पटरी अब भी वहीं थी, हालाँकि उस पर बीस साल से कोई गाड़ी नहीं चली थी। जंग लगकर लोहा भूरा पड़ चुका था और बीच-बीच में घास उग आई थी। गाँव के बड़े कहते थे कि रात को कभी-कभी उधर से आवाज़ आती है। इंजन की। पहियों की। और कभी-कभी सीटी की, जो बहुत दूर से आती है और पास आते-आते बंद हो जाती है।
नियम सिर्फ़ इतना था कि पटरी के ऊपर पैर नहीं रखना। बगल से चलो, गिट्टी पर चलो, जितना चाहे चलो। यह किसी ने बैठाकर समझाया नहीं था। बच्चे बड़े होते-होते जान जाते थे, वैसे ही जैसे वे जान जाते थे कि कुएँ में झाँकने पर डाँट पड़ेगी।
माघ की उस रात कोहरा इतना था कि हरिचरन को अपने ही आँगन का नल नहीं दिख रहा था। घर में बहू को दर्द शुरू हुए तीन घंटे हो चुके थे। पड़ोस की दो औरतें आ गई थीं, पर दाई दूसरे गाँव में थी, चार किलोमीटर दूर। बेटा उस रात ट्रक लेकर बाहर गया हुआ था।
सड़क से जाने में चालीस मिनट लगते, क्योंकि सड़क नहर के साथ घूमकर जाती है। पटरी के साथ-साथ चलो तो पंद्रह। हरिचरन ने टॉर्च उठाई और कंबल कंधे पर डाल लिया। उसने किसी से पूछा नहीं। पूछता तो कोई मना कर देता।
कोहरे में टॉर्च की रोशनी दो क़दम आगे जाकर दूध की तरह फैल जाती थी। वह गिट्टी पर चल रहा था, पटरी से एक हाथ हटकर, जैसा नियम था। पैरों के नीचे पत्थर बजते थे और उस वक़्त वही एक आवाज़ थी। बाकी सब चुप था। इतना चुप कि उसे अपनी साँस सुनाई दे रही थी।
आधे रास्ते के आसपास उसे पहली चीज़ मिली। दो चप्पलें, पटरी के ऊपर, जोड़े में रखी हुई, इस तरह सीधी जैसे किसी ने उन्हें उतारकर करीने से रखा हो। मर्दाना चप्पलें, पुरानी, एड़ी की तरफ़ से घिसी हुई। हरिचरन ने टॉर्च उन पर एक पल रखी और आगे बढ़ गया।
थोड़ी दूर पर एक कंघी पड़ी थी। उससे आगे टीन का एक डिब्बा, जिसका ढक्कन बगल में रखा था। हर चीज़ पटरी के ऊपर थी और हर चीज़ इस तरह रखी थी जैसे कोई लौटकर उसे उठाने वाला हो। हरिचरन ने उनकी तरफ़ देखना बंद कर दिया।
जहाँ कभी स्टेशन था, वहाँ अब सिर्फ़ एक ऊँचा चबूतरा बचा है और उस पर एक पेड़ उग आया है। वहाँ पहुँचकर कोहरा ज़रा हल्का हुआ। हरिचरन को लगा कि चबूतरे पर कोई खड़ा है। उसने टॉर्च उधर घुमाई। वहाँ पेड़ था।
इसके बाद आवाज़ शुरू हुई। पहले वह इतनी दूर थी कि पहचान में नहीं आई। फिर वह क़रीब आई और तब उसमें वह चीज़ साफ़ हो गई जो गाँव के हर आदमी ने कभी न कभी सुनी थी और किसी ने मानी नहीं थी। इंजन। धीमा, भारी, बराबर चलता हुआ।
दाईं तरफ़ ढलान थी और उसमें कँटीली झाड़ी। बाईं तरफ़ नहर का किनारा, जो सीधा नीचे गिरता था। बीच में पटरी थी। आवाज़ पीछे से आ रही थी, और हरिचरन ने वह किया जो उसने ज़िंदगी में कभी नहीं किया था। वह पटरी पर चढ़ गया और दौड़ा।
स्लीपरों के बीच की दूरी उसके क़दम से मेल नहीं खाती थी। हर तीसरे क़दम पर पैर बीच में पड़ता और वह लड़खड़ा जाता। पीछे की आवाज़ न तेज़ हुई, न धीमी। वह बस उतनी ही दूर बनी रही, जितनी शुरू में थी। यही सबसे बुरी बात थी।
फिर उसे लगा कि कोई उसके साथ-साथ चल रहा है, बगल में, ठीक उसी रफ़्तार से, बिना आवाज़ के। हरिचरन ने टॉर्च उधर नहीं की। उसने कंबल छोड़ा, दाईं तरफ़ छलाँग लगाई और झाड़ी में जा गिरा। काँटे हाथ में और गाल में उतर गए। वह वहीं पड़ा रहा और साँस रोके रहा।
आवाज़ ऊपर से गुज़री। गुज़रने में उसे शायद दस सेकंड लगे। उसके बाद सिर्फ़ कोहरा था और नहर के पानी की हल्की आवाज़। हरिचरन झाड़ी से निकला और बाकी रास्ता पटरी से बीस क़दम हटकर, खेतों में से होकर तय किया।
दाई के दरवाज़े पर पहुँचा तो उसकी कमीज़ फटी थी और गाल से खून बह रहा था। दाई ने उसका चेहरा देखा और झोला उठा लिया। लौटते हुए वे दोनों सड़क से आए, नहर के साथ घूमकर, पूरे चालीस मिनट में। रास्ते भर दाई ने एक बार भी यह नहीं पूछा कि वह गया किधर से था।
बच्चा पौ फटने से पहले हो गया। लड़की। हरिचरन बाहर ही बैठा रहा और अंदर से आवाज़ आने पर भी नहीं उठा। दो दिन तक उसने किसी को नहीं बताया कि उस रात वह किधर से गया था।
तीसरे दिन वह उजाले में उधर गया। चप्पलें वहीं थीं, जोड़े में, पटरी के ऊपर। कंघी भी। टीन का डिब्बा भी, ढक्कन बगल में। दिन की रोशनी में वे और भी सलीके से रखी हुई लग रही थीं। उसने उन्हें छुआ नहीं।
हरिचरन गाँव के पुराने पुजारी के पास गया। पुजारी ने पूरी बात सुनी, फिर पूछा कि उसने पटरी पर क़दम रखा था या नहीं। हरिचरन ने कहा, हाँ। पुजारी ने उसकी तरफ़ बहुत देर तक देखा। उसी रात दोनों पटरी के उस हिस्से पर गए जहाँ कभी स्टेशन हुआ करता था। पुजारी ने वहाँ पूजा की और हरिचरन से कहा कि वह पीछे मुड़कर न देखे, चाहे कुछ भी सुनाई दे। हरिचरन ने नहीं देखा। लौटते वक़्त उसे लगा कि कोई उसके पीछे चल रहा है, और वह मन ही मन गिनता रहा कि गाँव कितने क़दम बचा है।