बद्री को वह शहतीर चौदह बरस से याद था। याद वह उस रात से था जिस रात उसने उसे चढ़ाया था। स्कूल का वह कमरा दो हज़ार बारह में बना था।
छत लकड़ी की थी, जैसी उस इलाक़े में बनती है। दीवार से दीवार तक आठ शहतीर, उन पर बल्लियाँ, उन पर खपरैल। यह छत सत्तर-अस्सी बरस चलती है, बशर्ते लकड़ी सूखी हो।
सूखी लकड़ी का मतलब है दो बरस छाँव में रखी हुई। धूप में सुखाई लकड़ी ऊपर से सूखती है और अंदर से गीली रहती है, और वह सबसे बुरी होती है।
कच्ची लकड़ी सूखने पर सिकुड़ती है, मुड़ती है, और उसमें दरार आती है। दरार वाला शहतीर टूटता नहीं, पर वह धीरे-धीरे झुकता जाता है और एक दिन बीच से बैठ जाता है। बद्री उस वक़्त इकतीस का था और उसकी अपनी दुकान नए-नए खुली थी।
ठेका उसे मिला था और उसमें आठ शहतीर लगने थे। सात उसके पास सूखे पड़े थे। आठवाँ नाप में छोटा निकला। यह उसकी अपनी चूक थी। उसने नाप लेते वक़्त दीवार की मोटाई जोड़ी नहीं थी और यह बात उसे तब पता चली जब बाक़ी सात चढ़ चुके थे।
उस वक़्त तक उद्घाटन की तारीख़ तय हो चुकी थी और वह अख़बार में भी छप चुकी थी। पंद्रह अगस्त। विधायक आने वाले थे, बच्चे उसी कमरे में बिठाए जाने थे, और तारीख़ में नौ दिन बचे थे। सूखा शहतीर उस नाप का उस पूरे ज़िले में नहीं मिलता।
बद्री ने आरा मशीन वाले से नई लकड़ी ली। वह साल की थी, अच्छी थी, और छह महीने पहले चीरी हुई थी। छह महीने दो बरस नहीं होते और यह उसे तब भी मालूम था।
उसने उसे चढ़ा दिया।
उसने वह बात किसी को नहीं बताई, और यह सोचकर बताई नहीं कि आठ में से एक से क्या होगा, और यह भी सोचकर कि वह ऊपर पानी सोखेगा नहीं, क्योंकि खपरैल के नीचे रहेगा।
उद्घाटन हो गया।
उसके बाद बद्री का काम चल निकला। चौदह बरस में उसने उसी ब्लॉक में इकतालीस छतें डालीं और उसकी दुकान अब तीन आदमियों की थी। उस शहतीर की याद हर बरसात में आती थी। जुलाई के महीने में, जब बारिश लगातार पड़ती है, वह याद और भारी हो जाती थी।
इस बरस उसने बैठकर हिसाब लगाया। कोरे काग़ज़ पर नहीं, अपने मन में, जैसे बढ़ई लगाता है। कच्ची लकड़ी बारह-पंद्रह बरस में उस हालत में आ जाती है जिसमें उसे बदला जाना चाहिए। चौदह हो चुके थे। और उस कमरे में अब कक्षा चार बैठती थी, जिसमें उस बरस उनतालीस बच्चे थे।
एक शहतीर बैठे तो छत एक बार में नहीं गिरती। पर खपरैल का वह हिस्सा नीचे आता है और उसके नीचे जो बैठा हो, उस पर आता है। बद्री सोमवार को स्कूल गया। उसने किसी से कहकर नहीं गया और उस दिन उसकी दुकान बंद रही।
उसने पहले छत देखी, नीचे से, और फिर सीढ़ी लगाकर ऊपर से। आठवें शहतीर के बीच में झुकाव आ चुका था, नंगी आँख से न दिखने वाला, पर डोरी तानकर देखने पर साफ़। फिर उसने प्रधानाध्यापक से बात की। वहीं असली काम था।
वह कह सकता था कि लकड़ी पुरानी हो गई है। यही सबसे आसान था और यही सच के सबसे पास भी था, और कोई सवाल नहीं करता।
उसने ऐसा नहीं कहा।
उसने पूरी बात बताई, तारीख़ समेत। कि नाप उसकी ग़लती से छोटा हुआ था, कि उसने छह महीने की चीरी लकड़ी चढ़ाई थी, कि उसे तब भी मालूम था, और कि अब उसे बदलना है। प्रधानाध्यापक कुछ देर कुछ नहीं बोले।
फिर उन्होंने वह पूछा जो उन्हें पूछना ही था। कि बाक़ी सात का क्या भरोसा।
बद्री ने कहा कि बाक़ी सात वह अपने सामने चढ़ा चुका है और उन पर वह ज़बान देता है, और अगर भरोसा न हो तो आठों बदल दिए जाएँ, ख़र्च उसका। आठों नहीं बदले गए। एक बदला गया, और वह भी बरसात के बीच में, जो शहतीर बदलने का सबसे बुरा वक़्त होता है।
काम में ग्यारह दिन लगे, क्योंकि खपरैल उतारनी पड़ी, बल्लियाँ हटानी पड़ीं, और बीच में तीन दिन बारिश ने रोका। उन ग्यारह दिनों में कक्षा चार बरामदे में बैठी। नई लकड़ी, मज़दूरी और खपरैल का नुक़सान मिलाकर उन्नीस हज़ार बैठे और वे बद्री ने दिए।
यह उसका सबसे भारी हिस्सा नहीं था।
भारी यह था कि बात गाँव में फैल गई और उसके साथ यह भी फैला कि बद्री की डाली हुई छत में कच्ची लकड़ी लगी थी। उसके बाद के दो बरसों में उसे दो ठेके नहीं मिले, और दोनों बार वजह किसी ने बताई नहीं।
छत अब ठीक है।
उस कमरे की छत में आठ शहतीर हैं और उनमें से सात का रंग एक जैसा है, गहरा भूरा, चौदह बरस के धुएँ और धूल का। आठवाँ हल्का है और उस पर लकड़ी की धारियाँ अब भी साफ़ दिखती हैं। छत पर रंग नहीं होता, इसलिए वह फ़र्क़ छिपा भी नहीं। कक्षा चार के बच्चे उसी के नीचे बैठते हैं और उनमें से किसी ने आज तक नहीं पूछा कि वह अलग क्यों है।