शबाना के काम में सबसे मुश्किल हिस्सा दाँत नहीं, मुस्कान होती है। दाँत नाप से बनते हैं। मुस्कान अंदाज़े से। अमीनाबाद की उस गली में उसकी दुकान तीसरी मंज़िल पर थी, बिना बोर्ड के, और लोग डॉक्टर की पर्ची लेकर सीधे ऊपर आ जाते थे। वह प्लास्टर का साँचा बनाती, उस पर मोम चढ़ाती, और फिर वह चीज़ बनाती जो आदमी के चेहरे को वापस उसका चेहरा बना देती है।

हर साँचे पर वह नंबर डालती थी और नंबर कॉपी में लिखती थी, तारीख़ और नाम के साथ। साँचे तीन साल रखे जाते हैं। तीन साल बाद अलमारी भर जाती है और पुराने साँचे कबाड़ी को चले जाते हैं, बोरी के भाव। यह कोई नियम नहीं था। जगह कम थी, बस इतनी बात थी।

जेठ की एक दोपहर एक आदमी आया जिसने नाम नहीं बताया। नक़द दिया, पूरा, पहले ही दिन। उसकी बात में एक ही चीज़ अजीब थी। उसने कहा कि दाँत पहले जैसे नहीं चाहिए। शबाना ने पूछा कि पुरानी तस्वीर है क्या, ताकि मिलाया जा सके। आदमी ने कहा कि तस्वीर है, और वही दिक़्क़त है।

जब वक्त कम पड़ने लगा

उसने वही बनाया जो कहा गया। सामने के दो दाँत ज़रा चौड़े, नीचे की क़तार सीधी, और वह हल्का सा टेढ़ापन जो हर असली मुँह में होता है, वह उसने जान-बूझकर दूसरी तरफ़ डाल दिया। आदमी ने आईने में देखा और मुस्कुराया। शबाना ने पैंतीस साल में हज़ार मुँह देखे थे। उस मुस्कान में कुछ नहीं था। न ख़ुशी, न राहत। बस जाँच।

आठ दिन बाद वह लौटा, जैसा हर मरीज़ लौटता है, क्योंकि नया सेट पहले हफ़्ते मसूड़े छीलता है। शबाना ने उसे बैठाकर किनारे घिसे। उस दौरान उसने देखा कि आदमी के दाहिने हाथ की दो उँगलियाँ टेढ़ी थीं, पुरानी टूट की तरह जो ठीक से नहीं जुड़ी। उसने इसका ज़िक्र नहीं किया। मुँह के अलावा किसी चीज़ के बारे में न पूछना उसके काम का हिस्सा था। जाते वक़्त आदमी ने पूछा कि साँचा कितने दिन रखेंगी। शबाना ने कहा, तीन साल। वह कुछ देर रुका। फिर बोला कि ठीक है, और सीढ़ियाँ उतर गया।

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चार महीने बाद दो लोग आए। एक वर्दी में था, एक नहीं। उन्होंने एक लाश की बात की जो गोमती के पास मिली थी और जिसका चेहरा पहचान में नहीं आ रहा था। दाँत बचे थे। उन्होंने पूछा कि क्या शबाना के पास ऐसा कोई रिकॉर्ड है।

शबाना ने कॉपी खोली और तभी रुक गई। वर्दी वाला उसके पीछे खड़ा था और कॉपी की तरफ़ नहीं देख रहा था। वह अलमारी की तरफ़ देख रहा था, जहाँ साँचे रखे थे। पुलिस को साँचा नहीं चाहिए होता। पुलिस को नंबर चाहिए होता है, और नंबर कॉपी में था।

बिना वर्दी वाले ने पूछा कि पुराने साँचे कब फेंके जाते हैं। शबाना ने कहा, तीन साल पर। उसने पूछा, इस बार कब। शबाना ने तारीख़ बता दी, तीस तारीख़, और कहते ही उसे लगा कि यह बताना नहीं चाहिए था।

सच सामने आया

उस दिन के बाद उसने अलमारी नहीं खोली। तीस तारीख़ में ग्यारह दिन थे।

थाने जाने का मतलब उसी आदमी के पास जाना था जो अलमारी देख रहा था। किसी और थाने जाने का मतलब यह बताना कि वह पहले वाले पर शक करती है, और शक की कोई वजह उसके पास नहीं थी, सिवाय इसके कि एक आदमी ने ग़लत चीज़ की तरफ़ देखा था। यह अदालत में कुछ नहीं होता।

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उसने वही किया जो वह जानती थी। साँचे से एक और साँचा बनाया, प्लास्टर में, और उस पर कोई नंबर नहीं डाला। उसे कपड़े में लपेटकर, डिब्बे में रखकर, अपने ही नाम से डाकघर भेज दिया, घर के पते पर नहीं। रसीद उसने ब्लाउज़ में रखी। असली साँचा अलमारी में जहाँ था, वहीं रहा।

छब्बीस तारीख़ की रात दुकान में आग लगी। सीढ़ी लकड़ी की थी और तीसरी मंज़िल तक पानी नहीं पहुँचता। सुबह तक अलमारी, कॉपी, औज़ार, सब जल चुका था। दमकल वालों ने बिजली का शॉर्ट लिखा। जेठ में शॉर्ट आम बात है।

शबाना ने चार दिन इंतज़ार किया, फिर डाकघर से डिब्बा उठाया और लखनऊ से बाहर, बाराबंकी में एक वकील के हाथ जमा कर दिया। साँचे से दाँत मिल गए। लाश का नाम निकला, और नाम निकलते ही पता चला कि वह आदमी काग़ज़ों में दो साल पहले मर चुका था। उसका बीमा भी उठाया जा चुका था।

अदालत में वकील ने पूछा कि वह कैसे कह सकती है कि साँचा उसी आदमी का है। शबाना ने कहा कि साँचा बनाते वक़्त उसकी अपनी उँगलियों के निशान प्लास्टर के किनारों पर बैठ जाते हैं, और वह अपने निशान पहचानती है। वकील हँसा। जज नहीं हँसे। साँचा रिकॉर्ड पर ले लिया गया।

मुक़दमा चला और शबाना गवाह बनी। दुकान का बीमा नहीं था। औज़ार पैंतीस साल में जुटे थे और दोबारा नहीं जुटे। अब वह घर के एक कमरे में काम करती है, कम काम, और साँचे अब वह छह महीने से ज़्यादा नहीं रखती।

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पिछले हफ़्ते एक औरत आई। नाम नहीं बताया, नक़द दिया, और कहा कि दाँत पहले जैसे नहीं चाहिए। शबाना ने नाप लिया और कॉपी में तारीख़ लिख ली। उसने यह नहीं पूछा कि तस्वीर है या नहीं।