पाँच बजे मुजीब छत पर चढ़ता था और जाली का दरवाज़ा खोल देता था। बाईस कबूतर एक साथ निकलते और पहले तीन चक्कर नीचे-नीचे लगाते, फिर ऊपर उठ जाते। ऊपर जाकर वे एक गोला बन जाते थे। मुजीब डंडे पर बँधा कपड़ा हिलाता रहता, गोला घूमता रहता, और शहर के दूसरे सिरे पर, क़िले की तरफ़, उसी वक़्त एक और गोला घूम रहा होता था।
वह गोला बब्बन मियाँ का था। दोनों छतों के बीच लगभग आधा किलोमीटर था और बीच में क़ुतुबख़ाना का बाज़ार पड़ता था। मुजीब ने उन्हें कभी नहीं देखा। ग्यारह साल से दोनों रोज़ शाम एक ही आसमान में अपने कबूतर उड़ा रहे थे, और आज तक कभी आमने-सामने नहीं आए थे।
नियम सीधा है। जिसकी छत पर कबूतर उतर गया, वह उसका। लौटाना ज़रूरी नहीं है और ज़्यादातर लौटाते भी नहीं, क्योंकि कबूतर पैसा है। अच्छे गिरहबाज़ के आठ सौ से लेकर कई हज़ार तक मिल जाते हैं। मंडी लगती है, ख़रीदार आते हैं, और यह कोई नहीं पूछता कि कबूतर आया कहाँ से है।
ग्यारह साल में बब्बन मियाँ के कबूतर मुजीब की छत पर उन्नीस बार उतरे। उन्नीसों बार वापस गए। मुजीब ख़ुद नहीं जाता था; जो कोई उस तरफ़ जा रहा होता, उसके हाथ भेज देता था। उधर से भी हर बार यही हुआ। बाज़ार में लोग इसे बेवक़ूफ़ी कहते थे और मुँह पर कहते थे, और मुजीब हँसकर टाल देता था क्योंकि उसके पास कोई वजह नहीं थी जो बताई जा सके।
मुजीब बेकरी में रात की पाली करता था। ग्यारह बजे से सुबह सात तक, डबलरोटी और रस्क। लौटकर सोता, दो बजे उठता, और पाँच बजे छत पर होता था। दिन का यही एक हिस्सा उसका अपना था। इसमें उसने कभी देर नहीं की।
बब्बन मियाँ के बारे में उसे उतना ही मालूम था जितना आधे किलोमीटर से मालूम हो सकता है। उनका गोला साठ का है। वे कपड़ा नहीं, सीटी इस्तेमाल करते हैं। और यह कि उनके गोले में एक कबूतरी सबसे आगे रहती है जिसके दाएँ पंख में एक सफ़ेद पर है, जिसे मोहल्ला बाँकी कहता है, और जिसके पीछे बाक़ी उनसठ मुड़ते हैं।
उस बरस मकान मालिक ने कोठरी बेच दी। नए मालिक को किराएदार से एतराज़ नहीं था, पर चालीस हज़ार जमा कराने थे, महीने भर के अंदर। उसके पास नौ हज़ार थे। पूरा गोला बेच देता तो सोलह-सत्रह हज़ार बनते, और शाम पाँच बजे के बाद उसके पास कुछ नहीं बचता।
रमज़ान से कुछ दिन पहले शाम को शिकरा आया। शिकरा तभी आता है जब गोला नीचे उतरने लगता है। उस दिन वह दोनों गोलों के बीच से निकला। दोनों गोले टूट गए। कबूतर जिधर मुँह हुआ उधर गिरे, छतों पर, मुँडेरों पर, पानी की टंकियों के पीछे। अँधेरा होते-होते मुजीब के अपने लौट आए, और जाली बंद करते वक़्त उसने देखा कि सबसे पीछे जो बैठी है, उसके दाएँ पंख में एक सफ़ेद पर है।
थका हुआ कबूतर उसी जाली में चला जाता है जिसमें बाक़ी जा रहे हों। मुजीब देर तक वहीं बैठा रहा। सौदागरान में एक ख़रीदार था जो ऐसी कबूतरी के ग्यारह हज़ार दे देता और कुछ न पूछता। नियम उसके साथ था। इस पूरे शहर में एक आदमी नहीं था जो उससे कहता कि तुमने ग़लत किया।
वह रात को सोया नहीं। सुबह बेकरी से लौटकर उसने बाँकी को टोकरी में रखा, ऊपर कपड़ा बाँधा, और ग्यारह साल में पहली बार उस तरफ़ चल दिया। बाज़ार, फिर तंग गली, फिर वह मकान जिसके बारे में उसने सिर्फ़ सुना था। सीढ़ियाँ बाहर से चढ़ती थीं।
छत पर एक नौजवान था, तेईस-चौबीस का। जालियाँ वही थीं, पर उनमें कबूतर इक्यावन बचे थे। नौजवान ने बताया कि वह आरिफ है, बब्बन मियाँ का बेटा। और यह कि बब्बन मियाँ सात महीने से छत पर नहीं आए। जाड़ों में उन्हें फ़ालिज हुआ था और अब वे नीचे वाले कमरे में रहते हैं।
मुजीब ने टोकरी खोली। आरिफ ने कबूतरी को हाथ में लिया, उलटा-पलटा और पूछा कि यह हमारी कौन-सी है। मुजीब ने उसका दायाँ पंख खोलकर सफ़ेद पर दिखाया। आरिफ ने सिर हिलाया, उसे जाली में डाल दिया और बताया कि ईद के बाद पूरा गोला बिक रहा है। छत पर कमरे बनने हैं, किराए के लिए।
उतरते हुए मुजीब ने कहा कि एक बार मिल लेता हूँ। कमरा छोटा था। उसमें दवाइयों की गंध भरी थी। बब्बन मियाँ ने उसे देखा। पहचाना नहीं। आरिफ ने नाम बताया तो उन्होंने बोलने की कोशिश की, पर ज़बान पूरी तरह साथ नहीं दे रही थी। जो एक बात वे कह पाए वह यह थी कि क्या तुम अब भी पाँच बजे उड़ाते हो।
कोठरी का पैसा उसी महीने जमा होना था। मुजीब ने अपने आठ कबूतर बड़े बाज़ार वाले को बेचे, बेकरी से दो महीने की पेशगी ली, और चालीस हज़ार पूरे कर दिए। ग्यारह हज़ार कभी नहीं मिले। शाम की उड़ान अब चौदह की थी, और छोटा गोला ऊपर कम टिकता है, यह उसे पहले से मालूम था।
बब्बन मियाँ का गोला जाड़ों में बिका। ख़रीदार सौदागरान वाला ही था और उसने पूरी छत का सौदा एक साथ किया। मुजीब उस दिन वहाँ मौजूद था और सबसे पीछे खड़ा रहा। बाँकी का भाव तीन हज़ार लगा, क्योंकि उम्र निकल चुकी थी। मुजीब ने तीन हज़ार दिए और मोल-भाव नहीं किया।
शाम को उसने उसे अपने बाक़ी कबूतरों के साथ छोड़ा। बाँकी ऊपर गई, दो चक्कर लगाए, और उतरकर उसी पुरानी छत की मुँडेर पर जा बैठी, जहाँ अब मज़दूर सरिया बाँध रहे थे। मुजीब उसे लेने गया। यह उस महीने चार बार हुआ। पाँचवीं बार वह नहीं गया, और अगली सुबह दाने के वक़्त बाँकी अपने आप उसकी जाली पर आकर बैठी थी।