फ़ोन गुरुवार रात नौ बजकर दस मिनट पर आया। सुमित ने उठाया तो उधर से एक औरत की आवाज़ आई, बहुत धीमी। उसने बस यही पूछा, ‘कौन हैं आप?’ सुमित ने अपना नाम बता दिया। उधर से कोई जवाब नहीं आया। थोड़ी देर बाद फ़ोन कट गया। सुमित ने नंबर देखा। सेव नहीं था। उसने उसे सेव भी नहीं किया।

अगले गुरुवार, नौ बजकर दस मिनट पर, वही फ़ोन आया। वही सवाल। सुमित ने इस बार पूछा कि वे किससे बात करना चाहती हैं। फ़ोन कट गया। तीसरे गुरुवार उसने उठाया ही नहीं। चौथे गुरुवार उसने उठाकर चिढ़े हुए स्वर में कहा कि दोबारा फ़ोन मत कीजिए। फ़ोन रखने के बाद उसे लगा कि उसने ग़लत किया है, पर वह बता नहीं सकता था कि ग़लत क्या था।

नवंबर में उसके फ़ोन पर एक ओटीपी आया, किसी ऐसे बैंक का जिसमें उसका खाता नहीं था। हफ़्ते भर बाद एक कूरियर आया, जिस पर नाम लिखा था: देवेंद्र पाल। सुमित ने कूरियर वाले से कहा कि इस नाम का कोई आदमी यहाँ नहीं रहता। कूरियर वाले ने पर्ची घुमाकर दिखा दी। पते में सुमित का ही फ़्लैट लिखा था, और नीचे फ़ोन नंबर भी सुमित का ही था।

परतें उतरने लगीं

सिम उसने आठ महीने पहले लिया था। दुकानदार ने तब कहा था कि नंबर अच्छा है, आख़िर में तीन शून्य। सुमित कंपनी के दफ़्तर गया और वहाँ लड़की ने स्क्रीन देखकर बताया कि नंबर पुराना है और दोबारा जारी किया गया है, क्योंकि पिछले ग्राहक ने चौबीस महीने तक रिचार्ज नहीं कराया था। नियम यही है। नंबर वापस ले लिया जाता है और किसी और को दे दिया जाता है। पिछले ग्राहक का नाम वह नहीं बता सकती थी, पर उस वक़्त तक सुमित को उसकी ज़रूरत नहीं रह गई थी।

देवेंद्र पाल के बारे में जानना मुश्किल नहीं था। दो साल पुराने अख़बारों में उसका नाम था। वह एक बिल्डर के दफ़्तर में मुनीम था और एक दिन काम पर नहीं पहुँचा। उसके साथ दफ़्तर का चौंतीस लाख रुपया भी नहीं पहुँचा। मुक़दमा दर्ज हुआ। आदमी कभी नहीं मिला।

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जनवरी में रात ग्यारह बजे दरवाज़े पर दस्तक हुई। दो आदमी खड़े थे। उन्होंने सुमित का नाम नहीं पूछा, नंबर पूछा, और सुमित ने नंबर बता दिया, क्योंकि वह उसका अपना नंबर था। एक आदमी ने जेब से फ़ोन निकालकर एक तस्वीर दिखाई। तस्वीर धुँधली थी, किसी शादी में दूर से खींची गई। उसमें एक आदमी था, चालीस के आसपास, चश्मे में। सुमित चालीस का था और चश्मा पहनता था।

सुमित ने आधार कार्ड निकालकर दिखाया। एक आदमी ने कार्ड देखा, फिर सुमित को, फिर वापस कार्ड को। फिर उसने कहा कि कार्ड तो बनवाए जा सकते हैं। वे उस रात चले गए, पर जाते हुए उन्होंने फ़्लैट का नंबर अपने फ़ोन में लिख लिया। उसके बाद हफ़्ते में दो बार कोई न कोई नीचे खड़ा दिखने लगा। गार्ड ने एक दिन बताया कि लोग आकर सुमित के बारे में पूछते हैं।

सिम बदल देना सबसे आसान काम था। सुमित दो बार दुकान तक गया और दोनों बार लौट आया। नंबर उसके बैंक में लगा था, दफ़्तर के रिकॉर्ड में लगा था, बीमे में लगा था, और उसकी माँ को यही नंबर याद था, जो अस्सी की थीं और नया नंबर याद नहीं रख पातीं। यह वजह उसने ख़ुद को दी थी। असली वजह गुरुवार की रात थी, जो अब भी आती थी, और जिसे वह अब उठाने लगा था।

जब वक्त कम पड़ने लगा

मार्च में अदालत का नोटिस आया। देवेंद्र पाल के नाम, सुमित के पते पर, तारीख़ के साथ: अट्ठाईस मार्च। वकील ने बताया कि पेश न होने पर वारंट निकलेगा, और वारंट पते पर आएगा, और पते पर सुमित रहता है। साबित करना पड़ेगा कि वह देवेंद्र पाल नहीं है। वकील ने यह भी कहा कि यह उतना आसान नहीं जितना सुनने में लगता है, क्योंकि दूसरी तरफ़ के लोग यही मानकर चल रहे हैं कि वह है।

उस गुरुवार सुमित ने पहली बार ख़ुद बात शुरू की। उसने कहा कि वह देवेंद्र पाल नहीं है, कि नंबर उसे कंपनी ने दिया है, और कि अट्ठाईस मार्च को उसे अदालत जाना है। उधर बहुत देर तक ख़ामोशी रही। फिर औरत ने कहा, ‘मुझे मालूम है कि आप वो नहीं हैं।’ सुमित ने पूछा कि फिर वे हर हफ़्ते फ़ोन क्यों करती हैं। उसने कहा, ‘क्योंकि यही नंबर बचा है।’

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वह देवेंद्र पाल की पत्नी थी। दो साल से हर गुरुवार को, उसी वक़्त, वह उस नंबर पर फ़ोन करती आई थी, क्योंकि दो साल पहले गुरुवार की रात नौ बजकर दस मिनट पर उसकी आख़िरी बात हुई थी। आठ महीने पहले तक फ़ोन बंद मिलता था। फिर एक दिन घंटी गई। वह दिन उसे ठीक-ठीक याद था।

अट्ठाईस मार्च को वह अदालत आई। आने की उसे कोई ज़रूरत नहीं थी और किसी ने उससे कहा भी नहीं था। जज ने पूछा कि क्या वह इस आदमी को पहचानती है। उसने सुमित की तरफ़ देखा और कहा कि नहीं। फिर उसने यह भी बताया कि उसके पति का नंबर अब इस आदमी के पास है और यह बात कंपनी के रिकॉर्ड से साबित हो सकती है। सुमित का नाम उसी दिन मुक़दमे से हट गया।

बाहर सीढ़ियों पर सुमित ने उससे कहा कि वह नंबर छोड़ देगा और वे उसे ले सकती हैं। उसने मना कर दिया। उसने कहा कि नंबर अब उनका है और उन्हें ही रखना चाहिए। इसके बाद वे चली गईं और सुमित ने उन्हें फिर कभी नहीं देखा। फ़ोन उसने नहीं बदला। गुरुवार को नौ बजकर दस मिनट पर अब भी कभी-कभी घंटी बजती है, हर हफ़्ते नहीं, महीने में एकाध बार, कभी उससे भी कम। सुमित उठा लेता है और पहले कुछ नहीं बोलता।