जयपाल की गाड़ी दिन में सब्ज़ी ढोती थी और रात में लाश। सुबह चार बजे मंडी, फिर तीन क़स्बों के बाज़ार, और शाम को टिन का फ़र्श धोकर चूने का पानी छिड़क देना। रात में जो बुलावा आ जाए। शव ले जाने का एक फेरा अठारह सौ का पड़ता था और सब्ज़ी का पूरा दिन छह सौ का। दोनों काम एक ही गाड़ी से चलते थे और गाँव में इस बात पर किसी ने कभी आपत्ति नहीं की।
आदमी जो चीज़ रोज़ उठाता है, उसके बारे में सोचना बंद कर देता है। पर हाथ सोचते रहते हैं। जयपाल के हाथ जानते थे कि दो घंटे पुराना आदमी उठाने में भारी होता है और कंधे पर लुढ़क जाता है। छह घंटे पुराना नहीं लुढ़कता। पहले जबड़ा जकड़ता है, फिर गरदन, फिर बाँहें, और यह क्रम मौसम से आगे-पीछे होता है पर उलटा कभी नहीं होता। यह उसे किसी ने सिखाया नहीं था। ग्यारह साल में अपने आप आ गया।
उस रात सवा ग्यारह बजे फ़ोन आया। शहर के छोर पर एक कॉलोनी थी, नई, जिसमें आधे मकान अधबने थे। जाना साठ किलोमीटर दूर एक गाँव तक था और सुबह आठ बजे दाह होना था। आदमी का नाम सुखबीर बताया गया, उम्र इकतालीस। और भाड़ा पाँच हज़ार कहा गया, बिना मोल-भाव के, पहली ही बात में। इतने में जयपाल दो फेरे कर लेता था। उसने गाड़ी निकाल ली।
गेट पर दो आदमी खड़े थे। भीतर सुखबीर ज़मीन पर चटाई पर था और उसके सिरहाने एक औरत बैठी थी जो रो रही थी और बीच-बीच में बाहर की तरफ़ देख रही थी। बताया गया कि शाम सात बजे के आसपास बाथरूम में पैर फिसला और सिर पीछे लगा। जयपाल ने कंधों की तरफ़ से उठाया। बाँहें नहीं मुड़ीं। सात बजे गिरे आदमी की बाँहें सवा ग्यारह बजे मुड़ती हैं।
उठाते हुए उसने दो चीज़ें और देखीं। बाथरूम का फ़र्श सूखा था, चौखट तक। और दरवाज़े पर न पानी रखा था, न दिया जला था, न अगरबत्ती लगी थी, जबकि उस कॉलोनी में हर दूसरा घर उसी ज़िले का था जहाँ यह सब सबसे पहले किया जाता है। जयपाल ने चादर ठीक की और गाड़ी की तरफ़ बढ़ गया। भाड़ा पाँच हज़ार था।
गाड़ी चली तो एक आदमी आगे बैठा और दूसरा पीछे, चादर के पास। आगे वाले ने नाम जगदेव बताया और कहा कि वह सुखबीर का चचेरा भाई है। बाईपास से पहले उसने कहा कि नहर वाली सड़क पकड़ लो। वह चौदह किलोमीटर लंबी पड़ती थी। उस पर रात में ट्रक भी नहीं चलते। वजह यह बताई गई कि क्रॉसिंग पर चेकिंग होती है। रात के डेढ़ बजे।
ढाबे पर पानी लेने रुके तो बल्ब की रोशनी सीधी चादर पर पड़ी। जयपाल ने वहीं देखा कि सुखबीर के कान की लपेट में और नाखूनों के नीचे सफ़ेदी जमी है, चूने और सीमेंट वाली, जो नहाने से जाती है और मरे हुए आदमी से नहीं जाती। और चप्पलें उलटी पहनाई गई थीं। बायीं दायें पैर में। अगहन की रात थी और नहर के ऊपर कोहरा बैठा हुआ था।
नहर वाली सड़क पर, दो बजकर दस मिनट पर, जयपाल ने गाड़ी किनारे लगाई और चाबी घुमा दी। दोनों तरफ़ खेत थे और पीछे-आगे कोई बत्ती नहीं थी। सड़क ख़ाली थी। जगदेव ने पूछा कि क्या हुआ। जयपाल ने कहा कि बाथरूम में गिरने से छाती के आर-पार सीधी लकीर नहीं पड़ती, और चार घंटे में बाँहें नहीं जकड़तीं, और वह गाड़ी तब तक आगे नहीं ले जाएगा जब तक उसे बता न दिया जाए कि वह क्या ढो रहा है।
जगदेव ने धमकी नहीं दी। उसने बीड़ी सुलगाई और सीधा-सीधा बता दिया। सुखबीर दोपहर सवा चार बजे तीसरी मंज़िल की शटरिंग से गिरा था। साइट पर मौत का मतलब है कि साइट बंद, ठेकेदार यादराम की बाक़ी तीन साइटें भी खुल जाएँ, और मुक़दमा चार साल चले जिसका नतीजा किसी को नहीं मालूम। शाम को घर पर दो लाख नक़द रख दिए गए थे। सुगंधी ने गिन लिए थे। रक़म पूरी थी। वह गाड़ी से पहले ही गाँव भेज दी गई थी।
जयपाल पंद्रह मिनट वहीं बैठा रहा। फिर उसने चाबी घुमाई। जो हिसाब उसके सामने रखा गया था वह ग़लत नहीं था। यही चीज़ उसे उस रात से ज़्यादा बाद के महीनों में चुभी। पाँच हज़ार वह पहले ही हाँ कह चुका था, यह जाने बिना कि किस बात के हैं। बाक़ी रास्ता किसी ने बात नहीं की और नहर के साथ-साथ गाड़ी चलती रही।
गाँव पहुँचे तो पौने पाँच बज रहे थे। घाट पर लकड़ी पहले से चुनी हुई थी। तीन कुंतल, ठीक से लगी हुई, ऊपर उपले रखे हुए, और पास में घी का डिब्बा। किसी ने वह सब रात में लगाया था, जब गाड़ी अभी नहर पर थी और बेटा अभी सोया हुआ था। लाश ने उस रात जो आख़िरी बात कही, वह लकड़ी ने कही।
संजू उन्नीस का था और लुधियाना से रात को पहुँचा था। उसे इतना बताया गया था कि बापू गिर गए। घाट पर चार मिनट ऐसे आए जब वे दोनों अकेले थे और जयपाल ने उससे कह दिया, दो वाक्यों में, कि उठाते वक़्त बाँहें नहीं मुड़ी थीं और यह क्या मतलब रखता है। लड़का सुनता रहा। फिर वह माँ के पास चला गया।
सुगंधी ने उससे कहा कि जो हो गया सो हो गया, और दो लाख में कमरा भी बनेगा और बहन की शादी भी होगी, और चार साल की अदालत में कुछ नहीं रखा। आठ बजे संजू ने ही आग दी। कोई देर नहीं हुई। तेरहवीं पर वही दो आदमी भी आए थे और खाना खाकर गए।
जयपाल के पास लाश वाला काम उसी हफ़्ते से आना बंद हो गया। वह बुलावा किसी एक जगह से नहीं आता था, पर आता उन्हीं ठेकों और उन्हीं आदमियों के ज़रिये था, और उन तक ख़बर पहुँचने में दो दिन लगे। महीने के चौदह हज़ार घटकर छह पर आ गए और गाड़ी फिर सिर्फ़ सब्ज़ी ढोने लगी। पाँच हज़ार उसने रखे थे। यह बात वह अपने बारे में जानता है।
उस साइट की इमारत खड़ी हो गई और नीचे वाली मंज़िल में तीन दुकानें खुल गईं। यादराम की नई साइट बाईपास पर है, पहले से बड़ी, नौ मंज़िल की। जयपाल हफ़्ते में चार दिन सुबह सात बजे टमाटर लेकर उसके सामने से निकलता है। शटरिंग पर जो लड़के खड़े रहते हैं उनमें एक संजू है, क्योंकि काम वहीं है।