फ़ोन गुरुवार रात नौ बजकर दस मिनट पर आया। अभिनव ने उठाया तो उधर से एक औरत की आवाज़ आई, बहुत धीमी। उसने बस यही पूछा, ‘कौन हैं आप?’ अभिनव ने अपना नाम बता दिया। उधर से कोई जवाब नहीं आया। थोड़ी देर बाद फ़ोन कट गया। अभिनव ने नंबर देखा। सेव नहीं था। उसने उसे सेव भी नहीं किया।

अगले गुरुवार, नौ बजकर दस मिनट पर, वही फ़ोन आया। वही वक़्त। वही सवाल। अभिनव ने इस बार पूछा कि वे किससे बात करना चाहती हैं। फ़ोन कट गया। तीसरे गुरुवार उसने उठाया ही नहीं। चौथे गुरुवार उसने उठाकर चिढ़े हुए स्वर में कहा कि दोबारा फ़ोन मत कीजिए। फ़ोन रखने के बाद उसे लगा कि उसने ग़लत किया है, पर वह बता नहीं सकता था कि ग़लत क्या था।

नवंबर में उसके फ़ोन पर एक ओटीपी आया, किसी ऐसे बैंक का जिसमें उसका खाता नहीं था। हफ़्ते भर बाद एक कूरियर आया, जिस पर नाम लिखा था: देवेंद्र पाल। अभिनव ने कूरियर वाले से कहा कि इस नाम का कोई आदमी यहाँ नहीं रहता। कूरियर वाले ने पर्ची घुमाकर दिखा दी। नाम नीचे भी लिखा था। पते में अभिनव का ही फ़्लैट लिखा था, और नीचे फ़ोन नंबर भी अभिनव का ही था।

सिम उसने आठ महीने पहले लिया था। दुकानदार ने तब कहा था कि नंबर अच्छा है, आख़िर में तीन शून्य। अभिनव कंपनी के दफ़्तर गया और वहाँ लड़की ने स्क्रीन देखकर बताया कि नंबर पुराना है और दोबारा जारी किया गया है, क्योंकि पिछले ग्राहक ने चौबीस महीने तक रिचार्ज नहीं कराया था। नियम यही है। नंबर वापस ले लिया जाता है। फिर वह किसी और को दे दिया जाता है। पिछले ग्राहक का नाम वह नहीं बता सकती थी, पर उस वक़्त तक अभिनव को उसकी ज़रूरत नहीं रह गई थी।

देवेंद्र पाल के बारे में जानना मुश्किल नहीं था। दो साल पुराने अख़बारों में उसका नाम था। वह एक बिल्डर के दफ़्तर में मुनीम था और एक दिन काम पर नहीं पहुँचा। उसके साथ दफ़्तर का चौंतीस लाख रुपया भी नहीं पहुँचा। मुक़दमा दर्ज हुआ। आदमी कभी नहीं मिला। नंबर बंद हो गया।

📚 यह भी पढ़ें बोलती हुई लाश
बोलती हुई लाश

जनवरी में रात ग्यारह बजे दरवाज़े पर दस्तक हुई। दो आदमी खड़े थे। उन्होंने अभिनव का नाम नहीं पूछा, नंबर पूछा, और अभिनव ने नंबर बता दिया, क्योंकि वह उसका अपना नंबर था। एक आदमी ने जेब से फ़ोन निकालकर एक तस्वीर दिखाई। तस्वीर धुँधली थी। किसी शादी में दूर से खींची गई। उसमें एक आदमी था, चालीस के आसपास, चश्मे में। अभिनव चालीस का था और चश्मा पहनता था। इतना ही काफ़ी था।

अभिनव ने आधार कार्ड निकालकर दिखाया। एक आदमी ने कार्ड देखा, फिर अभिनव को, फिर वापस कार्ड को। फिर उसने कहा कि कार्ड तो बनवाए जा सकते हैं। वे उस रात चले गए, पर जाते हुए उन्होंने फ़्लैट का नंबर अपने फ़ोन में लिख लिया। उसके बाद हफ़्ते में दो बार कोई न कोई नीचे खड़ा दिखने लगा। गार्ड ने एक दिन बताया कि लोग आकर अभिनव के बारे में पूछते हैं। सोसाइटी की बैठक में यह बात उठी और अभिनव को खड़े होकर बताना पड़ा कि वह कौन है। दफ़्तर में इस पर कोई बात नहीं हुई, पर मार्च वाले प्रमोशन की सूची में उसका नाम नहीं था और वजह किसी ने नहीं बताई। नुक़सान इसी तरह होता है, बिना किसी के कुछ कहे।

सिम बदल देना सबसे आसान काम था। दो सौ रुपये का काम। अभिनव दो बार दुकान तक गया और दोनों बार लौट आया। नंबर उसके बैंक में लगा था, दफ़्तर के रिकॉर्ड में लगा था, बीमे में लगा था, और उसकी माँ को यही नंबर याद था, जो अस्सी की थीं और नया नंबर याद नहीं रख पातीं। यह वजह उसने ख़ुद को दी थी। असली वजह गुरुवार की रात थी, जो अब भी आती थी, और जिसे वह अब उठाने लगा था।

मार्च में अदालत का नोटिस आया। देवेंद्र पाल के नाम, अभिनव के पते पर, तारीख़ के साथ: अट्ठाईस मार्च। वकील ने बताया कि पेश न होने पर वारंट निकलेगा, और वारंट पते पर आएगा, और पते पर अभिनव रहता है। साबित करना पड़ेगा कि वह देवेंद्र पाल नहीं है। यह उलटी बात थी। वकील ने साथ में यह भी जोड़ा कि यह उतना आसान नहीं जितना सुनने में लगता है, क्योंकि दूसरी तरफ़ के लोग यही मानकर चल रहे हैं कि वह है।

उस गुरुवार अभिनव ने पहली बार पहले बोलना शुरू किया। उसने बताया कि वह देवेंद्र पाल नहीं है, कि नंबर उसे कंपनी ने दिया है, और कि अट्ठाईस मार्च को उसे अदालत जाना है। उधर देर तक कोई आवाज़ नहीं आई। फिर औरत ने कहा, ‘मुझे मालूम है कि आप वो नहीं हैं।’ अभिनव ने पूछा कि फिर वे हर हफ़्ते फ़ोन क्यों करती हैं। उसने कहा, ‘क्योंकि यही नंबर बचा है।’

📚 यह भी पढ़ें दूसरा चेहरा
दूसरा चेहरा

वह देवेंद्र पाल की पत्नी थी। दो साल से हर गुरुवार को, उसी वक़्त, वह उस नंबर पर फ़ोन करती आई थी, क्योंकि दो साल पहले गुरुवार की रात नौ बजकर दस मिनट पर उसकी आख़िरी बात हुई थी। आठ महीने पहले तक फ़ोन बंद मिलता था। फिर एक दिन घंटी गई। दो साल में पहली बार। वह दिन उसे ठीक-ठीक याद था।

अट्ठाईस मार्च को वह अदालत आई। आने की उसे कोई ज़रूरत नहीं थी और किसी ने उससे कहा भी नहीं था। जज ने पूछा कि क्या वह इस आदमी को पहचानती है। उसने अभिनव की तरफ़ देखा और कहा कि नहीं। फिर उसने यह भी बताया कि उसके पति का नंबर अब इस आदमी के पास है और यह बात कंपनी के रिकॉर्ड से साबित हो सकती है। अभिनव का नाम उसी दिन मुक़दमे से हट गया। पंद्रह मिनट लगे।

बाहर सीढ़ियों पर अभिनव ने उससे कहा कि वह नंबर छोड़ देगा और वे उसे ले सकती हैं। उसने मना कर दिया। उसने कहा कि नंबर अब उनका है और उन्हें ही रखना चाहिए। इसके बाद वे चली गईं और अभिनव ने उन्हें फिर कभी नहीं देखा। फ़ोन उसने नहीं बदला। गुरुवार को नौ बजकर दस मिनट पर अब भी कभी-कभी घंटी बजती है, हर हफ़्ते नहीं, महीने में एकाध बार, कभी उससे भी कम। अभिनव उठा लेता है और पहले कुछ नहीं बोलता।