बुधनी की डेढ़ बीघा ज़मीन गाँव के पूरब में थी। वह उसके आदमी के नाम से उसके नाम आई थी। उस पर वह बटाई करवाती थी और उससे साल भर का अनाज निकल आता था। उसका लड़का पिछले जाड़े में गिर गया। छत से।

वह छत पर काम कर रहा था और नीचे आ गिरा, और उसकी रीढ़ में चोट आई। इलाज गोरखपुर में चला और अब भी चल रहा था। जो पैसा लगा वह उसकी हैसियत से बाहर था और वह क़र्ज़ लेकर लगाया गया।

अप्रैल में उससे कहा गया कि एक और ऑपरेशन करना पड़ेगा और उसका ख़र्च अलग है। पैसा उसी हफ़्ते चाहिए था। गाँव में यह बात सबको मालूम थी और यही सबसे बड़ी दिक़्क़त थी।

ज़मीन के सौदे में ख़बर ही दाम तय करती है। जिस दिन यह मालूम हो जाए कि बेचने वाले को पैसा किस तारीख़ तक चाहिए, उस दिन से भाव उसका नहीं रहता। यह गाँव में कोई साज़िश करके नहीं होता। यह अपने आप होता है, क्योंकि हर ख़रीदार यही सोचता है कि रुक जाओ, दाम और गिरेगा।

ज़मीन बेचने की ख़बर फैलते ही तीन लोग आए और तीनों ने अलग-अलग कहा कि इस वक़्त भाव नीचा चल रहा है। भाव नीचा नहीं चल रहा था। वह चढ़ा हुआ था। फिरंगी दलाल ने बात संभाली और उसने बुधनी से कहा कि वह अच्छा ग्राहक लाएगा।

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वह रामदेव के पास गया। शाम को।

रामदेव के पास पैसा था और उसकी ज़मीन उसी के लगी हुई थी। वह उस डेढ़ बीघा को बरसों से लेना चाहता था और बुधनी के आदमी के वक़्त में उसने दो बार बात चलाई थी और दोनों बार मना हो गया था।

फिरंगी ने उसे बताया कि हालत क्या है। उसने यह भी बताया कि पैसा कब चाहिए, और यही उस बातचीत की सबसे काम की जानकारी थी। उसने कहा कि साठ हज़ार बीघा से शुरू करते हैं। भाव एक लाख दस हज़ार था।

रामदेव ने उसकी बात पूरी सुनी।

वह पचपन बरस का था और उसने अपनी ज़िंदगी में कई सौदे किए थे, और उनमें से सब ऐसे नहीं थे जिनका ज़िक्र वह करना चाहे। उसने सस्ते में ज़मीन ली भी थी, दो बार, और दोनों बार सामने वाला मजबूरी में था। यह उसे याद था और इसी वजह से वह उस शाम कुछ देर चुपचाप बैठा रहा।

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फिर उसने पूछा कि इस सौदे में उसका कितना है, और फिरंगी ने बता दिया, क्योंकि वह छिपाने वाली बात नहीं थी। रामदेव ने कहा कि वह ख़ुद जाकर बात करेगा। दलाल को यह पसंद नहीं आया। वह उसी शाम बुधनी के घर गया।

उसने उससे कहा कि वह ज़मीन लेगा और दाम एक लाख दस हज़ार बीघा देगा, यानी डेढ़ बीघा का एक लाख पैंसठ हज़ार, और पैसा तीन दिन में मिल जाएगा। बुधनी ने पहले यक़ीन नहीं किया। उसने दाम दोबारा पूछा।

उसने पूछा कि इसमें क्या शर्त है।

रामदेव ने कहा कि एक शर्त है। ज़मीन के काग़ज़ में यह लिखा जाएगा कि अगर पाँच बरस के भीतर वह उसे वापस लेना चाहे तो उसी दाम पर ले सकती है।

बुधनी ने उसे बीच में रोककर कहा कि वह ऐसी कोई शर्त नहीं मान सकती जिसमें ज़मीन पर उसका दख़ल बना रहे, क्योंकि उससे आगे झगड़ा होता है। उसने यह ठीक कहा और उसे यह मालूम था, क्योंकि उसके आदमी के वक़्त गाँव में ऐसा एक झगड़ा चल चुका था।

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यह शर्त उसके अपने ख़िलाफ़ थी। उसने इसे इसीलिए रखा। इसकी वजह उसने किसी को नहीं बताई और वजह यह थी कि उसे यह ज़मीन इस तरह नहीं चाहिए थी।

काग़ज़ उसी हफ़्ते बने। रजिस्ट्री में जो दाम लिखा गया वह वही था जो दिया गया था, पूरा, जो उस इलाक़े में कम होता है, क्योंकि ज़्यादातर सौदों में लिखा हुआ दाम असली से कम रखा जाता है और बाक़ी नक़द चलता है।

फिरंगी को उसका पूरा कमीशन मिला, जो एक लाख पैंसठ हज़ार पर बनता था और जो साठ हज़ार वाले सौदे से ज़्यादा था। इस पर उसने कुछ नहीं कहा।

ऑपरेशन हुआ।

उसमें जितना बताया गया था उससे कुछ ज़्यादा लगा और बाक़ी पैसा बुधनी ने अपने भाई से लिया। ज़मीन का पूरा पैसा तीन दिन में मिल गया था, जैसा कहा गया था, और उसमें एक दिन की भी देर नहीं हुई, जो ऐसे सौदों में कम होता है।

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लड़का चल नहीं पाया। वह बैठने लगा और उसके हाथ काम करने लगे, और इतना भी उस घर के लिए बहुत था। बुधनी ने वह ज़मीन पाँच बरस में वापस नहीं ली। उसके पास कभी उतना पैसा एक साथ नहीं हुआ।

पाँच बरस पूरे होने पर रामदेव ने वह शर्त बढ़ा दी, अगले पाँच बरस के लिए, और यह उसने बिना पूछे किया और उसे बताया भी नहीं। यह बात बुधनी को तब पता चली जब उसका लड़का काग़ज़ पढ़ने लायक़ हो गया और उसने पढ़ा।

उस डेढ़ बीघा पर रामदेव खेती करता रहा और वह उसे अपने खेत में मिलाता नहीं। दोनों के बीच की मेंड़ उसने बनी रहने दी, हालाँकि उसे तोड़ देने से जुताई आसान हो जाती, और गाँव में इस पर लोग हँसते भी थे।