मैदान गीला था। बेंचें तीन क़तारों में लग चुकी थीं। छेदीलाल तिपाई सीधी कर रहा था। ज़मीन नरम थी और वह बार-बार धँस रही थी। सालाना फ़ोटो जुलाई में होती है, सत्र शुरू होने के तीन-चार हफ़्ते बाद, जब सब बच्चे आ चुके हों और वर्दी नई हो।
उस दिन बारिश सुबह से रुकी हुई थी और यही एक मौक़ा था। जुलाई में ऐसा दिन हफ़्ते में एक बार मिलता है और उसी में सब कुछ निपटाना पड़ता है। छेदीलाल इक्कीस बरस से यह काम करता था। बाप के बाद से।
उसके पास दो कैमरे थे और एक पुरानी मोटरसाइकिल, और जुलाई-अगस्त में वह ब्लॉक के चौदह स्कूलों की फ़ोटो खींचता था। साल भर की कमाई का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं दो महीनों में आता था। हिसाब हर स्कूल में एक ही था। बरसों से चला आ रहा था।
एक बच्चे के साठ रुपये। इससे कम नहीं। जिसके पैसे जमा हों, उसकी तस्वीर बने और उसे प्रिंट मिले। बाक़ी बच्चों का उसमें कुछ नहीं।
यह हिसाब उसने नहीं बनाया था। यह चलता आया था और इसमें कोई किसी से नाराज़ नहीं होता। जिन बच्चों के पैसे नहीं आते, उनके घर वाले भी नहीं आते। उस स्कूल में दो सौ ग्यारह बच्चे थे। एक सौ छिहत्तर के पैसे जमा थे।
पैंतीस के नहीं थे। कुछ के आने भी नहीं थे। मास्टर ने बेंचें लगवाईं, बच्चों को क़तार में खड़ा किया, और फिर सूची निकालकर पढ़नी शुरू की। उसने पढ़े हुए नामों को नहीं बुलाया। यह भी हर स्कूल का अपना तरीक़ा है।
उसने उलटा किया। उसने उन पैंतीस के नाम पढ़े और उनसे कहा कि वे क़तार से निकलकर किनारे खड़े हो जाएँ। बच्चे निकलने लगे। कुछ फ़ौरन निकल गए, जैसे उन्हें पहले से पता हो। दो-तीन खड़े रहे और उन्हें दोबारा नाम लेकर कहा गया।
यह चीज़ वह इक्कीस बरस से देखता आया था।
हर स्कूल में यही होता है, थोड़े-बहुत फ़र्क़ के साथ। कहीं उन्हें पीछे कर देते हैं, कहीं किनारे, कहीं बरामदे में भेज देते हैं। कोई इसमें बुराई नहीं देखता, क्योंकि तस्वीर उन्हीं की बनती है जिनके पैसे आए हैं, और यह सीधी बात है।
उस दिन उसने कैमरा नहीं उठाया। वह तिपाई के पीछे खड़ा रहा। उसने मास्टर से कहा कि सबको खड़ा रहने दीजिए। एक बार कहा। मास्टर ने कहा कि उनके पैसे नहीं आए हैं। 'तस्वीर में रहने के पैसे नहीं लगते।'
'प्रिंट किसका दोगे?' 'जिसके पैसे आए हैं, उसी का।' मास्टर ने कहा कि फिर बाक़ी क्यों खड़े हों।
छेदीलाल के पास इसका कोई हिसाब वाला जवाब नहीं था। जो जवाब उसके मन में था वह हिसाब का नहीं था और उसे कहने का कोई फ़ायदा भी नहीं था। उसने सिर्फ़ यह कहा कि यह स्कूल की तस्वीर है और स्कूल में दो सौ ग्यारह बच्चे हैं।
मास्टर ने आधे मन से मान लिया, क्योंकि बहस लंबी होती और बादल फिर आ रहे थे। उसने बस इतना कहा कि पैसे वह नहीं वसूलेगा।
पैंतीस बच्चे वापस क़तार में आ गए। तीन क़तारें छोटी पड़ीं, इसलिए एक और बेंच लगानी पड़ी और सबको फिर से जमाना पड़ा। इसमें बीस मिनट और लगे और तस्वीर खिंच गई। अब दिक़्क़त यह थी कि इसका ख़र्च कौन उठाए। तस्वीर खिंच चुकी थी और सवाल प्रिंट का था।
पैंतीस बच्चे तस्वीर में हैं, तो या तो उनके प्रिंट भी बनें, या फिर वे तस्वीर में रहकर भी उसे कभी न देख पाएँ, जो पहले से भी बुरी बात है। छेदीलाल ने स्कूल को एक ही दाम दे दिया। पूरे स्कूल का।
उसने कहा कि पूरे स्कूल का पैकेट बना लीजिए, सबके प्रिंट, और दाम उतना ही रखा जितना एक सौ छिहत्तर का बनता था। इसका मतलब यह था कि पैंतीस प्रिंट का काग़ज़, धुलाई और मेहनत उसके अपने हिस्से से गई।
एक स्कूल में यह ज़्यादा नहीं था। दो-ढाई हज़ार का फ़र्क़। पर उसने उस साल यही चौदहों स्कूलों में किया, क्योंकि एक स्कूल में करके बाक़ी तेरह में न करना उससे नहीं हुआ। उस मौसम में उसकी कमाई पिछले बरस से कोई नौ हज़ार कम रही। नौ हज़ार उसके लिए दो महीने का घर का ख़र्च था।
और उससे बड़ी बात अगले बरस हुई। जो उसने सोची नहीं थी।
स्कूलों को अब यह हिसाब सस्ता लगने लगा था और उन्होंने अगले बरस दूसरे फ़ोटोग्राफ़र से भी यही दाम माँगा। वह उससे भी कम में तैयार हो गया, क्योंकि वह प्रिंट पतले काग़ज़ पर देता था। चौदह में से नौ स्कूल उसी के पास चले गए। एक ही मौसम में।
छेदीलाल के पास पाँच बचे। उन पाँच में वह आज भी जाता है और वहाँ अब भी सब बच्चे तस्वीर में खड़े होते हैं। वह तस्वीर उस स्कूल के बरामदे की दीवार पर टँगी है।
हर बरस की तस्वीर वहीं टाँगी जाती है, एक के बाद एक, तारीख़ के हिसाब से। उस बरस वाली में दो सौ ग्यारह बच्चे हैं और गिनती मिलाई जा सकती है। उसके बाद वाली में एक सौ अस्सी हैं, फिर एक सौ बासठ, फिर एक सौ इकतालीस। स्कूल में बच्चे उतने ही रहे।