उस जंगल में रात को आवाज़ें आती थीं, और वे किसी जानवर की नहीं होती थीं। सूखी लकड़ी जैसी खटखट, कभी पास, कभी दूर। गाँव वाले कहते थे कि वहाँ कंकाल रात को उठते हैं। किसी ने यह देखा नहीं था। पर आवाज़ें सबने सुनी थीं, और डर वहीं से शुरू होता था।

नीलय उन्नीस का था और उसे यह बात बचपन से चिढ़ाती थी। उसे भूतों पर भरोसा नहीं था। जिस चीज़ पर उसे भरोसा था, वह यह थी कि हर आवाज़ किसी चीज़ से निकलती है।

यह जंगल गाँव के काम का था और यही इस डर को महँगा बनाता था। जलावन उधर से आती थी, और बकरियाँ उधर चरती थीं, और बरसात के बाद वहाँ की घास सबसे अच्छी होती थी। दिन में लोग जाते भी थे। पर शाम ढलते ही वे लौट आते, और जाड़ों में शाम चार बजे ढल जाती है, इसलिए आधे दिन का चरना हर बरस छूट जाता था। दो-तीन घर हर साल इसी वजह से बकरियाँ कम कर देते थे। किसी ने कभी यह हिसाब नहीं जोड़ा कि एक आवाज़ गाँव को हर बरस कितने की पड़ रही है।

जगत उसके साथ जाने को तैयार हो गया, इस शर्त पर कि वे अँधेरा होते ही लौट आएँगे।

वे माघ की एक शाम गए। दोनों के पास टॉर्च थी। एक-एक। जंगल में पेड़ों के बीच से चलना मुश्किल नहीं है, मुश्किल यह है कि सूखे पत्तों पर अपने ही क़दमों की आवाज़ इतनी होती है कि बाक़ी कुछ सुनाई नहीं देता।

📚 यह भी पढ़ें भूतिया झील
भूतिया झील

इसलिए उन्होंने एक काम किया। वे बीस क़दम चलते और रुक जाते।

चौथी बार रुकने पर उन्होंने सुना।

खटखट, सूखी लकड़ी जैसी, दो बार और फिर एक बार और फिर चुप्पी। आवाज़ बाईं तरफ़ से आई। वे बाईं तरफ़ मुड़े और फिर रुके, और इस बार आवाज़ सामने से आई। तीसरी बार वह दाहिनी तरफ़ से आई।

जगत ने कहा कि वह वापस जा रहा है, और नीलय ने कहा कि ठीक है।

जगत लौट गया। यह डर नहीं था। उसने वही किया जो उसने पहले कह रखा था।

📚 यह भी पढ़ें भूतिया ट्रेन
भूतिया ट्रेन

नीलय अकेला आगे बढ़ा और उसे किला उस जगह मिला जहाँ वह होना चाहिए था, क्योंकि जंगल में उसकी जगह सबको मालूम है। वह किला नहीं है। एक चौकोर चारदीवारी का बचा हुआ हिस्सा है, आदमी की छाती तक ऊँचा, और उसके भीतर एक पक्का फ़र्श है जिस पर घास नहीं उगती।

वह फ़र्श ही असली चीज़ है और उस रात तक किसी ने उसके बारे में सोचा नहीं था।

नीलय भीतर गया और उसने पहला क़दम फ़र्श पर रखा।

उसके नीचे की आवाज़ बदल गई।

उसके अपने जूते की आवाज़ में एक और चीज़ जुड़ गई थी, हल्की-सी, जैसे नीचे कोई ख़ाली जगह हो। उसने दूसरा क़दम रखा और फिर तीसरा और हर बार वही। उसने बैठकर फ़र्श थपका। फिर दोबारा।

📚 यह भी पढ़ें आग में जलती रूहें
आग में जलती रूहें

नीचे ख़ाली था, और वह एक जगह नहीं थी, पूरा फ़र्श वैसा ही बोल रहा था।

वह फ़र्श नहीं था। वह छत थी।

तभी उसकी टॉर्च की रोशनी में कोने की तरफ़ एक चीज़ चमकी और वह वहाँ गया। फ़र्श में एक जगह टूटी हुई थी, दो बालिश्त भर, और उसमें से नीचे की तरफ़ अँधेरा जाता था। उसने टॉर्च नीचे की।

नीचे हड्डियाँ थीं। थोड़ी नहीं।

एक के ऊपर एक, कई परतों में, और ऊपर वाली साफ़ और सफ़ेद थीं जबकि नीचे वाली मिट्टी में मिल चुकी थीं। एक खोपड़ी में सींग थे और उसके बग़ल वाली में भी।

📚 यह भी पढ़ें भूतिया झील
भूतिया झील

वे सब जानवर थे, हिरन और नीलगाय और कुत्ते और बकरियाँ। सौ बरस में जो भी उस टूटी जगह से नीचे गिरा और चढ़कर बाहर नहीं आ सका।

और उसी वक़्त उसके सामने खटखट की वजह खुल गई।

रात में तापमान गिरता है तो पत्थर सिकुड़ता है और फ़र्श बैठता है, थोड़ा-सा। नीचे रखी सूखी हड्डियाँ खिसकती हैं और एक-दूसरे से लगती हैं। और वह तहख़ाना पूरे फ़र्श के नीचे फैला हुआ है, इसलिए आवाज़ कभी इस कोने से आती है और कभी उस कोने से। यह सूखी लकड़ी की आवाज़ नहीं है। यह उससे बहुत मिलती-जुलती दूसरी चीज़ है।

नीलय को यह जानकर राहत नहीं हुई। उसे यह याद आया कि वह उस छत के बीचोंबीच खड़ा है।

पीछे लौटने का रास्ता उसी फ़र्श से होकर था। किनारे-किनारे चलना ज़्यादा सुरक्षित होता है, क्योंकि दीवार के पास छत को दीवार का सहारा रहता है। पर किनारे तक पहुँचने के लिए भी बीच से गुज़रना पड़ता है।

📚 यह भी पढ़ें भूतिया ट्रेन
भूतिया ट्रेन

उसने वहीं खड़े-खड़े टॉर्च बुझा दी।

इसकी वजह साफ़ थी। रोशनी में आदमी वहाँ देखता है जहाँ रोशनी है और तेज़ चलता है। अँधेरे में वह पैर से देखता है। उसने घुटनों के बल, हथेली से आगे का फ़र्श ठोंकते हुए, किनारे तक का रास्ता तय किया। इसमें बीस मिनट लगे।

उन बीस मिनटों में उसे वह सुनाई दिया जो पहले नहीं दिया था। हथेली से ठोंकने पर आवाज़ हर जगह एक जैसी नहीं आती थी। कहीं वह भरी हुई थी और कहीं खोखली, और खोखली जगहें एक क़तार में थीं, जैसे नीचे कोई मेहराब हो और वह किसी दिशा में जाती हो। यह उसे बाद में समझ आया। उस वक़्त उसने बस भरी हुई जगहों पर हाथ रखा और उन्हीं पर चला।

दीवार पकड़कर वह बाहर निकला और तब उसने टॉर्च जलाई।

वह उसकी टॉर्च नहीं थी। उसकी अपनी नहीं।

📚 यह भी पढ़ें आग में जलती रूहें
आग में जलती रूहें

यह बात उसे गाँव पहुँचने पर पता चली, उजाले में। उसकी अपनी टॉर्च पर काला टेप लगा था। इस पर नहीं। इस पर पेंदी के पास एक नाम खुरचा हुआ था और वह नाम बालेश्वर था।

बालेश्वर जगत के बड़े भाई का नाम है।

बालेश्वर शहर में है और नौ बरस से है। वह जाड़ों में दो हफ़्ते के लिए आता है और उन दो हफ़्तों में गाँव भर उससे मिलने आता है, इसलिए उससे कोई एक बात ठीक से नहीं हो पाती।

जगत ने वह टॉर्च देखी और कहा कि वह उसके भाई की थी और तीन बरस पहले खो गई थी। किसने खोई, यह उसे मालूम नहीं। भाई ने वह टॉर्च उन दिनों किसी को उधार दी थी।

किसको दी थी, यह उस शाम किसी को याद नहीं आया, और बाद में भी नहीं आया।

📚 यह भी पढ़ें भूतिया झील
भूतिया झील

उस बरस के बाद विभाग वालों ने वह फ़र्श तुड़वाकर तहख़ाना मलबे से भरवा दिया, क्योंकि मवेशी गिरते थे। भराई में चार दिन लगे। हड्डियाँ नीचे ही रहीं। हड्डियाँ नीचे ही रह गईं, मलबे के नीचे।

खटखट उसी हफ़्ते बंद हो गई। अब वहाँ रात को कुछ नहीं होता।

टॉर्च नीलय के पास है। उसने उस पर नया सेल डाला और वह चल गई। घर में जब कभी बिजली जाती है, वही निकाली जाती है, क्योंकि वह अच्छी है और पुरानी वाली से तेज़ जलती है।