सुखराज के पास कुछ नहीं था, और यह बात वह जानता था। न ज़मीन, न जान-पहचान, न ऐसा कोई रिश्तेदार जो एक फ़ोन कर दे। जो था, वह एक ज़िद थी। बचपन से वह यही सुनता आया था कि इस लड़के में कुछ ख़ास नहीं है।

उसका सपना उतना बड़ा नहीं था जितना लोग समझते हैं। वह लेबर चौक पर खड़ा होता था, सुबह छह बजे, चालीस-पचास आदमियों के साथ। गाड़ियाँ आतीं। ठेकेदार उतरता और उँगली से आदमी चुनता। तीन दिन काम मिलता, दो दिन नहीं। सुखराज को बस इतना चाहिए था कि किसी दिन उसे चुना न जाए, बुलाया जाए। एक रात पहले, फ़ोन पर, नाम लेकर।

यह होता कैसे है, यह उसने चौक पर खड़े-खड़े ही समझ लिया। चालीस आदमियों में से चार को कभी खड़ा नहीं होना पड़ता था। वे सुबह सीधे साइट पर पहुँचते थे। चारों के पास एक-एक ऐसा काम था जो बाक़ी छत्तीस को नहीं आता था। एक टाइल का कटिंग मास्टर था, एक लोहे का बेंडर।

सुखराज ने अपने लिए जो चुना, वह सीढ़ी की शटरिंग थी। छत की शटरिंग सब कर लेते हैं। सीढ़ी दूसरी चीज़ है। उसमें माफ़ी नहीं है। हर पायदान की ऊँचाई एक जैसी होनी चाहिए और चौड़ाई एक जैसी, और अगर अठारह पायदानों में कहीं आधा इंच का फ़र्क़ रह जाए तो चढ़ने वाले का पैर वहीं अटकता है, हर बार, तीस साल तक। इसीलिए इस काम के पैसे अलग होते हैं और करने वाले कम।

सीखने का कोई रास्ता नहीं था। कोई मिस्त्री यह सिखाता नहीं, क्योंकि सिखाने का मतलब है अपना ही रेट गिराना। सुखराज दिन में बेलदारी करता था और शाम को उन साइटों के चक्कर काटता था जहाँ सीढ़ी बन रही हो। दूर से देखता, फिर घर आकर याद करने की कोशिश करता, और हर बार बीच में कुछ छूट जाता।

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फिर उसने एक तरीक़ा ख़ुद निकाला। साइटों से बची हुई प्लाई की कतरनें उठाकर वह अपने कमरे में ले आया और छह गुना छोटी एक सीढ़ी बनाई, पूरी शटरिंग समेत। बनाता, खोलता, फिर बनाता। रातें सबसे मुश्किल थीं। नींद असली दुश्मन थी। दिन भर की बेलदारी के बाद बैठते ही आँख लग जाती थी, इसलिए वह खड़े होकर काम करता था, और नींद आने पर चेहरे पर पानी मारकर फिर खड़ा हो जाता।

दो साल में उस कमरे में उसने चौंतीस बार वह सीढ़ी बनाई। पड़ोसी समझते थे कि लड़के का दिमाग़ हिल गया है। एक बार मकान मालिक ने किराया माँगते हुए कहा कि इतनी मेहनत सही काम में लगाता तो कुछ बन जाता।

पहला असली काम उसे तीसरे साल मिला, और उसने वह रेट से नीचे लिया, क्योंकि उसे काम नहीं, नाम चाहिए था। सोलह पायदान की सीढ़ी, एक मकान की पहली मंज़िल। उसने माप ली, शटरिंग बाँधी, ढलाई हो गई।

ग़लती बीस दिन बाद पकड़ में आई, जब रेलिंग वाला आया। ऊपर की तरफ़ के चार पायदान बाक़ी बारह से पंद्रह मिलीमीटर ऊँचे थे। नंगी आँख से कुछ नहीं दिखता था। पंद्रह मिलीमीटर कुछ नहीं होते। पर चढ़ते हुए तेरहवें पर पैर अटकता था, और एक बार जिसे यह पता चल जाए, उसे हर बार अटकता है।

मकान मालिक ने कहा कि रहने दो। सुखराज ने नहीं माना। ऊपर के चार पायदान तोड़े गए और दोबारा डाले गए, और मलबा, मज़दूरी और सीमेंट मिलाकर उन्नीस हज़ार लगे, जो उसकी पूरी बचत थी और उसमें से कुछ उधार भी था। उस महीने उसने कमरा छोड़ दिया और साइट पर सोना शुरू कर दिया। यह ग्यारह महीने चला। कमरा छोड़ते वक़्त सबसे बड़ी दिक़्क़त प्लाई वाली छोटी सीढ़ी की थी, जिसे रखने की उसके पास कोई जगह नहीं बची थी। उसने उसे तोड़कर साइट की आग में डाल दिया। दो साल की चौंतीस बार वाली चीज़ थी और जलने में उसे दस मिनट लगे।

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दूसरा काम उसे उसी मकान मालिक के भाई से मिला, और वह इसी वजह से मिला। इस बार उसने लकड़ी छूने से पहले पूरा दिन सिर्फ़ नाप में लगाया। ऊपर से नीचे तक की कुल ऊँचाई नापी, उसे पायदानों की गिनती से बाँटा, और हर पायदान का निशान दीवार पर पहले लगा दिया, अठारह के अठारह, तब जाकर कोई प्लाई काटी। सीढ़ी सही उतरी। तीसरा काम बिना माँगे आया। फिर चौथा। पाँचवें तक उसने रेट से नीचे लेना बंद कर दिया, और सातवें के बाद उसे किसी को अपना काम दिखाने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

इससे आगे कुछ बड़ा नहीं हुआ, और यह भी सच्चाई का हिस्सा है। न कोई ठेकेदारी। न कोई दुकान। न कोई बड़ा आदमी बनना। सुखराज आज भी दिहाड़ी पर काम करता है और ग्यारह सौ रुपये दिन के लेता है, जो उस चौक के औसत से चार सौ ज़्यादा है। जिस मोहल्ले में लोग कहते थे कि ग़रीब कभी अमीर नहीं बनता, वे लोग आज भी यही कहते हैं, और ज़्यादातर मामलों में वे ग़लत भी नहीं हैं।

जिन दिनों काम नहीं होता, वह अब भी छह बजे चौक पर जाकर खड़ा हो जाता है, बाक़ी सबके साथ, और वहाँ वह किसी और की तरह ही एक आदमी है। बाक़ी दिनों में फ़ोन एक रात पहले आ जाता है, नौ बजे के आसपास, जब वह खा चुका होता है। उधर से कोई उसका नाम नहीं लेता। बस इतना कहता है कि कल सुबह सात बजे पहुँच जाना, सीढ़ी वाले।