गाँव के बाहर वाली हवेली में सालों से कोई नहीं रहता था। फिर भी हर बरसात के बाद उसकी दीवारों पर काजल जैसी एक काली परत उतर आती थी, जैसे भीतर अब भी कुछ जल रहा हो। बड़े-बूढ़े बताते थे कि हवेली किसी बड़े व्यापारी की थी, और एक रात उसमें उसका पूरा परिवार ख़त्म हो गया। किस वजह से, यह कोई ठीक-ठीक नहीं बता पाता। बस इतना तय था कि शाम ढलते ही उस तरफ़ का रास्ता सूना हो जाता था। गाँव के कुत्ते भी उधर मुँह करके नहीं भौंकते थे।
फुलमती को इससे कोई मतलब नहीं था। उसे सूखी जगह चाहिए थी। वह उपले पाथती थी और बरसात में उपले भीगकर बेकार हो जाते हैं, और हवेली का बाहरी बरामदा ऊँचा था, छत सलामत थी, और किराया कोई नहीं माँगता था। छह साल से वह वहीं अपना ढेर लगाती आ रही थी।
सावन के बाद वाले हफ़्ते में उसने पहली बार दीवार छूई। दीवार गरम थी। बरसात के बाद दीवारें ठंडी होती हैं, यह बात उसे किसी ने सिखाई नहीं थी, वह जानती थी। उसने हथेली नीचे सरकाई। जितना नीचे, उतनी गरम। फ़र्श सबसे गरम था।
जब सन्नाटा चीखने लगा
उसने किसी से कहा नहीं। कहने से क्या होता, वह हवेली में मुफ़्त में सामान रखती थी और यह बात भी सबको पसंद नहीं थी। पर उस दिन के बाद उसने उपले बरामदे के बीच में नहीं, किनारे लगाने शुरू किए। बीच वाले हिस्से पर वह पैर नहीं रखती थी। यह भी उसने किसी को नहीं बताया।
बुंदेलखंड में उस ज़माने में शोरा बनता था। हवेली वाले व्यापारी का यही काम था, यह बात गाँव के सबसे बूढ़े आदमी ने बताई, वह भी पूछने पर नहीं, बात-बात में। शोरा नीचे तहख़ाने में बोरों में रखा जाता था। आग लगने पर शोरा भड़कता नहीं, सुलगता है। और सुलगता रहता है।
फुलमती ने यह सुना और उसे कुछ समझ नहीं आया, सिवाय एक बात के। नीचे कुछ है और वह ठंडा नहीं हुआ है। कितने साल से, इसका हिसाब उसने नहीं लगाया। हिसाब लगाने से डर बढ़ता है और काम रुकता है।
पूस में पंचायत ने तय किया कि हवेली का बरामदा साफ़ करके वहाँ खाद का गोदाम बनाया जाएगा। फ़र्श तोड़कर नया डाला जाएगा, क्योंकि पुराना बैठ चुका था। मिस्त्री और आठ मज़दूर तेरह तारीख़ को आने वाले थे। फुलमती को दो दिन में अपना सामान हटाने को कहा गया।
उसने सरपंच से कहा कि फ़र्श मत तुड़वाओ। सरपंच ने पूछा क्यों। उसने कहा कि नीचे गरमी है। सरपंच ने कहा कि पत्थर धूप में गरम होता है। फुलमती ने कहा कि पूस में धूप नहीं होती। इस पर सरपंच ने बात ख़त्म कर दी, और जाते-जाते किसी से कहा कि औरत को जगह छोड़ने का दुख है।
जो दिखा वह सच नहीं था
उस रात उसने अपने लड़के को अपनी बहन के घर भेज दिया, यह कहकर कि सुबह गोबर लाना है और वहीं से पास पड़ेगा। लड़के ने वजह नहीं पूछी। फुलमती ने अपनी दो साड़ियों में से पुरानी वाली पहनी। यह बात उसने बाद में भी नहीं बताई, पर पुरानी वाली उसने इसलिए पहनी थी कि नई बच जाए।
बारह तारीख़ की रात वह अकेली गई। साथ में सब्बल था, वही जिससे वह गोबर की तह उखाड़ती थी। उसने बरामदे के बीच वाले हिस्से पर, जहाँ छह साल से पैर नहीं रखा था, सब्बल की नोक टिकाई और पूरा वज़न डाल दिया।
फ़र्श ऊपर से पत्थर था और नीचे कुछ नहीं। सब्बल गया, फिर पत्थर गया, फिर वह हिस्सा गया जिस पर वह खड़ी थी। गड्ढा गहरा नहीं था, कमर तक। पर उसमें से जो हवा ऊपर आई, वह गरम नहीं थी। वह जलती हुई थी। फुलमती ने बाद में सिर्फ़ इतना बताया कि रोशनी नहीं थी, और यही सबसे बुरी बात थी।
गाँव वाले उसकी आवाज़ पर आए। उसे खींचकर निकाला गया। दोनों पाँव और बाईं बाँह जल चुकी थी और साड़ी का निचला हिस्सा राख था। ब्लॉक से लोग आए, गड्ढा देखा, और तेरह तारीख़ का काम रोक दिया गया। मिस्त्री और आठ मज़दूर उस दिन नहीं आए।
तीन महीने अस्पताल और उसके बाद घर। बाईं बाँह पहले जैसी नहीं हुई और उपले पाथने के लिए दोनों हाथ चाहिए। अब उसका लड़का पाथता है और वह गोबर छानती है, बैठकर। किसी ने यह नहीं कहा कि उसने आठ आदमियों की जान बचाई। पंचायत में यह दर्ज हुआ कि फ़र्श कमज़ोर था, जो सच था।
गड्ढा रेत से भरवा दिया गया और ऊपर पक्का कर दिया गया। गोदाम कहीं और बना। हवेली वैसी ही खड़ी है और उस तरफ़ अब भी शाम के बाद कोई नहीं जाता। और हर बरसात के बाद दीवार पर वही काली परत उतर आती है, उतनी ही, जितनी पहले उतरती थी।