सुनीता आठ बरस से समूह में थी और आठ बरस में एक क़िस्त नहीं छूटी थी।
समूह दस औरतों का था। बैंक उन्हें एक साथ क़र्ज़ देता है और वसूली भी एक साथ करता है। किसी एक की क़िस्त छूटे तो वह बाक़ी नौ को भरनी पड़ती है, और अगर वह भी न भरे तो पूरे समूह का नाम ख़राब होता है।
यह कोई सज़ा नहीं है। यही उस क़र्ज़ की बुनियाद है। बैंक के पास इन औरतों की कोई ज़मानत नहीं होती। ज़मानत यह है कि वे एक-दूसरे को जानती हैं।
सुनीता समूह की सचिव थी। माँगकर नहीं बनी थी। वह हिसाब सबसे जल्दी लगा लेती थी, इसलिए बना दी गई थी।
समूह की बैठक हर मंगलवार को होती है और उसमें आधा घंटा लगता है। सब आती हैं, अपनी क़िस्त रखती हैं, सुनीता कॉपी में लिखती है, और सब चली जाती हैं। आठ बरस में यह इतनी बार हो चुका था कि किसी को यह काम नहीं लगता था। इस बंदोबस्त का सबसे मज़बूत हिस्सा यही था, और सबसे कमज़ोर भी यही।
मज़बूत इसलिए कि हर हफ़्ते सामने आना पड़ता है और कोई पीछे नहीं छिप सकता। कमज़ोर इसलिए कि लिखने वाली एक ही है और उसकी कॉपी कोई नहीं देखता।
उसका भाई कमलेश्वर उससे तीन बरस छोटा था।
वह अपना काम करता था। पुराने ट्रैक्टरों के पुर्ज़े ख़रीदकर बेचना, कभी-कभी ट्रैक्टर ही। इस काम में पैसा एक साथ लगता है और एक साथ लौटता है।
पिछले चार बरसों में वह चार बार सुनीता के पास आया था और चारों बार लौटा चुका था।
रक़म हर बार अलग थी और हर बार वापस आई थी। पहली बार आठ हज़ार, दो महीने में। दूसरी बार पंद्रह, तीन महीने में। तीसरी और चौथी बार बीस-बीस, और दोनों बार पैसा वादे से पहले आया।
जो आदमी चार बार वक़्त पर लौटा चुका हो, उससे पाँचवीं बार सवाल नहीं किया जाता। यह भरोसा नहीं है। यह हिसाब है, और सुनीता का हिसाब हमेशा सही रहता था।
चारों बार वह जेठ और अगहन में आया था।
यह बात सुनीता ने नोट की थी और उसने इसका मतलब नहीं निकाला था, क्योंकि मतलब निकालने की कोई वजह नहीं थी। दोनों महीने ख़रीद के महीने हैं और उसने यही समझा।
पाँचवीं बार वह अगहन में आया और उसे साठ हज़ार चाहिए थे।
सुनीता के पास नहीं थे।
जो उसके पास था, वह यह था कि समूह उस महीने अपना अगला क़र्ज़ लेने वाला था और उसमें हर औरत का हिस्सा तय होता है।
उसने समूह से बड़ा क़र्ज़ लेने की बात रखी और वह मान ली गई, क्योंकि सचिव ने रखी थी और आठ बरस का रिकॉर्ड साफ़ था।
अपना हिस्सा उसने कमलेश्वर को दे दिया।
यह चोरी नहीं थी। पैसा उसका अपना हिस्सा था और वह उसे जहाँ चाहे लगा सकती थी।
जो नियम टूटा, वह यह था कि क़र्ज़ का हिस्सा उसी काम में लगना चाहिए जो फ़ॉर्म में लिखा हो। सुनीता के फ़ॉर्म में सिलाई मशीन लिखी थी।
क़िस्त हर हफ़्ते जमा होती है, मंगलवार को।
चौथे मंगलवार को कमलेश्वर के पास पैसे नहीं थे।
पाँचवें को भी नहीं।
सुनीता ने दोनों हफ़्ते अपने घर से भरा और घर में नहीं बताया।
छठे हफ़्ते उसने भाई से पूछा कि पैसा गया कहाँ।
और तब उसे वह मालूम हुआ जो चार बरस से उसकी आँखों के सामने था।
कमलेश्वर पुर्ज़े नहीं ख़रीदता था। वह ख़रीदता तो था, पर उसका असली हिसाब यह था कि उसने एक साहूकार से पैसा ले रखा था और उस पर हर छह महीने में ब्याज देना पड़ता था।
जेठ और अगहन।
चार बरस से सुनीता उसके ब्याज की तारीख़ पर पैसा दे रही थी और उसे यह नहीं मालूम था।
अब उसके सामने तीन चीज़ें थीं और तीनों की तारीख़ मंगलवार थी।
पहली यह कि वह समूह में बता दे। बताने पर पैसा नौ औरतें मिलकर भर देतीं, क्योंकि नियम यही है। और उसके बाद आठ बरस ख़त्म हो जाते।
दूसरी यह कि वह चुप रहे और भरती रहे। घर का महीना का ख़र्च साढ़े चार हज़ार था और क़िस्त हर हफ़्ते बारह सौ की थी।
तीसरी यह कि वह कुछ बेचे।
उसके पास बेचने लायक़ दो चीज़ें थीं। भैंस, जिससे घर चलता था। और सोना, जो उसकी बेटी का था।
उसने सोना बेचा। बाईस ग्राम।
वह सोना उसकी बेटी का था, इस मायने में कि वह उसकी शादी के लिए रखा था। बेटी उस वक़्त तेरह की थी और उसे यह मालूम नहीं था कि कितना है। घर में यह बात नहीं होती, क्योंकि गिनती बता देने से लड़की उसे अपना समझने लगती है और फिर उसमें से कुछ निकालना मुश्किल हो जाता है।
बेचने के लिए उसे क़स्बे जाना पड़ा और वहाँ दुकानदार ने पहचान का काग़ज़ माँगा। सुनीता के पास आधार था। उस पर्ची पर तारीख़ पड़ी और वह पर्ची उसने रख ली।
क़िस्तें चलती रहीं और समूह को कभी पता नहीं चला। साल के आख़िर में बैंक ने उस समूह को अच्छे रिकॉर्ड के लिए एक प्रमाणपत्र दिया और उस पर सुनीता के दस्तख़त थे।
कमलेश्वर ने पैसा लौटाया।
तीन बरस में, थोड़ा-थोड़ा करके, पूरा। वह उसे हर महीने कुछ न कुछ देता रहा और उसने कभी नागा नहीं किया, और यह भी सच है और इसे कहा जाना चाहिए।
पूरा पैसा लौटने पर सुनीता ने सोना ख़रीदा।
उसी दुकान से, उसी तरह का, उसी दिन की क़ीमत पर।
बीस ग्राम आया।