बिशन के घर में सबसे क़ीमती चीज़ एक सिलाई मशीन थी, जो उसकी माँ की थी। बाक़ी सामान गिनने लायक़ नहीं था। बिशन को बड़ा आदमी बनना था, और यह इच्छा उसे किसी ने दी नहीं थी। वह हर शाम उस मशीन की आवाज़ सुनता रहता। वह रात दस बजे तक चलती थी। कभी-कभी वह ग्यारह तक भी चलती, जब कोई काम जल्दी में देना होता। बिशन उसी आवाज़ में सो जाता था। और सोते-सोते हर रात एक ही बात सोचता, कि यह आवाज़ एक दिन बंद होनी चाहिए।
बड़ा आदमी बनने का मतलब उसे ख़ुद भी ठीक से नहीं पता था। स्कूल में जब मास्टर ने पूछा तो उसने कह दिया, व्यापारी। बस इतना ही। पूरी कक्षा हँसी, और मास्टर भी हँसे। घर लौटकर उसने माँ को बताया और माँ ने सुनकर इतना कहा कि हँसने वालों की बात याद रखने से पेट नहीं भरता। फिर उन्होंने मशीन चालू कर दी। बिशन को उस वक़्त लगा कि उन्होंने बात टाल दी है। बहुत साल बाद उसे समझ आया कि उन्होंने जवाब दे दिया था।
बारहवीं के बाद बिशन ने पढ़ाई छोड़ दी और माँ के सिले हुए कपड़े ख़ुद बाज़ार ले जाने लगा। पहले वह सिर्फ़ पहुँचाता था। और कुछ नहीं। फिर उसने एक बात नोट की: जिस ब्लाउज़ के माँ को अस्सी रुपये मिलते हैं, वह दुकान के शीशे के पीछे दो सौ बीस में टँगा रहता है। उसने माँ को यह नहीं बताया। अगली बार उसने दो ब्लाउज़ ज़्यादा बनवाए और उन्हें दुकान पर नहीं, सीधे मोहल्ले की औरतों को दिखाया। दोनों उसी दिन बिक गए। एक सौ साठ में।
आगे यह इतना आसान नहीं रहा। तीसरे महीने उसने उधार पर कपड़ा उठाया। वह पूरा का पूरा पड़ा रह गया, क्योंकि रंग वह था जो उसे पसंद था और मोहल्ले को नहीं। दुकानदार ने पैसे माँगे, फिर दोबारा माँगे, और फिर वह घर आ गया। माँ ने अपनी दो चूड़ियाँ उतारकर उसके हाथ में रख दीं और कहा कि यह उधार है और ब्याज समेत वापस चाहिए। उस रात बिशन ने मशीन की आवाज़ सुनी और पहली बार वह आवाज़ उसे अच्छी नहीं लगी।
चूड़ियाँ उसने चार महीने में लौटाईं, ब्याज समेत। इस बार रंग उसने ख़ुद नहीं चुने। वह हफ़्ते में एक दिन नुक्कड़ पर बैठकर सिर्फ़ यह देखता कि गली में औरतें क्या पहन रही हैं, और वही उठाता। धीरे-धीरे उसके साथ चार सिलाई वाली और जुड़ गईं, सब मोहल्ले की, सब अपने घर से काम करने वालीं। माँ अब सिलाई कम करतीं और बाकी चारों का काम देखना ज़्यादा। मशीन फिर भी रात दस बजे तक चलती थी।
चौथे साल बिशन ने बस स्टैंड के पास एक दुकान किराए पर ली। नाम उसने माँ के नाम पर रखा, और यह उसने माँ से पूछे बिना किया, क्योंकि पूछता तो वे मना कर देतीं। दुकान चल निकली। छठे साल दूसरी दुकान हुई। उसी साल उसने वह चीज़ ख़रीदी जो वह बचपन से ख़रीदना चाहता था: माँ के लिए एक नई मशीन, बिजली वाली, जिसमें पैर नहीं चलाना पड़ता।
दुकान के साथ एक बात हुई जिसका हिसाब बिशन ने बहुत बाद में लगाया। काउंटर वाली दुकान को माल चाहिए, रोज़, और उतना माल चार औरतें घर बैठकर नहीं बना सकतीं। दूसरे साल से वह सूरत का बना हुआ माल उठाने लगा, एक सौ बीस का ब्लाउज़, जिसके सामने डेढ़ सौ वाला हाथ का सिला हुआ टिकता नहीं। चारों में से दो का काम पहले घटा, फिर बंद हो गया। एक ने भैंस ले ली। दूसरी अपनी बेटी के पास चली गई। मोहल्ले में इस पर कोई चर्चा नहीं हुई, और बिशन ने भी नहीं छेड़ी।
नई मशीन कमरे में रखी रह गई। एक हफ़्ता, फिर महीना। माँ ने उस पर एक कपड़ा डाल दिया और पुरानी वाली पर काम करती रहीं। एक रात बिशन ने कह ही दिया, "अब बंद कर दो, माँ। ज़रूरत नहीं है अब।" माँ ने पैर रोक लिया। पहिया दो-तीन चक्कर और घूमकर रुक गया। कमरे में जो ख़ामोशी आई, वह बिशन ने सोची नहीं थी। वह वैसी बिलकुल नहीं थी जैसी उसने बचपन में हर रात सोची थी।
ग्यारह दिन तक घर में मशीन नहीं चली। ग्यारह दिन। माँ सुबह उठतीं, काम निपटातीं, और फिर खिड़की के पास बैठी रहतीं। वे बीमार नहीं थीं। नाराज़ भी नहीं थीं। बिशन दुकान से जल्दी लौटने लगा और उसे समझ नहीं आता था कि लौटकर करे क्या। बारहवें दिन रात को वह बिस्तर पर था, आधी नींद में, जब उसे वह आवाज़ सुनाई दी।
वह उठकर देखने गया। माँ पुरानी मशीन पर थीं और जो सिल रही थीं वह किसी ऑर्डर का नहीं था। पड़ोस की एक लड़की की शादी थी और उसका लहँगा कमर पर छोटा पड़ गया था। माँ ने बिशन को दरवाज़े पर खड़ा देखा और कहा, "यह पैसे का काम नहीं है। जा, सो जा।" बिशन वहीं खड़ा रहा।
अब घर में दोनों मशीनें हैं। बिजली वाली पर माँ ने आज तक काम नहीं किया और बिशन ने उसे आज तक हटाया नहीं। पुरानी वाली रात दस बजे तक चलती है, कभी-कभी ग्यारह तक, पर अब उसका हिसाब कोई नहीं रखता।
बिशन अब भी उसी आवाज़ में सोता है। बचपन में वह हर रात यही चाहता था कि यह आवाज़ एक दिन बंद हो जाए। अब वह सिर्फ़ इतना चाहता है कि जिस रात यह बंद हो, उस रात वह घर पर हो।