परवेज़ को डर लगता ही नहीं था। यह उसकी बहादुरी नहीं थी, बस एक कमी थी, जैसे किसी को कोई एक रंग न दिखता हो। दोस्त उसे डराने की कोशिश करते और हर बार हार जाते। उस शाम बात हवेली की चली। गाँव के बाहर वाली हवेली, जहाँ रात को कोई नहीं जाता। कहते थे कि वहाँ जो है, वह पीछे लग जाता है। परवेज़ हँसा और बोला कि आज रात वह वहीं सोएगा।

साहिल उसके साथ इसलिए गया कि परवेज़ अकेला जाता तो और भी बुरा होता। रात के दस बजे वे निकले, एक टॉर्च और एक चादर लेकर। रास्ते भर परवेज़ हँसता रहा। साहिल नहीं हँसा। उसे डर लगता था और उसे इस बात पर शर्म भी नहीं थी।

हवेली का दरवाज़ा खुला ही था। अंदर बड़ा आँगन था और उसके तीनों तरफ़ कमरे, और ऊपर जाने के लिए लकड़ी की सीढ़ी, जिसकी कई पट्टियाँ टूटी हुई थीं। उन्होंने आँगन में ही चादर बिछाई। परवेज़ लेट गया। पाँच मिनट में उसकी साँस भारी हो गई।

आँगन में एक नीम खड़ा था और उसकी पत्तियाँ हिलती रहीं। दीवार पर कहीं से चूना झड़ रहा था, थोड़ा-थोड़ा, बराबर। साहिल ने इन दोनों आवाज़ों को पहचानकर अलग रख दिया, क्योंकि रात में डरने वाले लोग यही करते हैं। वे हर आवाज़ को एक नाम दे देते हैं, ताकि बिना नाम की कोई आवाज़ बची न रह जाए।

साहिल जागता रहा। कुछ नहीं हुआ। कोई आवाज़ नहीं। कोई ठंडी हवा नहीं। वैसा कुछ भी नहीं जैसा लोग बताते हैं। एक बजे के आसपास साहिल को लगने लगा कि वह बेकार डरता रहा और सुबह परवेज़ उसे इस बात पर पूरे साल छेड़ेगा।

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साहिल का हाथ टॉर्च पर था और उसने उसे जलाया नहीं। उसे लगा कि रोशनी करने पर कुछ दिख जाएगा, और उससे भी ज़्यादा यह लगा कि रोशनी करने पर जो भी है उसे पता चल जाएगा कि साहिल जाग रहा है। वह इसी सोच में देर तक पड़ा रहा और उसकी पीठ चादर से चिपक गई।

फिर परवेज़ ने नींद में करवट ली और कहा, हाँ।

साहिल ने कुछ पूछा नहीं था।

उसने सोचा कि आदमी नींद में बोलता ही है। उसने अपना ध्यान वापस दरवाज़े पर लगाया। थोड़ी देर बाद परवेज़ ने फिर कहा, अब नहीं, सुबह। और इस बार वह जागा हुआ था, क्योंकि वह उठकर बैठ चुका था और उसकी आँखें खुली थीं।

साहिल ने उससे पूछा कि किससे बात कर रहे हो। परवेज़ ने गर्दन घुमाई। फिर कहा, तुमसे। साहिल ने कहा कि उसने तो कुछ बोला ही नहीं। परवेज़ हँसा और कहा कि नींद में तुम्हें ही याद नहीं रहा होगा। फिर वह वापस लेट गया और सचमुच सो गया।

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दूसरी बार परवेज़ ने कहा, वहीं रख दो। तीसरी बार उसने कहा, मुझे नहीं मालूम। चौथी बार उसने कोई शब्द नहीं कहा, बस हूँ जैसी एक आवाज़ निकाली, ठीक वैसी जैसी आदमी तब निकालता है जब वह सुन रहा हो और बीच में टोकना न चाहता हो।

इसके बाद साहिल ने उसे गिनना शुरू नहीं किया, क्योंकि गिनने की ज़रूरत नहीं पड़ी। रात भर में परवेज़ ने चार बार जवाब दिया। हर बार अलग बात पर। हर बार ऐसे जैसे किसी ने अभी-अभी उससे कुछ कहा हो, और हर बार उसका मुँह साहिल की तरफ़ नहीं, बाईं तरफ़ था, जहाँ दीवार थी।

ऊपर वाले कमरे की खिड़की आँगन में ही खुलती थी और वह बंद थी। साहिल ने रात में दो बार उसकी तरफ़ देखा और दोनों बार वह बंद ही थी। यह बात उसे इसलिए याद रह गई कि उसने उसे जान-बूझकर देखा था, उस तरह जैसे आदमी किसी चीज़ को इसलिए देख लेता है ताकि बाद में कह सके कि उसने देखी थी।

तीन बजे के बाद परवेज़ उठा और सीढ़ी की तरफ़ चलने लगा। साहिल ने उसका रास्ता काटा। कहाँ, उसने पूछा। परवेज़ ने कहा, ऊपर। तुमने ही तो अभी कहा कि वह कमरा देखना है। उसकी आवाज़ में डर नहीं था। झुँझलाहट थी, उस आदमी जैसी जिसे बेवजह रोका जा रहा हो।

साहिल के लिए यही सबसे बुरा हिस्सा था। परवेज़ को कुछ महसूस नहीं हो रहा था। जो चीज़ बाक़ी सबको सीढ़ी से पहले ही रोक देती है, वह उसके अंदर थी ही नहीं, और इसीलिए उसे बुलाना सबसे आसान था। डर आदमी को बचाता भी है। यह बात साहिल को उसी रात समझ में आई।

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उसने परवेज़ की कलाई पकड़ी और कहा कि उसकी तबीयत ख़राब लग रही है और उसे घर जाना है। यह झूठ था। परवेज़ ने कलाई छुड़ाने की कोशिश की, फिर रुक गया, फिर बोला कि ठीक है, चलो। जाते-जाते उसने ऊपर की तरफ़ देखा और साहिल ने नहीं देखा।

आँगन से दरवाज़े तक बीस क़दम हैं। साहिल ने वे बीस क़दम परवेज़ की कलाई पकड़े हुए तय किए और उस पूरे वक़्त उसे यह डर रहा कि परवेज़ रुक जाएगा। परवेज़ रुका नहीं। दरवाज़े से बाहर निकलते हुए उसने बस इतना कहा, अब मत बुलाना।

साहिल ने उसे नहीं बुलाया था।

वे दोनों हवेली से बाहर निकले। बाहर अँधेरा था और हवा बिल्कुल रुकी हुई थी। साहिल ने पीछे मुड़कर देखा। ऊपर वाली खिड़की, जो अंदर से बंद थी, अब खुली हुई थी। उसने परवेज़ को नहीं बताया। दोनों बिना बोले सड़क तक चलते रहे, और सड़क पर पहुँचकर ही उन्हें अपनी साँस सुनाई दी। उस रात के बाद साहिल ने उस तरफ़ जाना छोड़ दिया। परवेज़ कभी कभी उधर से गुज़रता है। वह ऊपर नहीं देखता।