लड़के की ज़मानत तीसरी पेशी में हो गई थी। उसके बाद भी वह सैंतालीस दिन अंदर रहा। वजह वही थी जो ऐसे मामलों में होती है।
ज़मानत मंज़ूर होने का मतलब बाहर आना नहीं होता। उसके बाद कोई चाहिए जो अदालत में खड़ा होकर कहे कि लड़का हर तारीख़ पर आएगा, और उसके बदले अपनी कोई चीज़ रखे। ज़मीन के काग़ज़, ज़्यादातर। उस लड़के के घर में ज़मीन नहीं थी। एक बिस्वा भी नहीं।
उसका बाप बटाई पर खेती करता था और घर की जगह भी पट्टे की थी, जो काम नहीं आती। मुक़दमा एक झगड़े का था। ऐसे मुक़दमे सबसे लंबे चलते हैं, क्योंकि उनमें न कोई बड़ा जुर्म होता है और न किसी को जल्दी होती है।
गाँव के मेले में मारपीट हुई थी और उसमें दो तरफ़ के आठ लड़के थे। बाक़ी सात की ज़मानत हो चुकी थी और सब बाहर आ चुके थे।
धनीराम उसका पड़ोसी था। दोनों घरों के बीच एक दीवार थी और उस दीवार को लेकर दस बरस पहले झगड़ा भी हो चुका था, जो बाद में ठंडा पड़ गया। उसके पास एक बीघा और कुछ बिस्वा ज़मीन थी, जो उसके नाम थी, और वही उस गली में अकेली ऐसी ज़मीन थी जिसके काग़ज़ साफ़ थे।
बाप उसके पास दो बार आया। दोनों बार शाम को। पहली बार धनीराम ने कहा कि सोचता हूँ। दूसरी बार उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी हिचक की वजह वाजिब थी।
वह लड़का सत्रह की उम्र में एक बार घर से भाग चुका था। वह सूरत गया था, चार महीने वहाँ रहा था, और अपने आप लौटा था। यह पूरा गाँव जानता था।
ज़मानत का मतलब यही होता है।
अगर वह किसी तारीख़ पर न आए, तो अदालत पहले नोटिस भेजती है, फिर ज़मानत ज़ब्त करती है। ज़ब्त होने पर वह ज़मीन नीलाम होती है और उसमें किसी की कोई सुनवाई नहीं होती। धनीराम के पास वह एक बीघा ही सब कुछ था।
उसकी उम्र चौवन थी, दो लड़कियाँ थीं, और बड़ी की शादी की बात दो जगह चल रही थी। उसने ग्यारहवें दिन काग़ज़ निकाले। उन दस दिनों में वह दो बार तहसील गया और एक वकील से बात भी की, जिसने उसे साफ़ मना किया।
यह उसने किसी नेकी के इरादे से नहीं किया और उसने ऐसा कहा भी नहीं। उसने बाद में बस यह बताया कि उस लड़के को अंदर रहते सैंतालीस दिन हो चुके थे और मुक़दमा चार-पाँच बरस चलना था, और सैंतालीस दिन में जो होता है वह उसने पहले देखा हुआ था।
काग़ज़ अदालत में जमा हो गए। तेरहवें दिन। लड़का उसी हफ़्ते बाहर आ गया। सैंतालीस दिन बाद। और उसके बाद जो हुआ, उसमें कोई नाटक नहीं था।
वह भागा नहीं। वह हर तारीख़ पर गया। मुक़दमे में उन्नीस तारीख़ें पड़ीं और उन्नीसों पर वह मौजूद रहा, और कई बार धनीराम भी उसके साथ गया, क्योंकि ज़मानत देने वाले को भी कभी-कभी बुला लिया जाता है। मुक़दमा चार बरस दो महीने चला और उसमें सब बरी हो गए।
इन चार बरसों में असली बात दूसरी जगह हुई।
जिसकी ज़मीन अदालत में बँधी हो, वह उस ज़मीन पर न क़र्ज़ ले सकता है, न उसे बेच सकता है, न बटाई पर लिख सकता है। काग़ज़ अदालत की फ़ाइल में रहते हैं और बैंक बिना काग़ज़ के कुछ नहीं देता।
पहले बरस इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। फ़सल हुई, ख़र्च चला, और किसी को याद भी नहीं रहा कि काग़ज़ कहाँ हैं। दूसरे बरस बड़ी लड़की की बात एक जगह पक्की हुई और उसमें जो देना था वह ज़मीन पर क़र्ज़ लेकर ही आ सकता था।
क़र्ज़ नहीं मिला। दो बैंक और एक साहूकार, तीनों से नहीं।
बात टूटी नहीं, टल गई, और वह टलती रही। लड़की की शादी दो बरस बाद हुई, तब जब काग़ज़ छूट गए, और तब तक उसकी उम्र छब्बीस हो चुकी थी। गाँव में इस पर बहुत कुछ कहा गया। उसमें से आधा उसके सामने कहा गया और आधा पीछे।
धनीराम की औरत ने भी कहा और वह उसकी जगह ग़लत भी नहीं थी। उसका कहना यही था कि दूसरे के लड़के के लिए अपनी लड़की की उम्र गँवा दी। धनीराम ने इस पर कभी बहस नहीं की।
उसने कही तो एक ही बात, और वह भी सिर्फ़ एक बार। कि उसने जो रखा वह ज़मीन थी, और लड़का अंदर रहता तो जो जाता वह ज़मीन नहीं होती। काग़ज़ अदालत से चार बरस दो महीने बाद वापस मिले।
वे मुड़े हुए थे और उन पर फ़ाइल की डोरी का निशान पड़ चुका था, जो बाद में भी नहीं गया। उस घर में लोहे का एक संदूक है, जिसमें ज़मीन के काग़ज़ रखे जाते हैं और जो साल में एक-दो बार ही खुलता है।
उन चार बरस दो महीने में वह संदूक एक बार भी नहीं खुला। खोलने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी, और असल बात यही थी, क्योंकि उस संदूक के खुलने से ही घर के बाक़ी काम चलते हैं। काग़ज़ लौटने के बाद धनीराम ने उन्हें उसी में रखा, और उसके बाद से वह संदूक हर महीने खुलता है, चाहे उसमें कुछ रखना-निकालना हो या न हो।