प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र उस ब्लॉक के तीन गाँवों के लिए था और उसमें डॉक्टर हफ़्ते में दो दिन आते थे।

बाक़ी पाँच दिन सिराज रहता था, जो कंपाउंडर था और जिसे गाँव में डाक्टर ही कहा जाता था, हालाँकि वह हर बार टोक देता था।

पेट की बीमारी उस बरस मई में शुरू हुई और शुरू में उसे किसी ने बीमारी नहीं माना, क्योंकि गर्मी में पेट ख़राब होना उस इलाक़े में मौसम का हिस्सा समझा जाता है।

पहले चार-पाँच बच्चे आए। फिर बड़े आने लगे। जून के पहले हफ़्ते में एक हफ़्ते में इकतालीस लोग आए और उनमें से नौ को ब्लॉक भेजना पड़ा।

सिराज ने पानी के नमूने भेजने का फ़ैसला किया।

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यह उसका काम नहीं था, पर करने से किसी ने रोका भी नहीं। उसने तीनों गाँवों के हैंडपंपों से नमूने लिए, शीशियों पर नंबर लिखे, और उन्हें ज़िले की लैब भेज दिया।

रिपोर्ट सत्रह दिन बाद आई।

सत्रह दिन उस लैब के हिसाब से जल्दी थे। सिराज ने उन दिनों में तीन बार फ़ोन किया और तीनों बार उसे यही बताया गया कि नमूने क़तार में हैं। इस बीच पेट की बीमारी चलती रही और उसने जो कर सकता था वह किया, यानी ओआरएस बाँटा और लोगों से पानी उबालने को कहा, जो लोगों ने चार दिन किया और फिर बंद कर दिया, क्योंकि गर्मी में उबला पानी पीना आसान नहीं होता।

तीन में से एक गाँव का पानी ख़राब निकला। बड़ी बात यह थी कि किस हैंडपंप का।

वह हैंडपंप छह महीने पहले लगा था और वह उस योजना का था जिसका पैसा पंचायत के ज़रिए आया था।

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उसे लगाने वाले ठेकेदार ने उसे नाबदान से बाईस फ़ुट पर लगाया था। नियम पचास फ़ुट का है। यह बात रिपोर्ट में नहीं लिखी थी, यह सिराज ने ख़ुद जाकर नापी थी, फ़ीते से।

उसने यह पर्चे में लिख दिया, नाप समेत, और साथ में यह भी लिखा कि नाबदान किस तरफ़ है और ढलान किधर को है।

प्रधान उसके पास शाम को आया।

वह अकेला नहीं आया। उसके साथ दो लोग और थे, जो उसी मोहल्ले के थे जिसका हैंडपंप था। उन दोनों ने पूरे वक़्त कुछ नहीं कहा और यही सबसे भारी बात थी, क्योंकि जिस पानी की बात हो रही थी वह उन्हीं का था और जिस हैंडपंप के बंद होने की बात हो रही थी वह भी उन्हीं का था।

वह ग़ुस्से में नहीं आया। वह बैठा और उसने बात शुरू की, और उसकी बात में जो कुछ था वह सही भी था।

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उसने कहा कि हैंडपंप हट जाएगा तो उस मोहल्ले को आधा किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ेगा। उसने कहा कि योजना का पैसा लौटाना पड़ेगा और अगले बरस उस पंचायत को कुछ नहीं मिलेगा। उसने यह भी कहा कि ठेकेदार उसका रिश्तेदार नहीं है, और यह सच था।

फिर उसने कहा कि रिपोर्ट में सिर्फ़ पानी की बात रहने दो और नाप वाली बात हटा दो।

सिराज ने कहा कि नाप ही असली बात है।

"पानी उबालकर पिएँगे लोग।" "जब तक?" "जब तक हम नया लगवाएँ।" "कब लगवाएँगे?" इसका जवाब नहीं आया।

सिराज ने रिपोर्ट वैसी ही भेजी, नाप समेत।

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उसने प्रधान को यह बताया भी। उसने उससे झूठ नहीं बोला और उसने उसे टाला भी नहीं। उसने कहा कि रिपोर्ट जा चुकी है और उसमें नाप लिखी है, और प्रधान ने यह सुनकर कुछ नहीं कहा और वह उठकर चला गया। दोनों के बीच उसके बाद बातचीत बंद नहीं हुई। वे मिलते रहे, दुआ-सलाम होती रही, और वह पहले जैसी कभी नहीं हुई।

उसके बाद जो हुआ उसमें कुछ भी नाटकीय नहीं था।

हैंडपंप बंद हुआ। मोहल्ले को आधा किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ा, और यह काम औरतों के हिस्से आया, जैसा हमेशा आता है।

पेट की बीमारी अगस्त तक चलती रही और फिर अपने आप कम हो गई, क्योंकि बरसात ने बाक़ी हैंडपंपों का पानी ऊपर कर दिया।

ठेकेदार पर कुछ नहीं हुआ। उसका बिल रुका, फिर दो बरस बाद पास हो गया।

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पंचायत को अगले बरस उस मद में पैसा नहीं मिला, जैसा प्रधान ने कहा था।

सिराज का तबादला उस बरस के आख़िर में हो गया।

यह सज़ा के तौर पर नहीं हुआ। ऐसा दिखाया भी नहीं गया। उसे उसी ज़िले के दूसरे ब्लॉक में भेजा गया, जो उसके घर से इकतीस किलोमीटर दूर पड़ता था, जबकि पहला ग्यारह पड़ता था।

उसने इसकी शिकायत नहीं की और उसने इसे किसी से जोड़कर देखा भी नहीं, क्योंकि जोड़कर देखने पर भी कुछ हाथ नहीं आता।

नया हैंडपंप उस मोहल्ले में चार बरस बाद लगा। तब तक औरतें आधा किलोमीटर जाती रहीं।

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यह बात सिराज को बहुत बाद में मालूम हुई, किसी और से, और सुनकर उसे अच्छा नहीं लगा। जो उसने किया था वह ठीक था और उसका नतीजा चार बरस तक ग़लत रहा, और ये दोनों बातें एक साथ सच थीं।

पुराने हैंडपंप का हत्था निकलवा लिया गया था ताकि कोई चलाए नहीं। उसका पाइप और चबूतरा वहीं रहा, और बच्चे उस चबूतरे पर बैठकर खेलते रहे, क्योंकि वह मोहल्ले में एक ही जगह थी जो पक्की थी।