पीया उस गाँव की पहली लड़की थी जो रोज़ बस से क़स्बे पढ़ने गई।

यह वाक्य गाँव में अब भी इसी तरह बोला जाता है, गर्व के साथ, और इसमें कुछ ग़लत नहीं है। पहली होना सचमुच कुछ होता है।

जो इस वाक्य में नहीं आता, वह यह है कि उसकी क़ीमत कहाँ से आई।

बस सुबह छह पचास पर चलती है और शाम को साढ़े पाँच पर लौटाती है। किराया दोनों तरफ़ का चौबीस रुपये था। महीने के लगभग छह सौ।

छह सौ रुपये उस घर में कहीं फ़ालतू पड़े नहीं थे।

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घर की आमदनी दो जगह से थी। ढाई बीघे का खेत, जिससे साल भर का अनाज निकल आता था और नक़द बहुत कम। और पीया के पिता, जो पास की चीनी मिल में मौसमी काम करते थे, यानी साल में पाँच महीने।

बाक़ी सात महीनों का ख़र्च दूध से चलता था। भैंस एक थी और अच्छी थी।

पहला हिस्सा घर के काम से निकला।

पीया के ज़िम्मे भैंस थी, दोनों वक़्त। सुबह का दुहना, चारा, और गोबर। यह काम पौने छह बजे शुरू होता है और आठ बजे तक चलता है, और बस छह पचास पर है।

तो वह काम कौशल्या के पास चला गया। पूरा का पूरा।

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कौशल्या उसकी माँ थीं और उस वक़्त उनकी उम्र उनचास थी।

उनके दाहिने घुटने में तकलीफ़ चार बरस से थी। बैठने में नहीं होती थी। उठने में होती थी, और गोबर उठाने में आदमी बीस-पच्चीस बार बैठता-उठता है।

यह किसी ने तय नहीं किया। पहले हफ़्ते कौशल्या ने कहा कि आज मैं कर लेती हूँ। दूसरे हफ़्ते भी। तीसरे हफ़्ते से कहना बंद हो गया।

जो चीज़ इस तरह शुरू होती है, वह ख़त्म नहीं होती। उसकी कोई तारीख़ नहीं होती, इसलिए उसे गिना भी नहीं जाता। तीन बरस बाद अगर कोई पूछता कि भैंस कौन देखता है, तो घर में सबका जवाब यही होता कि अम्मा देखती हैं, जैसे यह हमेशा से ऐसा ही रहा हो।

दूसरा हिस्सा भाई से निकला।

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पीया का भाई उससे दो बरस छोटा था और वह उन दिनों नौवीं में था। गाँव में गणित की एक ट्यूशन चलती थी, महीने के तीन सौ।

वह उस बरस छूट गई। तीन सौ बचे।

गणित नौवीं में ही बिगड़ता है और दसवीं में उसका असर दिखता है। लड़का दसवीं में गणित में बैठा और पास हो गया, पर उतने नंबर नहीं आए जितने से आगे विज्ञान मिलता।

उसने वाणिज्य ले लिया और उसमें उसका मन नहीं लगा। बारहवीं के बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी और एक दुकान पर लग गया।

इसकी भी कोई घोषणा नहीं हुई। बस फ़ीस देनी बंद हो गई और लड़का जाना बंद हो गया, और घर में यह बात नहीं उठी क्योंकि उठाने पर एक ही सवाल निकलता।

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पीया को यह दोनों बातें मालूम थीं।

यह कहना कि उसे मालूम नहीं था, आसान होता और झूठ होता। वह भैंस के पास से निकलकर बस पकड़ने जाती थी और उसे माँ का उठना दिखता था।

वह क्या करती, इसका कोई अच्छा जवाब नहीं है। पढ़ाई छोड़ देती तो घुटना ठीक नहीं हो जाता और भाई की ट्यूशन शुरू नहीं हो जाती। एक कम आदमी वाले घर में हर चीज़ किसी और चीज़ की जगह लेती है।

एक बार उसने कोशिश की थी। दूसरे बरस की सर्दियों में उसने कहा था कि वह हफ़्ते में तीन दिन जाएगी और बाक़ी दिन घर पर पढ़ेगी। कौशल्या ने मना कर दिया।

मना करने की वजह वात्सल्य नहीं थी। कौशल्या ने कहा कि तीन दिन जाने वाली लड़की के बारे में गाँव में जो बात चलेगी, वह अलग होगी, और वह बात एक बार चल गई तो रुकती नहीं। यह भी एक हिसाब था और यह भी सही था।

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उसने पढ़ाई नहीं छोड़ी।

तीन बरस बस से गई। एक बरस भी नागा नहीं किया, सिवाय उन दिनों के जब बस नहीं चली।

बस अक्सर नहीं चलती थी। बरसात में सड़क का एक हिस्सा डूब जाता है और तब तीन-चार दिन बंद रहती है। उन दिनों वह पैदल जाती थी, आधा रास्ता, और आधे पर किसी न किसी की मोटरसाइकिल मिल जाती थी। उन दिनों घर पर बात होती थी और उस बात का कोई नतीजा नहीं निकलता था।

डिग्री के बाद उसे क़स्बे के एक निजी स्कूल में नौकरी मिल गई। तनख़्वाह छोटी थी, पर तय थी।

पहले बरस उसने घर का उधार उतारा। ग्यारह हज़ार का था।

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दूसरे बरस भाई को दोबारा पढ़ाई पर लगाया, जो अब उसकी उम्र से दो बरस पीछे था और जिसने बीच में एक बरस दुकान पर काम किया था।

तीसरे बरस उसने माँ का घुटना दिखाया। पहली बार।

शहर के अस्पताल में। जाँच में पता चला कि गद्दी घिस चुकी है और अब सिर्फ़ ऑपरेशन बचा है।

ऑपरेशन हुआ और अच्छा हुआ। कौशल्या अब चलती हैं और सीढ़ी भी चढ़ लेती हैं, धीरे-धीरे।

डॉक्टर ने सिर्फ़ एक बात कही थी, और वह बुरे मन से नहीं कही थी। उसने काग़ज़ देखकर कहा कि तकलीफ़ पुरानी है।

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पीया ने पूछा कि कितनी पुरानी है।

डॉक्टर ने कहा कि सात-आठ बरस तो हुए ही होंगे, और यह भी कि अगर यह चार बरस पहले हो जाता तो गद्दी इतनी नहीं घिसती।

चार बरस पहले पीया की डिग्री का दूसरा साल था। उस बरस भैंस भी वही थी और गोबर भी उतना ही था।