सरकारी स्कूल की उस इमारत में सात कमरे थे और उनमें से दो में पंखे नहीं चलते थे। मार्च के बाद उन दोनों कमरों में बैठना मुश्किल हो जाता था, इसलिए मार्च आते ही सब यही चाहते थे कि उनकी क्लास ऊपर वाले कमरे में लगे।
बरखा हमेशा आगे वाली बेंच पर बैठती थी। इसकी वजह उसका पढ़ाई में तेज़ होना नहीं था। उसका नंबर माइनस छह था और चौथी बेंच से उसे बोर्ड पर सिर्फ़ सफ़ेद धारियाँ दिखती थीं।
उसका चश्मा मोटा था, फ़्रेम काला था, और उसके एक कोने पर टेप लिपटा रहता था जो दो साल पहले की किसी बात का था।
अनवर उसी क्लास में था और उसे बरखा से कोई ख़ास मतलब नहीं था।
जिस दिन यह हुआ, उस दिन इंटरवल में लड़के कमरे के भीतर ही भाग रहे थे, क्योंकि बाहर धूप तेज़ थी। अनवर पीछे से आया, उसने किसी को धक्का दिया, वह लड़खड़ाया, और उसका हाथ बरखा की बेंच से टकरा गया।
चश्मा नीचे गिरा। आवाज़ नहीं हुई।
अनवर ने उसे गिरते नहीं देखा। उसका पैर उस पर पड़ा और उसे तब पता चला जब नीचे कुछ चटका।
कमरे में उस वक़्त ग्यारह लड़के थे और सब भाग रहे थे। किसी ने नहीं देखा। बरखा बाहर थी।
अनवर ने चश्मा उठाया। दायाँ शीशा तीन जगह से फूटा था और फ़्रेम बीच से मुड़ गया था। उसने उसे बेंच पर रखा और अपनी जगह जाकर बैठ गया।
बरखा लौटी। उसने चश्मा उठाया, उसे देखा, और रोई नहीं। वह उसे लेकर मास्टरनी हेमवती के पास गई और उसने कहा कि गिर गया होगा।
क्लास में पूछा गया कि किसने देखा। किसी ने कुछ नहीं कहा, और यह इसलिए नहीं कि सब झूठ बोल रहे थे, बल्कि इसलिए कि सचमुच किसी ने नहीं देखा था।
अनवर भी चुप रहा। उसका मुँह सूख गया था।
बरखा के अब्बा रिक्शा चलाते थे। नया चश्मा तीन सौ चालीस का बनता, नंबर वाला। यह बात उसने घर पर बताई और जवाब यह मिला कि अभी नहीं बनेगा।
उसके बाद के ग्यारह दिन बरखा ने बिना चश्मे के काटे।
वह पहली बेंच पर बैठती रही और फिर भी उसे बोर्ड नहीं दिखता था। वह बग़ल वाली लड़की की कॉपी से उतारती थी और उतारने में पीछे रह जाती थी। हिसाब के पेपर में उसके सत्रह नंबर आए, जो उसके पिछले सारे पेपरों से कम थे।
हेमवती ने उससे पूछा कि क्या हुआ है। उसने कहा कि कुछ नहीं।
अनवर यह सब देखता रहा।
उन ग्यारह दिनों में उसने दो बार बताने की कोशिश की। पहली बार वह हेमवती के कमरे तक गया और दरवाज़े से लौट आया, क्योंकि भीतर कोई और बैठा था। दूसरी बार उसने बरखा को अकेले पकड़ा और उससे यह पूछ बैठा कि नया चश्मा कब बनेगा, और जब उसने कहा कि पता नहीं, तो अनवर के पास आगे कहने को कुछ नहीं बचा।
उसके पास एक डिब्बा था जो अलमारी के नीचे रहता था। उसमें तीन सौ बीस रुपये थे। यह उसने आठ महीने में जोड़े थे। ईद वाले पैसे, चाचा के दिए हुए पैसे, और वह पैसा जो सामान लाने पर कभी-कभी बच जाता था और जिसे रखने की इजाज़त उसे मिल जाती थी।
वह पैसा बल्ले के लिए था। दुकान में जो बल्ला उसने देख रखा था उसका दाम तीन सौ पचास था और उसे लगता था कि अगले महीने तक पूरा हो जाएगा।
बारहवें दिन उसने हेमवती को बता दिया।
उसने यह किसी के दबाव में नहीं किया और उसे यह भी नहीं लगा कि वह कुछ बड़ा कर रहा है। उसने बस बता दिया, और बताते हुए उसके भीतर यह उम्मीद ज़रूर थी कि इसके बाद चीज़ें कुछ आसान हो जाएँगी।
वे नहीं हुईं।
हेमवती ने उसके घर ख़बर भेजी। उसके अब्बा ने उसे मारा नहीं, जो और बुरा था। उन्होंने कहा कि डिब्बा लाओ। फिर वे डिब्बा लेकर बरखा के घर गए और अनवर को साथ ले गए।
बरखा के अब्बा ने पैसे ले लिए। उन्होंने गिने नहीं। उन्होंने अनवर की तरफ़ देखा और सिर्फ़ इतना कहा कि ग्यारह दिन हो गए हैं।
उन्होंने न उसे माफ़ किया, न डाँटा, न बैठने को कहा। वे भीतर चले गए।
नया चश्मा दो दिन बाद बन गया और बरखा फिर बोर्ड देखने लगी।
उस साल के नतीजे में उसके नंबर पिछले साल से कम रहे। यह सिर्फ़ हिसाब की वजह से नहीं था। ग्यारह दिन में जो छूटा था वह आगे के अध्यायों से जुड़ा हुआ था और उसे दोबारा पकड़ने का वक़्त किसी ने उसे नहीं दिया।
उसने अनवर से बात करना बंद कर दिया। यह उसने ऐलान करके नहीं किया। वह बस बात नहीं करती थी। यह उस साल के आख़िर तक चला और अगले साल वह दूसरे स्कूल चली गई।
अनवर ने बल्ला नहीं ख़रीदा। वह अगले दो बरस मोहल्ले के साझे बल्ले से खेलता रहा, जिसका हैंडल टूटा हुआ था और जिस पर टेप लिपटा रहता था।
वह डिब्बा उसने फेंका नहीं। उसकी अम्मी उसमें सुई-धागा रखने लगीं और वह रसोई की ताक़ पर चला गया, और अनवर जब भी वहाँ से कुछ उठाता है, उसका हाथ उससे टकरा जाता है।