट्रंक की वजह से है।
सुबह पाँच बजे पिता उसे अड्डे तक छोड़ने आए। उज्जैन की सवारी टेंपो से जाती थी और टेंपो पहले से खड़ा था। ड्राइवर की सीट पर मोहन बैठा था। राधा रुक गई। मोहन ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। ट्रंक उठाकर पीछे रखा, ऊपर से तिरपाल कसा, और गाड़ी स्टार्ट कर दी। राधा के पिता ने किराया पूछा। मोहन ने पूरा किराया बताया, एक रुपया कम नहीं।
घमंड की कीमत
रास्ते में बारिश तेज़ हो गई। सड़क पर दो जगह पानी भरा था। मोहन दोनों जगह उतरा और पैदल चलकर गहराई देखने गया, घुटनों तक कीचड़ में। राधा पीछे बैठी देखती रही। उज्जैन पहुँचने में साढ़े तीन घंटे लगे। पूरे रास्ते में उन दोनों के बीच कुल छह बातें हुईं। छहों सामान के बारे में थीं। कॉलेज के गेट पर मोहन ने ट्रंक उतारा और उसे हॉस्टल के दरवाज़े तक पहुँचा दिया, जबकि तय गेट तक का ही हुआ था।
लौटते वक़्त राधा उसके पीछे-पीछे गेट तक गई। उसे बहुत कुछ कहना था और वह सोच रही थी कि किस तरह कहे, क्योंकि वह हमेशा सोचकर बोलती थी। इतने में मोहन गाड़ी में बैठ चुका था। उसने पहली बार उसकी तरफ़ देखा और हाथ उठा दिया, वैसे ही जैसे गैरेज से उठाता था। फिर गाड़ी मोड़ ली। बहुत बाद में राधा को पता चला कि उस दिन उज्जैन की सवारी किसी और ड्राइवर की थी, और मोहन ने अपना देवास वाला चक्कर उससे बदलकर उस दिन की दिहाड़ी भी उसी को दे दी थी। राधा ने यह बात मोहन से कभी नहीं पूछी। पूछती तो वह पहले बोल देता और बाद में सोचता, और राधा को उसका वैसा जवाब नहीं चाहिए था।