मेंड़ का पत्थर छोटा होता है और ज़मीन से मुश्किल से एक बालिश्त बाहर रहता है। उसे सरकाने में दो आदमियों को दस मिनट लगते हैं और अगर मिट्टी गीली हो तो पाँच। पन्नालाल ने उसे सरकते हुए देखा था। पूरा नहीं। आख़िरी हिस्सा।
वह उस रात खेत पर था क्योंकि उसका पंप चोरी होने का डर था और वह पिछले हफ़्ते से वहीं सो रहा था। चाँदनी थी और दूरी लगभग सत्तर क़दम थी। दो आदमी थे। दोनों नंगे पैर थे। एक को वह नहीं पहचान पाया। दूसरा बिरजा था, उसके बड़े भाई का लड़का।
जिस खेत की मेंड़ सरकाई गई वह नज़ीरन का था।
नज़ीरन तीन बरस पहले विधवा हुई थी और उसके पास वह खेत ही था। उसका बेटा सूरत में था और साल में एक बार आता था। खेत वह बटाई पर देती थी और उसी से चलता था।
सुबह उसने देखा कि उसकी मेंड़ भीतर आ गई है। लगभग साढ़े तीन हाथ, पूरी लंबाई में। इतनी ज़मीन बीघे के हिसाब से बहुत नहीं होती, पर उस खेत में वह क़रीब एक बटा छह थी।
उसने पंचायत में कहा।
बिरजा ने मना कर दिया और उसने कहा कि पत्थर वहीं है जहाँ हमेशा से था। यह बात कोई काटता नहीं क्योंकि पुराना पत्थर हट जाने के बाद यह साबित करना मुश्किल होता है कि वह कहाँ था। काग़ज़ में नाप लिखी होती है, पर उस गाँव में पैमाइश उन्नीस बरस से नहीं हुई थी।
पंचायत ने कहा कि गवाह लाओ। गवाह नहीं था। रात में उस तरफ़ कोई नहीं जाता। पन्नालाल दस दिन चुप रहा।
इन दस दिनों में वह दो बार उस मेंड़ तक गया। दोनों बार दिन में गया, इस तरह कि लगे वह अपने खेत की तरफ़ जा रहा है। नई मेंड़ पर मिट्टी अब भी नरम थी और उस पर पैर का निशान बैठ जाता था। पुरानी मेंड़ की लकीर घास के रंग से पहचानी जा सकती थी, क्योंकि उधर की घास तीन बरस से नहीं कटी थी और इधर की कटती रही थी।
उसके भाई ने उससे बात की, और बात करने का तरीक़ा नरम था। उसने कहा कि लड़के से ग़लती हो गई है, कि वह छोटा है, कि घर की बात घर में रहनी चाहिए, और कि ज़मीन वापस करवा दी जाएगी, बस पंचायत में नहीं।
पन्नालाल ने कहा कि ठीक है। उसे तब यही ठीक लगा था। एक महीना बीत गया। ज़मीन वापस नहीं हुई। उसने भाई से दोबारा कहा। जवाब में उसे यह मिला कि अब उसमें बुआई हो चुकी है और अगली फ़सल के बाद देखेंगे।
पंचायत की अगली बैठक असाढ़ में थी।
उससे एक रात पहले पन्नालाल की पत्नी ने उससे कहा कि जो करना है सोच-समझकर करना, क्योंकि लड़की की शादी छह महीने बाद है और शादी में जो लोग आते हैं वे यही लोग हैं। यह बात उसने रोककर नहीं कही, समझाकर कही, और वह सही थी।
पन्नालाल पंचायत में गया और उसने जो देखा था वह कह दिया। उसने सिर्फ़ इतना कहा कि उसने बिरजा को उस रात वहाँ देखा था। दूसरे आदमी का नाम उसने नहीं लिया क्योंकि उसे मालूम नहीं था। पत्थर वापस गड़ा और नाप दोबारा हुई।
नाप में जो निकला वह पन्नालाल के कहे से मिलता था। साढ़े तीन हाथ नहीं, तीन हाथ चार अंगुल। पंचायत ने बिरजा पर जुर्माना नहीं लगाया और यह नज़ीरन ने ख़ुद कहा, कि ज़मीन वापस मिल गई है और उसे और कुछ नहीं चाहिए।
उसके बाद जो हुआ वह धीरे-धीरे हुआ।
पहले उसके भाई ने बोलना बंद किया। फिर भाई के घर से आना-जाना बंद हुआ। फिर वह चचेरी ननद जो हर तीज पर आती थी, वह नहीं आई। तीन महीने में यह इतना फैल गया कि गाँव के आधे घर उसमें आ गए, क्योंकि उन आधे घरों में किसी न किसी की रिश्तेदारी उसी भाई से थी।
शादी माघ में हुई।
तैयारी में जो हाथ चाहिए होते हैं वे नहीं थे। हलवाई बाहर से बुलाना पड़ा, जो पहले कभी नहीं बुलाया गया था, क्योंकि यह काम घर की औरतें कर लेती थीं। मंडप बाँधने में पन्नालाल ख़ुद लगा और उसके साथ दो लड़के थे जो पड़ोस के थे और जिनका इस झगड़े से कोई लेना-देना नहीं था।
लड़की की तरफ़ से जितने लोग होने चाहिए थे उतने नहीं थे। न्योता चालीस घरों में गया था और चौदह आए।
बाक़ी बातें ठीक रहीं। खाना बना, बारात आई, विदाई हुई, और किसी बाहरी को यह नहीं दिखा कि कमी क्या है, क्योंकि कमी सिर्फ़ उन्हें दिखती है जो गिनना जानते हैं। नज़ीरन उन चौदह में थी। सबसे पहले वही आई।
वह सुबह आई और रात तक रही। उसने रसोई में काम किया और विदाई के वक़्त वह उसी तरफ़ खड़ी थी जिस तरफ़ घर के लोग खड़े होते हैं। पन्नालाल ने उससे इस बारे में कुछ नहीं कहा और उसने भी नहीं कहा।
मेंड़ का वह पत्थर अब भी वहीं गड़ा है और उसके चारों तरफ़ सीमेंट डाल दिया गया है, जो पंचायत ने डलवाया था। उस माइनर पर वह अकेला पत्थर है जिसके नीचे सीमेंट है, और गाँव में जिन लोगों को यह मालूम है वे इसका ज़िक्र नहीं करते।