महल गाँव से तीन किलोमीटर बाहर था और उसकी दीवार का एक हिस्सा अब भी खड़ा था। बाकी सब गिर चुका था। दिन में वहाँ बकरियाँ चरती थीं। शाम होते ही चरवाहे उन्हें हाँककर ले जाते और पीछे मुड़कर नहीं देखते। यह नियम किसी ने बनाया नहीं था। बस सब इसका पालन करते थे।

विक्रांत उन चरवाहों में सबसे छोटा था और उसकी अपनी एक भी बकरी नहीं थी। वह दूसरों की चराता था, महीने के हिसाब से। जेठ में घास कहीं नहीं बचती, सिवाय महल की उस तरफ़ के, जहाँ गिरी हुई दीवार की छाँव पड़ती है और ज़मीन देर तक नम रहती है। इसलिए उन दिनों सब वहीं जाते थे।

शाम का हिसाब सूरज से नहीं, परछाईं से लगता था। जब टूटी दीवार की परछाईं नीचे वाले रास्ते तक पहुँच जाए, तब निकल लो। बाकी चरवाहे उससे भी पहले निकल जाते थे। विक्रांत भी निकलता था।

उस शाम गिनती में एक कम थी। सफ़ेद बकरी, गले में पीतल की घंटी, और वह मंगल भगत की थी। मंगल भगत की बकरी का मतलब था कि पैसा भी कटेगा और बात भी सुननी पड़ेगी। विक्रांत ने बाकी झुंड पास वाले खेत में बाँधा और लौटकर दीवार की तरफ़ देखा। परछाईं रास्ते से आगे निकल चुकी थी।

अंदर जाने में और लौट जाने में, दोनों में नुक़सान था। एक में बकरी का, दूसरे में किसी और चीज़ का, जिसका नाम कोई नहीं लेता था। विक्रांत सत्रह का था और उसके पास पूरे महीने की मज़दूरी दाँव पर लगी थी। वह अंदर चला गया।

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अंदर वैसा कुछ नहीं था जैसा लोग बताते थे। न चीख़ें, न ठंडी हवा। बस मलबा, बिखरी हुई ईंटें, और एक बड़ा आँगन जिसके तीनों तरफ़ मेहराबें थीं। रोशनी अभी बची हुई थी, इतनी कि रास्ता दिख जाए। विक्रांत ने आवाज़ लगाई और अपनी ही आवाज़ लौटकर आई।

बकरी दूसरे आँगन में थी और वह भाग नहीं रही थी। वह एक ही जगह खड़ी थी, सिर नीचे किए, और हिल नहीं रही थी। विक्रांत उसे उठाने के लिए झुका। तभी उसकी नज़र घंटी पर गई। घंटी के अंदर कपड़ा ठुँसा हुआ था।

कपड़ा पुराना था, मैला था, और इतनी मज़बूती से ठुँसा हुआ था कि उसे निकालने में दोनों उँगलियाँ लगानी पड़ीं। निकलते ही घंटी बजी। उस आवाज़ के बाद आँगन में जो चुप्पी हुई, वह पहले वाली चुप्पी से अलग थी। विक्रांत ने बकरी को गोद में उठा लिया।

वह उसी मेहराब से बाहर निकला जिससे अंदर आया था। दूसरी तरफ़ फिर वही आँगन था। उसने दूसरी मेहराब ली। फिर वही आँगन। तीसरी बार उसने झुककर देखा कि ज़मीन की धूल पर उसके अपने पैरों के निशान किधर जा रहे हैं, और निशान आँगन के बीच में आकर ख़त्म हो जाते थे।

एक बार उसने दीवार पर चढ़ने की कोशिश की। मलबे का ढेर लगभग ऊपर तक जाता था और वहाँ से बाहर कूदने की ऊँचाई ज़्यादा नहीं थी। वह आधे तक चढ़ भी गया। फिर उसके पैर के नीचे की ईंटें खिसकीं और वह बकरी समेत नीचे आ गिरा। घुटना छिल गया और बकरी उसके हाथ से छूटते-छूटते बची। इसके बाद उसने ऊपर की तरफ़ देखना छोड़ दिया।

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तब तक अँधेरा हो चुका था। विक्रांत ने दौड़ना छोड़ दिया। यह उसने हिम्मत से नहीं किया, बल्कि इसलिए कि साँस उखड़ रही थी और दौड़ने में बकरी छूट जाती। वह एक टूटे खंभे से पीठ टिकाकर बैठ गया, बकरी को गोद में लिया, और उसके मुँह पर हाथ रख दिया ताकि वह आवाज़ न करे।

रात में कोई मेहराब वाले रास्ते पर चला। चलने की आवाज़ थी, पर पैर घिसटने की नहीं, और न ही किसी जूते की। कुछ देर वह आवाज़ रुकी रही। फिर आगे बढ़ गई। विक्रांत ने आँखें बंद नहीं कीं, क्योंकि आँखें बंद करने से वह आवाज़ और साफ़ सुनाई देने लगती थी।

वह आवाज़ रात में चार बार गुज़री, और हर बार पहले से पास से। चौथी बार वह इतने पास से गुज़री कि विक्रांत को अपने घुटने के पास हवा हिलती हुई लगी। बकरी उस पूरे वक़्त हिली नहीं। उसका दिल विक्रांत की हथेली के नीचे तेज़ चल रहा था, और उस रात वही एक चीज़ थी जो ज़िंदा लग रही थी।

जब आँगन की दीवार का ऊपरी सिरा हल्का पड़ने लगा, विक्रांत ने बकरी को गोद से उतारा। घंटी नहीं बजी। उसने उसे उँगली से हिलाया, फिर हथेली में लेकर देखा। घंटी के अंदर कपड़ा ठुँसा हुआ था। वही कपड़ा, उसी तरह।

उसने उस कपड़े को इस बार नहीं छुआ। बकरी को कंधे पर डाला और उठ खड़ा हुआ। सामने वाली मेहराब से बाहर वही रास्ता था जो पहली ही बार में होना चाहिए था, सीधा, बिना किसी मोड़ के, और उसके आख़िर में गिरी हुई दीवार का वह हिस्सा जिसकी छाँव में दिन भर बकरियाँ चरती थीं।

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विक्रांत महल से बाहर निकला तो पौ फट रही थी। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। गाँव तक के तीन किलोमीटर उसने बिना रुके तय किए, और घर पहुँचकर सीधे बैठ गया, जूते भी नहीं उतारे। दो दिन उसे बुख़ार रहा। तीसरे दिन जब वह उठा, तो उसने देखा कि उसकी कमीज़ की बाँह पर धूल के निशान हैं, पाँच उँगलियों जितने। वह कमीज़ उससे एक दिन पहले धुल चुकी थी। विक्रांत ने उसे जला दिया। महल के बारे में उसने बात करना बंद कर दिया, और जब लोग पूछते तो कहता कि वह अंदर गया ही नहीं था।