फ़ोन रात के पौने दो बजे आया। पहली घंटी में उठ गया। परसू उठकर बैठ गया और उसने बत्ती जलाए बिना सुना। बरसात में जानवर सबसे ज़्यादा बीमार पड़ते हैं और उसी में उसका काम सबसे ज़्यादा चलता है।

वह कोई डॉक्टर नहीं था और वह ऐसा कहता भी नहीं था। लोग उसे डॉक्टर कह देते थे और वह हर बार टोकता नहीं था, जो शायद उसकी अपनी चूक थी। उसने यह काम अपने चाचा के साथ रहकर सीखा था। सुई लगाना, बुख़ार पहचानना, अफारा उतारना, चोट पर पट्टी बाँधना, और वे दस-बारह दवाएँ जो बार-बार लगती हैं।

बीस बरस में उसने हज़ारों जानवर देखे थे। जो उससे होता था वह वह अच्छा करता था, और उससे ज़्यादा उसने कभी करने की कोशिश नहीं की थी, जो उस लाइन में सबसे बड़ी बात मानी जानी चाहिए और मानी नहीं जाती।

गाँवों में यही चलता है। सरकारी अस्पताल चालीस किलोमीटर दूर है, वहाँ डॉक्टर हफ़्ते में तीन दिन बैठता है, और रात में तो कोई सवाल ही नहीं। इसलिए उसका थैला हर वक़्त तैयार रहता था। फ़ोन सोबरन के घर से था।

उनकी भैंस ब्या रही थी और चार घंटे से ब्या रही थी, और बच्चा नहीं निकल रहा था। परसू पंद्रह मिनट में पहुँच गया। साइकिल से, बारिश में। उसने हाथ धोकर देखा। उसे तुरंत समझ आ गया। बच्चा उलटा था। अगले पैर पीछे मुड़े हुए थे और सिर एक तरफ़ को घूमा हुआ था।

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इसे सीधा करने का काम हाथ का होता है। सिर्फ़ हाथ का।

अंदर हाथ डालकर बच्चे को पीछे धकेलना पड़ता है, फिर पैर एक-एक करके सीधे करने पड़ते हैं, फिर सिर घुमाना पड़ता है, और यह सब जानवर के ज़ोर लगाते रहने के बीच में करना पड़ता है। परसू ने यह होते हुए देखा था। दो बार, और दोनों बार वह किनारे खड़ा था और डॉक्टर के हाथ चल रहे थे।

उसने ख़ुद कभी नहीं किया था। देखना और करना दो अलग चीज़ें हैं और बीच का फ़ासला उस रात उसके सामने खड़ा था। फ़र्क़ यही था और उसे यह पूरी तरह मालूम था। अगर हाथ ग़लत जगह लगे तो बच्चेदानी फट जाती है। फटने के बाद भैंस दो-तीन घंटे में चली जाती है और उसके साथ बच्चा भी।

सोबरन ने कहा कि कुछ करो।

घर में सात लोग खड़े थे और सब उसी की तरफ़ देख रहे थे। बाहर पानी पड़ रहा था और वह पिछले दो दिन से लगातार पड़ रहा था। उस भैंस के दूध से उस घर का महीने का साढ़े सात हज़ार आता था।

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परसू ने अपना थैला बंद कर दिया। वहीं, सबके सामने। उसने कहा कि यह उससे नहीं होगा और इसे अस्पताल ले जाना पड़ेगा। सोबरन ने कहा कि रात के ढाई बजे हैं। 'तो भी।' 'चालीस किलोमीटर है और सड़क कट गई है नहर वाली जगह पर।'

'घूमकर जाना पड़ेगा।' 'साठ हो जाएगा।' परसू ने कहा कि हाँ, साठ हो जाएगा। इसके बाद जो हुआ वह अच्छा नहीं था।

सोबरन ने उससे कहा कि तू बीस बरस से पैसे ले रहा है और आज हाथ खड़े कर रहा है। यह उसने चिल्लाकर कहा और आसपास खड़े लोगों के सामने कहा। परसू ने जवाब नहीं दिया। वह खड़ा रहा।

उसने बस इतना और किया कि उसने अपने फ़ोन से गाड़ी वाले को जगाया और उससे बात करके भाड़ा तय कराया, और उस भाड़े में उसने अपनी जेब से पाँच सौ मिलाए। गाड़ी साढ़े तीन बजे निकली। भैंस को चढ़ाने में पाँच आदमी लगे और उसमें ही आधा घंटा गया।

अस्पताल वे सवा छह बजे पहुँचे और डॉक्टर सात बजे आया। बच्चा निकल आया और वह ज़िंदा था। मादा थी। भैंस उसी दिन शाम को चली गई। पाँच बजे। डॉक्टर ने बताया कि वह बहुत देर तक ज़ोर लगाती रही थी और उसका शरीर उसी में टूट गया, और उसे दो घंटे पहले आना चाहिए था।

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दो घंटे पहले का मतलब यह था कि जब परसू पहुँचा था, तब भी देर हो चुकी थी। यह बात गाँव में इस तरह नहीं फैली। फैली भी नहीं। गाँव में यह फैला कि परसू ने हाथ नहीं लगाया और भैंस चली गई।

इसका जवाब देने का कोई तरीक़ा नहीं था। यह कहना कि हाथ लगाता तो बच्चा भी जाता, ऐसी बात है जिसे कोई मानता नहीं, क्योंकि वह हुई ही नहीं। सोबरन ने उससे दो बरस बात नहीं की।

तीसरे बरस उसकी दूसरी भैंस को अफारा हुआ और उसने परसू को ही बुलाया। परसू गया और उसने वह काम किया जो उसका था। उस रात की बात न तब उठी और न उसके बाद कभी उठी।

उस रात के बाद परसू ने एक चीज़ अपने थैले पर लिख ली।

चमड़े के उस थैले के मुँह पर, अंदर की तरफ़, उसने पेन से अस्पताल का नंबर लिख दिया, और नीचे उस डॉक्टर का भी। जो लोग उसे बुलाते हैं वे कभी-कभी वह नंबर उतार लेते हैं। चार बरस में उसने ग्यारह मामले उधर भेजे हैं और उन ग्यारह की फ़ीस उसे नहीं मिली, और वह हर बार थैला खोलकर नंबर दिखा देता है, क्योंकि मुँह से कहने पर लोग मान नहीं लेते।