मनीष सवाल बहुत पूछता था। खेत में काम करते हुए, खाना खाते हुए, सोने से पहले। उसके पिता कभी-कभी झुँझला जाते और कहते कि हर बात का जवाब नहीं होता। मनीष मान लेता और अगले दिन नया सवाल ले आता। उन सवालों में एक ऐसा था जो लौट-लौटकर आता रहा। कल जो बीत गया, वह अब कहाँ है?

उस गाँव में समय की एक चीज़ ऐसी थी जिसका जवाब सबके पास था, क्योंकि उस पर फ़सल टिकी थी। नहर का पानी बारी से मिलता है। हर खाले पर आगे-पीछे के खेत क़तार में लगे होते हैं और हर खेत का हिस्सा मिनटों में तय होता है, हफ़्ते में एक बार, चाहे दिन हो या रात। जिसकी बारी निकल गई, उसकी निकल गई।

उनकी बारी गुरुवार को रात दो बजकर दस मिनट से थी और सैंतालीस मिनट की थी। ऊपर वाले खेत से पानी उनकी तरफ़ मोड़ा जाता और सैंतालीस मिनट बाद वे नक्का बंद करके नीचे वाले को छोड़ देते। यह पिता करते थे, फिर मनीष करने लगा, क्योंकि रात दो बजे उठना जवान आदमी का काम है।

रात दो बजे खाले पर बैठना अपने आप में एक काम है। लालटेन नीचे रखनी पड़ती है, वरना रोशनी में मच्छर आते हैं। जाड़ों में ओस से कंबल भारी हो जाता है और गर्मियों में यह सोचने का मन करता है कि पानी अपने आप चलता रहेगा। पर सोना नहीं है, क्योंकि जिसकी बारी में वह सो गया, उसका पानी नीचे वाले के खेत में चला जाता है और लौटता नहीं। इसलिए आदमी जागकर बैठा रहता है और पानी की आवाज़ सुनता रहता है, जो हर आधे घंटे में थोड़ी बदल जाती है।

सवाल उसे वहीं से मिला। रात में खेत पर बैठे-बैठे करने को कुछ नहीं होता। पहली बार उसने बस यूँ ही घड़ी देख ली थी। शक जैसी कोई बात नहीं थी।

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पानी तिरपन मिनट चला।

अगले हफ़्ते उसने फिर देखा। तिरपन। उसके अगले हफ़्ते बावन। मनीष सात हफ़्ते गिनता रहा और औसत साढ़े बावन का निकला। छह मिनट ज़्यादा, हर हफ़्ते, हर बार।

उसने यह पिता को बताया, इस उम्मीद के साथ कि वे ख़ुश होंगे। छह मिनट की क़ीमत मामूली नहीं है। खाले में उस मोटाई का पानी चले तो छह मिनट में लगभग उतना निकलता है जितने से चार बीघे की एक क्यारी पूरी भर जाए, और गेहूँ में यह हर हफ़्ते का फ़र्क़ है।

पिता ने पूरी बात सुनी और फिर घड़ी माँगी। मनीष ने दे दी। उन्होंने उसे अपनी जेब में रखा और कहा कि अब इस बात को यहीं छोड़ दे।

मनीष को यह समझ नहीं आया, और वह पहली बार अपने पिता से लड़ा। बात बढ़ी और उसमें वह वाक्य निकल आया जो निकलना ही था। पिता ने कहा कि यह छह मिनट पिछले सत्ताईस साल से आ रहे हैं और वे तुम्हारे दादा के वक़्त से आ रहे हैं।

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बात यह थी कि पैमाइश में कहीं कोई ग़लती रह गई थी। किसी की चोरी नहीं थी। नक्का जिस पत्थर से नापा गया था वह अपनी जगह से खिसक चुका था, या शुरू में ही ग़लत लगा था, यह अब कोई नहीं बता सकता था। नतीजा यह था कि उनके खेत को हर हफ़्ते छह मिनट ज़्यादा मिलते थे और नीचे वाले को उतने कम।

नीचे वाला बलराम था, जिसके तीन बीघे थे और जो उसी खाले के आख़िर में पड़ता था। आख़िर में पड़ने वाले को पानी हमेशा कम लगता है, क्योंकि रास्ते में मिट्टी पीती है, और इसीलिए उसने कभी हिसाब नहीं लगाया। उसे लगता रहा कि यह ज़मीन का दोष है।

पिता जानते थे। यह उन्होंने उसी रात मान लिया, बिना बहस के। उन्हें यह उनके पिता ने बताया था, इस हिदायत के साथ कि बात यहीं रहे। सत्ताईस साल में उन्होंने इसे न बदला, न किसी से कहा। और मनीष के सवालों से वे इसीलिए झुँझलाते थे। उन्हें डर था कि लड़का किसी दिन नापने बैठ जाएगा।

अब जो करना था वह साफ़ था और उसमें कोई बड़ाई नहीं थी। पंचायत के सामने बात रखने का मतलब पिता की और दादा की बात खुलना था। चुपचाप छह मिनट पहले नक्का बंद कर देने का मतलब कुछ न कहना और नुक़सान अपने ऊपर लेना था। मनीष ने दूसरा चाहा।

पिता ने पहला किया। वे अगले इतवार बलराम के घर गए और सब बता आए, तारीख़ों समेत, और यह भी कि यह उनसे पहले से चल रहा था। बलराम ने कोई शोर नहीं मचाया। उसने पैमाइश दोबारा कराने के लिए कहा, जो कराई गई, और नया हिसाब बनने में चार महीने लगे। इन चार महीनों में गाँव में इस पर काफ़ी बात हुई और उसमें से कुछ बात अच्छी नहीं थी।

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नई बारी में उनके सैंतालीस के इकतालीस रह गए। पहले साल गेहूँ की एक क्यारी सूखी रह गई और उन्होंने उसमें चना बो दिया, जिसे कम पानी चाहिए। तीसरे साल तक खेत का हिसाब उसी के मुताबिक़ बैठ गया, और अब वे चने की एक क्यारी हर साल बोते हैं।

मनीष का वह पुराना सवाल कभी हल नहीं हुआ। कल जो बीत गया वह कहाँ जाता है, यह उसे आज तक नहीं मालूम। पर एक चीज़ उसे मालूम है और वह इतनी बारीक है कि उसे बताने पर कोई समझेगा नहीं। गुरुवार की रात नक्का उसके पिता बंद करते हैं, दो बजकर इक्यावन मिनट पर, और अब वे घड़ी नहीं देखते।