हाज़िरी रजिस्टर में उस दिन बयालीस नाम थे। मीरा ने गिने, क्योंकि परीक्षा फ़ॉर्म की सूची में अड़तीस थे। चार का फ़र्क़। उसने सोचा कि गिनने में उसी से चूक हुई होगी, इसलिए दोबारा गिना। फ़र्क़ वही रहा। दसवीं की क्लास थी, दिसंबर का महीना था, और मीरा को उस स्कूल में पढ़ाते हुए चार महीने हुए थे।
स्कूल क़स्बे का सबसे अच्छा स्कूल माना जाता था, और इसकी एक ठोस वजह थी। बोर्ड का नतीजा नौ साल से सौ फ़ीसदी चला आ रहा था। हर साल दो-तीन बच्चे ज़िले की सूची में आते और उनकी तस्वीरें गेट पर लगतीं। दाख़िले के लिए लोग दूर-दूर से आते थे। मीरा प्रोबेशन पर थी, ग्यारह महीने का करार, और उसके पिता का डायलिसिस हफ़्ते में दो बार चलता था।
मीरा ने स्टाफ़ रूम में यह बात यूँ ही कह दी कि चार बच्चों के फ़ॉर्म छूट गए लगते हैं। बगल में बैठी शर्मा मैडम ने काग़ज़ से सिर नहीं उठाया और कहा कि वे चारों प्राइवेट भर रहे हैं। मीरा ने पूछा कि दसवीं के बच्चे प्राइवेट क्यों भरेंगे, जब वे स्कूल में पढ़ ही रहे हैं। शर्मा मैडम ने इस बार सिर उठाया। कुछ देर देखने के बाद उन्होंने कहा कि नई हो, धीरे-धीरे समझ जाओगी।
कड़ी से कड़ी जुड़ी
वे चार बच्चे मीरा की ही क्लास में बैठते थे। रोज़ आते थे, फ़ीस भरते थे, यूनिफ़ॉर्म पहनते थे। उनमें एक लड़की थी, सलमा, जिसकी गणित कमज़ोर थी और बाक़ी सब ठीक। एक लड़का था जो हकलाता था। एक के पिता रिक्शा चलाते थे। चौथा वह लड़का था जो पिछले साल एक बार फ़ेल हो चुका था। चारों के नंबर स्कूल के औसत से नीचे थे।
मीरा को पूरी बात समझने में तीन दिन लगे। स्कूल उन बच्चों को निकालता नहीं था, क्योंकि निकालने पर फ़ीस जाती और शिकायत होती। स्कूल उनका बोर्ड फ़ॉर्म अपने नाम से नहीं भरता था। बच्चा प्राइवेट परीक्षार्थी बन जाता, और उसका नतीजा चाहे जो हो, स्कूल के नतीजे में नहीं गिना जाता। नौ साल का सौ फ़ीसदी इसी तरह बना था। यह किसी नियम का उल्लंघन नहीं था। बस किसी को बताया नहीं जाता था।
मीरा सलमा के घर गई। उसके पिता ने बताया कि प्रिंसिपल साहब ने समझाया है कि प्राइवेट भरने से बच्ची पर दबाव कम रहेगा और तैयारी का वक़्त मिल जाएगा। उन्हें यह नहीं बताया गया था कि प्राइवेट परीक्षार्थी को स्कूल की प्रैक्टिकल क्लास नहीं मिलती, न यह कि फ़ॉर्म की तारीख़ अलग होती है और फ़ीस ज़्यादा लगती है। वे पढ़े-लिखे नहीं थे, पर नासमझ भी नहीं थे। उन्होंने मीरा से एक ही बात पूछी: इससे बच्ची का नुक़सान तो नहीं होगा।
स्कूल के नाम से फ़ॉर्म भरने की आख़िरी तारीख़ इकतीस दिसंबर थी। उसके बाद कुछ नहीं हो सकता था, न प्रिंसिपल से, न बोर्ड से। उस दिन बीस दिसंबर था। मीरा ने कैलेंडर पर कोई निशान नहीं लगाया, पर तारीख़ उसे याद रहने लगी, वैसे ही जैसे पिता के डायलिसिस के दिन याद रहते थे।
मीरा प्रिंसिपल से मिली। उन्होंने पूरी बात सुनी और चाय मँगवाई। फिर उन्होंने कहा कि यह फ़ैसला अध्यापकों का नहीं, ट्रस्ट का होता है, और ट्रस्ट यह देखता है कि स्कूल चलता रहे। उन्होंने यह भी कहा कि नतीजा गिरा तो अगले साल दाख़िले गिरेंगे, दाख़िले गिरे तो तनख़्वाहें रुकेंगी, और तब चार बच्चे नहीं, चार सौ बच्चे इसकी चपेट में आएँगे। यह तर्क बेतुका नहीं था। मीरा को यही सबसे बुरा लगा।
जो सबूत सामने नहीं था
अगले दिन उसने दफ़्तर से पिछले पाँच साल के हाज़िरी रजिस्टर माँगे, यह कहकर कि उसे एक प्रोजेक्ट बनाना है। क्लर्क ने दे दिए। मीरा ने शाम तक हर साल की गिनती मिलाई और मोबाइल से पन्नों की तस्वीरें लीं। पाँच साल में इकसठ बच्चे। इकसठ फ़ॉर्म जो स्कूल के नाम से नहीं भरे गए। उसने तस्वीरें अपने ईमेल पर भेजीं और फ़ोन से हटा दीं।
दो दिन बाद वे रजिस्टर दफ़्तर की अलमारी से हटा दिए गए। क्लर्क ने बताया कि ट्रस्ट के दफ़्तर भिजवा दिए गए हैं, ऑडिट के लिए। उसी शाम अस्पताल से मीरा की माँ का फ़ोन आया कि कोई आदमी आया था और पिता के इलाज के बारे में पूछ रहा था। वह यह भी पूछ रहा था कि ख़र्चा कौन उठाता है। उसने अपना नाम नहीं बताया था।
मीरा उस रात अस्पताल में ही रुकी। पिता सो रहे थे और मशीन की आवाज़ लगातार आ रही थी। उसने पहली बार यह सोचा कि नौकरी जाने का मतलब क्या होता है, ठीक-ठीक, रुपयों में। डायलिसिस के एक चक्कर का दो हज़ार दो सौ। महीने में नौ चक्कर। उसकी तनख़्वाह अठारह हज़ार थी। उसने हिसाब दो बार लगाया, जैसे दूसरी बार में कोई और जवाब निकल आएगा।
अगले दिन उसने वकील से बात नहीं की, बोर्ड को चिट्ठी नहीं लिखी, अख़बार में नहीं गई। उसने सिर्फ़ चार परिवारों से बात की। उसने उन्हें बताया कि फ़ॉर्म स्कूल के नाम से भरा जा सकता है और उसकी आख़िरी तारीख़ इकतीस है। चारों की फ़ीस चार हज़ार आठ सौ पड़ती। दो परिवारों के पास इतना पैसा नहीं था। मीरा ने वह पैसा दिया, और इसके लिए उसने उस जमापूँजी में हाथ लगाया जो पिता के अगले महीने के लिए रखी थी।
अट्ठाईस दिसंबर को वह चारों बच्चों और उनके अभिभावकों के साथ बोर्ड के ज़िला दफ़्तर गई। फ़ॉर्म पर स्कूल की मुहर चाहिए थी। मुहर प्रिंसिपल के कमरे में रहती थी और मीरा ने वह माँगी नहीं। उसने बोर्ड के क्लर्क को बताया कि बच्चे स्कूल में ही पढ़ रहे हैं और हाज़िरी रजिस्टर इसका सबूत है, और ईमेल खोलकर तस्वीरें दिखा दीं। क्लर्क ने आधा घंटा लिया। फिर उसने फ़ॉर्म ले लिए।
तीन जनवरी को मीरा को बुलाया गया। कोई डाँट नहीं पड़ी और कोई काग़ज़ नहीं दिखाया गया। प्रिंसिपल ने कहा कि प्रोबेशन का करार मार्च में ख़त्म हो रहा है और उसे आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। कारण के ख़ाने में लिखा गया: पारस्परिक सहमति। मीरा ने उस पर दस्तख़त कर दिए, क्योंकि लड़ने का मतलब था कि मामला ट्रस्ट के दफ़्तर तक जाता, और चार फ़ॉर्म वहाँ से निकल चुके थे।
बोर्ड का नतीजा जून में आया। सलमा पास हुई, गणित में इकतालीस नंबर से। हकलाने वाला लड़का पास हुआ। रिक्शा वाले का बेटा अच्छे नंबरों से पास हुआ। चौथा लड़का फ़ेल हो गया, दो विषयों में। उस साल स्कूल का नतीजा सत्तानवे फ़ीसदी रहा, और गेट पर तस्वीरें उसी तरह लगीं।
मीरा अब बग़ल के क़स्बे के एक सरकारी स्कूल में पढ़ाती है, जहाँ नतीजा कभी सौ फ़ीसदी नहीं रहा और किसी को इससे कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता। पिता का डायलिसिस चल रहा है। हर साल दिसंबर में, फ़ॉर्म भरने से पहले, वह हाज़िरी रजिस्टर उठाती है और परीक्षा की सूची के साथ रखकर गिनती है। अब तक दोनों गिनतियाँ बराबर निकली हैं। वह फिर भी गिनती है।