बाँस का पुल हर बरसात में बहता है और हर बरसात में दोबारा बाँधा जाता है। यह चालीस बरस से चल रहा था। बिना नागा। नदी बड़ी नहीं थी। गर्मियों में उसे पैदल पार किया जा सकता था और जून के बाद नहीं।

उस पार तीन गाँव थे। इस पार सड़क, स्कूल और बाज़ार। पुल न हो तो घूमकर जाना पड़ता है, जिसमें नौ किलोमीटर लगते हैं। पुल नकछेद के बाप ने बाँधना शुरू किया था। सन् छियासी में।

उसकी कोई वजह नहीं थी और न कोई हुक्म था। उसका खेत उसी घाट के पास था और उसने एक बरस बाँध दिया, और फिर हर बरस बाँधता रहा, और चालीस बरस में यह उसके घर का काम मान लिया गया।

इसमें दो चीज़ें लगती हैं। बाँस और आदमी। अठारह बाँस, दस-बारह आदमी, और तीन दिन। बाँस गाँव देता था। हर घर से एक या दो, जिसके पास बाँस का झुरमुट हो। आदमी भी गाँव से आते थे, दस-बारह, तीन दिन के लिए।

बाप के जाने के बाद यह काम नकछेद का हो गया। उसने कभी नहीं पूछा कि क्यों, और उससे भी कभी किसी ने कहा नहीं कि तुम्हीं करो। पक्के पुल की मंज़ूरी उस बरस मार्च में आई।

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जगह दो किलोमीटर नीचे तय हुई, जहाँ नदी सँकरी है और दोनों किनारे ऊँचे हैं। यह इंजीनियरी के हिसाब से ठीक था और इसमें किसी की कोई चाल नहीं थी। काम दो बरस में पूरा होना था। और उसी के साथ बाँस आना बंद हो गया। एक ही बरस में।

इसका फ़ैसला किसी ने नहीं लिया। यह अपने आप हुआ, जैसे ऐसी चीज़ें अपने आप होती हैं। अप्रैल में नकछेद ने गाँव में कहलवाया और सात बाँस आए, जबकि अठारह चाहिए थे। जिनसे पूछा गया उन्होंने कहा कि अब तो पुल बन रहा है।

यह ग़लत भी नहीं था। बिलकुल नहीं था।

दो बरस बाद पक्का पुल आ जाएगा, तब यह बाँधना बंद ही करना पड़ेगा। और आदमी अपनी बाँस की झुरमुट में से हर बरस दो बाँस काटकर देता आया है, जिसकी उसे कोई क़ीमत नहीं मिलती। नकछेद ने बाक़ी ग्यारह बाँस ख़रीदे। उसने यह किसी को बताकर नहीं ख़रीदे और घाट पर वे उसी तरह पहुँचे जैसे बाक़ी सात पहुँचे थे।

एक बाँस उस मौसम में साढ़े तीन सौ का था, क्योंकि बरसात से पहले उसका दाम चढ़ जाता है। ग्यारह के अड़तीस सौ हुए, और रस्सी, कीलें और मज़दूरी मिलाकर चौदह हज़ार के आसपास बैठा। आदमी भी पूरे नहीं आए। छह आए, और उनमें से दो उसके अपने घर के थे।

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इसलिए काम तीन दिन की जगह छह दिन चला और उन छह दिनों में नकछेद ने अपना बाक़ी सब काम छोड़ा।

वह पुल उस बरसात में दो बार बहा और दोनों बार दोबारा बाँधा गया। दूसरी बार अगस्त में, जब पानी सबसे ऊपर था और खूँटे गाड़ने के लिए कमर तक पानी में उतरना पड़ा।

अगले बरस यही दोहराया गया, और उस बार पाँच बाँस आए और तेरह ख़रीदने पड़े। उन दो बरसों में उस पुल से रोज़ आने-जाने वालों की गिनती किसी ने नहीं की। अगर की जाती तो उसमें सबसे ऊपर स्कूल के बच्चे होते, जो उस पार से आते थे और जिनकी संख्या इकतालीस थी।

नौ किलोमीटर घूमकर वे नहीं आते। बरसात के चार महीने वे घर बैठ जाते, और चार महीने बाद जो बच्चा लौटता है वह वही बच्चा नहीं होता। यही एक बात थी जो नकछेद ने किसी से कही, और वह भी सिर्फ़ अपनी औरत से कही, जब उसने चौदह हज़ार का हिसाब पूछा।

पक्का पुल तीसरे बरस अक्टूबर में खुला, तय वक़्त से नौ महीने देर से, जो ऐसे कामों में देर नहीं मानी जाती। वह अच्छा बना और उस पर गाड़ी भी चल जाती है, और उससे उस पार के तीनों गाँवों की हालत बदल गई, जो सचमुच बदली।

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उसके खुलने के छह दिन बाद पुराने घाट पर आना-जाना बंद हो गया। छह दिन। लोग दो किलोमीटर नीचे से जाने लगे, क्योंकि वहाँ पक्का है और गीले में फिसलन नहीं है, और घूमकर जाना भी सिर्फ़ चार किलोमीटर पड़ता है।

उस बरस नकछेद ने पुल नहीं बाँधा। उसने बाँस भी नहीं माँगे। उसकी ज़रूरत नहीं थी और उसने बाँधने की बात भी नहीं की। गाँव में उन दो बरसों का ज़िक्र भी नहीं हुआ। कहीं नहीं।

यह भी अपने आप हुआ। जब कोई चीज़ ख़त्म हो जाती है तो उसके साथ यह भी ख़त्म हो जाता है कि वह किसने चलाई थी। पक्के पुल के उद्घाटन में चार भाषण हुए और उनमें से किसी में बाँस के पुल का नाम नहीं आया, और यह किसी की बदनीयती नहीं थी, बस किसी को याद ही नहीं आया।

आख़िरी बार बाँधे हुए पुल के खूँटे नदी में रह गए।

बाँस बह गए और बाँधने वाली रस्सियाँ भी, पर जो मोटे बाँस दोनों किनारों पर ज़मीन में गाड़े जाते हैं, वे टूटकर छह-छह इंच नीचे रह गए। गर्मियों में जब पानी उतरता है तो वे दिखते हैं, दोनों किनारों पर तीन-तीन, काले पड़े हुए। पक्के पुल पर से गुज़रते वक़्त ऊपर की तरफ़ नज़र डालो तो वह घाट साफ़ दिखता है, और नकछेद उस पुल से हफ़्ते में तीन-चार बार गुज़रता है।