बोर्ड की परीक्षा उस साल पंद्रह मार्च से थी और सेंटर पंद्रह किलोमीटर दूर वाले क़स्बे में पड़ा था। मंजरी के गाँव से पाँच लड़कियाँ जाती थीं और पाँचों एक ही जीप में जाती थीं, जिसका किराया आपस में बाँटा जाता था।

उसकी माँ सुमित्रा ने पहले पेपर के दिन उसे दही खिलाया और गेट तक छोड़ने आई। वह पढ़ी हुई नहीं थी और उसे यह मालूम नहीं था कि कौन सा पेपर कब है, पर तारीख़ें उसने रट ली थीं।

पहले तीन पेपर ठीक गए। हिंदी सबसे अच्छा गया। उसने यह घर पर बताया नहीं, क्योंकि बताने से उम्मीद बँधती है।

हिसाब का पेपर चौथा था और मंजरी को यह पहले से मालूम था कि वह इसी में मारी जाएगी। ज्यामिति उस स्कूल में किसी ने ठीक से पढ़ाई ही नहीं थी। मास्टर नौ महीने से नहीं आ रहे थे और उनकी जगह किसी को भेजा नहीं गया था।

उस सेंटर पर नक़ल कोई छिपी हुई बात नहीं थी।

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पर्चियाँ बाहर से आती थीं और खिड़की के रास्ते भीतर पहुँचती थीं। कमरे में निगरानी करने वाला एक ही आदमी था, अब्बास, जो साठ के आसपास का था और जो ज़्यादातर बाहर बरामदे में कुर्सी डालकर बैठा रहता था।

यह इंतज़ाम सबको मालूम था और इसमें किसी को कुछ ग़लत नहीं लगता था। जिन बच्चों के मास्टर नौ महीने न आए हों, उनसे यह उम्मीद रखना कि वे अपने बूते पास हों, गाँव में किसी को इंसाफ़ नहीं लगता था।

हिसाब के पेपर में आधे घंटे बाद पर्चियाँ चलनी शुरू हुईं।

मंजरी के आगे बैठी लड़की ने अपनी उतारी और पर्ची पीछे बढ़ा दी। वह उसकी डेस्क पर आ गई।

उसने उसे खोला। उसमें आख़िरी के तीन सवाल हल किए हुए थे और वे तीनों वही थे जो वह नहीं कर पाई थी। सोलह नंबर के।

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अब्बास बाहर बैठा था। उसने भीतर नहीं देखा। कमरे में इकतालीस लड़कियाँ थीं और उनमें से पैंतीस उस वक़्त उतार रही थीं।

मंजरी ने वह पर्ची मोड़कर अपनी ज्यामिति वाली डिब्बी में रख ली और बचे हुए वक़्त में वही किया जो उसे आता था।

उसने यह किसी उसूल की वजह से नहीं किया। उसे बाद में ख़ुद भी ठीक से समझ नहीं आया कि उसने क्यों नहीं उतारा। उस घड़ी उसके दिमाग़ में जो एक बात आई वह यह थी कि अगर वह इन तीन सवालों को इस तरह पार कर गई, तो ग्यारहवीं में यही सवाल दोबारा सामने आएँगे।

नतीजा मई में आया।

नतीजा स्कूल की दीवार पर चिपकता था और उस दिन गाँव से जीप नहीं जाती थी, इसलिए लड़कियाँ पैदल गईं। पंद्रह किलोमीटर। मंजरी ने अपना नंबर सूची में तीन बार ढूँढ़ा और तीनों बार उसे वहीं मिला जहाँ पहली बार मिला था।

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वह हिसाब में छह नंबर से रह गई। छब्बीस चाहिए थे। बीस आए।

पाँचों में से बाक़ी चार पास हो गईं।

सुमित्रा ने उस दिन कुछ नहीं कहा। उसने रात का खाना बनाया और सब कुछ रोज़ की तरह किया। दो दिन बाद उसने पूछा कि अब क्या करना है, और मंजरी ने कहा कि दोबारा बैठूँगी।

गाँव में इस पर बात हुई और बात अच्छी नहीं हुई। लड़की सत्रह की हो चुकी थी और एक साल और पढ़ाई पर लगाना कई लोगों को समझ नहीं आया।

उसके चाचा ने सुमित्रा से कहा कि हाथ पीले कर दो।

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सुमित्रा ने मना कर दिया और उसकी वजह उसने किसी को नहीं बताई। वजह यह थी कि मंजरी ने उसे पर्ची वाली बात बता दी थी।

वह साल आसान नहीं गया।

उसे स्कूल दोबारा जाना पड़ा और क्लास में अब उससे छोटी लड़कियाँ थीं। जो उसके साथ की थीं वे ऊपर चली गई थीं और उनसे मिलने पर बात कम होने लगी थी। हिसाब उसने बग़ल के गाँव के एक लड़के से पढ़ा, जो शाम को दो घंटे पढ़ाता था और महीने के अस्सी रुपये लेता था।

अस्सी रुपये के लिए सुमित्रा ने बकरी का दूध बेचना शुरू किया, जो पहले घर में ही रह जाता था।

अगले बरस मंजरी हिसाब में इकसठ नंबर लाई।

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यह नंबर उसके अपने थे और यह बात उसके अलावा किसी के लिए ज़रूरी नहीं थी। गाँव में लोगों ने इतना कहा कि लड़की पास हो गई, और यह उन्होंने उसी लहजे में कहा जिसमें वे उन चारों के बारे में कहते थे जो पिछले बरस पास हुई थीं।

उसी बरस उसने यह भी सुना कि उसके साथ वाली एक लड़की ग्यारहवीं में दो बार फ़ेल होकर पढ़ाई छोड़ चुकी है। मंजरी ने इस पर कुछ नहीं सोचा और इसे अपनी बात से जोड़ा भी नहीं। उसे बस यह ख़बर मिली और वह आगे बढ़ गई।

वह पर्ची डिब्बी में तीन साल पड़ी रही और फिर डिब्बी ही कहीं खो गई।

जिस कमरे में उसने वह पेपर दिया था, अगले बरस भी उसका वही नंबर आया, कमरा नौ। उसे वही डेस्क मिली या नहीं, यह उसने देखा नहीं। वह भीतर गई, बैठी, और उसने पेपर पलट लिया।