गर्मियों में गाँव की सबसे ठंडी जगह वह झील थी। पानी साफ़ था, किनारे पर घास थी, और चलकर जाने में दस मिनट लगते थे। इतनी अच्छी जगह ख़ाली पड़ी रहती थी। पूछो तो लोग सीधा जवाब नहीं देते। बस इतना कहते कि पहले जाते थे, अब नहीं जाते। कब से नहीं जाते, यह भी कोई ठीक-ठीक नहीं बता पाता था।

सुरेश को इससे कोई मतलब नहीं था। उसकी दो भैंसें थीं और गर्मियों में भैंस को पानी चाहिए, रोज़, और गाँव के कुएँ पर उतना पानी नहीं निकलता कि दो भैंसें नहला दी जाएँ। झील दस मिनट पर थी और खाली पड़ी थी। उसे यह घाटे का सौदा नहीं लगा।

पहले दिन वह दोपहर में गया। अकेला। किनारे की घास घुटनों तक थी और उसमें रास्ता बना हुआ नहीं था, जिससे साफ़ था कि सचमुच कोई नहीं आता। पानी उतना ही साफ़ था जितना लोग बताते थे। भैंसें बिना हिचक के उतर गईं और उसे यही सबसे बड़ा सबूत लगा, क्योंकि जानवर वहाँ नहीं उतरते जहाँ कुछ हो।

गाँव में इस तरह की जगहें और भी हैं और उनके बारे में लोग बात कर लेते हैं। फ़लाँ पेड़, फ़लाँ मोड़, फ़लाँ खँडहर। उन सबकी कोई न कोई कहानी है जिसे सुनाने वाला मज़े लेकर सुनाता है। झील के बारे में कोई कहानी नहीं थी। यही चीज़ अलग थी और सुरेश ने कभी इस पर सोचा नहीं।

भैंस पालने वाला आदमी दिन में दो बार पानी के बारे में सोचता है और यही उसकी सबसे बड़ी चिंता होती है। कुएँ पर सुबह भीड़ रहती है और नंबर आते-आते नौ बज जाते हैं। जेठ में भैंस को नहलाना ज़रूरी है, वरना दूध घट जाता है, और दूध घटने का मतलब सीधे पैसे का घटना है। यह हिसाब सुरेश के लिए किसी कहानी से बड़ा था।

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वह पंद्रह दिन तक रोज़ गया और इन पंद्रह दिनों में कुछ नहीं हुआ। गाँव में दो-तीन लोगों ने उससे पूछा कि तुम उधर जाते हो क्या, और उसने हाँ कहा, और उन्होंने आगे कुछ नहीं पूछा। यह न पूछना उसे तब खटका नहीं।

सोलहवें दिन वह ज़रा पहले पहुँच गया, क्योंकि उस दिन उसका काम जल्दी निपट गया था। दोपहर ढल चुकी थी और पानी पर हवा नहीं थी। ऐसे वक़्त में झील का पानी शीशे जैसा हो जाता है।

भैंसें उतरीं। पानी हिल गया। सुरेश किनारे पर बैठकर बीड़ी सुलगाने लगा और उसकी नज़र यूँ ही पानी पर पड़ी।

पानी में उसे अपना अक्स दिखा, बैठा हुआ, हाथ में माचिस। उसके पीछे किनारे की घास दिख रही थी। और घास के पीछे, थोड़ी दूरी पर, लोग खड़े थे।

आठ या नौ। शायद इससे भी ज़्यादा। वे क़तार में नहीं थे, बस अलग-अलग खड़े थे, वैसे ही जैसे लोग किसी चीज़ के इंतज़ार में खड़े होते हैं। कोई हिल नहीं रहा था।

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पानी में देखने पर उसे पहले यह लगा कि यह उसकी आँखों का धोखा है। दोपहर ढले पानी पर रोशनी तिरछी पड़ती है और उसमें किनारे की चीज़ें अजीब दिखती हैं। उसने आँखें मलीं। फिर देखा। फिर उसने माचिस की तीली, जो अब तक जल रही थी, बुझा दी और दोबारा देखा।

वे वहीं थे, उतने ही, उसी तरह खड़े और उसी दूरी पर।

सुरेश ने पीछे मुड़कर देखा।

किनारा ख़ाली था। घास थी। उसके पीछे मेड़, और मेड़ के पीछे खेत। दूर तक कोई नहीं था और छिपने की कोई जगह भी नहीं थी, क्योंकि वहाँ घास के अलावा कुछ उगता ही नहीं।

उसने वापस पानी में देखा। वे अब भी थे। उतने ही।

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फिर उसने कपड़े देखे। उनमें से एक-दो के कपड़े उसे पहचाने हुए लगे। पहचाने हुए, यानी ऐसे जैसे गाँव में किसी को पहनते देखा हो, पर इतना नहीं कि नाम बता सके। यहीं पर उसके हाथ-पैर ठंडे पड़ गए।

उसने भैंसों को आवाज़ दी और वे नहीं निकलीं, क्योंकि भैंस पानी से जल्दी नहीं निकलती। उसे पानी में उतरकर उन्हें हाँकना पड़ा। पानी घुटनों से ऊपर था और इस पूरे वक़्त उसकी नज़र सामने वाले किनारे पर टिकी रही, नीचे नहीं।

लौटते हुए उसने भैंसों को हाँका और वे उसके आगे-आगे चलती रहीं। रास्ता दस मिनट का है और उसने उस दिन उसे शायद छह में तय किया होगा। गाँव की पहली दीवार दिखने पर उसने पहली बार पीछे देखा। पीछे झील थी, चमकती हुई, और उसके किनारे पर सिर्फ़ घास थी।

पानी में उतरते हुए उसका पैर किसी सख़्त चीज़ पर पड़ा। वह पत्थर नहीं था। वह सीधी थी, कोने वाली, और उसके नीचे एक और वैसी ही थी। तीसरी भी। सुरेश ने पैर से टटोला नहीं, पर उतने से ही उसे इतना पता चल गया कि वे सीढ़ियाँ हैं और नीचे की तरफ़ जाती हैं। झील में सीढ़ियाँ क्यों होंगी, यह सवाल उसने उस वक़्त ख़ुद से नहीं पूछा।

उस दिन के बाद वह उधर नहीं गया। भैंसों के लिए उसने कुएँ पर ही इंतज़ाम किया, जिसमें ज़्यादा वक़्त लगता है और दो-तीन बार पानी खींचना पड़ता है।

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गाँव में उसने यह क़िस्सा आगे नहीं बढ़ाया। एक बार, बहुत बाद में, बूढ़े छन्नू ने उससे इतना पूछा कि अब झील पर नहीं जाते क्या। सुरेश ने सिर्फ़ इतना कहा कि नहीं। छन्नू ने सिर हिलाया और अपने काम से चला गया। उसने वजह नहीं पूछी। सुरेश घर तक यही सोचता रहा कि छन्नू ने वजह क्यों नहीं पूछी।

अब उधर सचमुच कोई नहीं जाता। किनारे की घास हर साल बढ़ती जाती है और अब वह कमर तक आती है, जबकि उतनी अच्छी घास गाँव में और कहीं नहीं होती। चारे की कमी के दिनों में भी लोग वह घास काटने नहीं जाते, और अगर कोई नया आदमी पूछे कि क्यों नहीं जाते, तो उसे सीधा जवाब आज भी नहीं मिलता।