बाबा रामकृष्ण गाँव के बाहर एक कुटिया में रहते थे और किसी से ज़्यादा बात नहीं करते थे। गाँव में उनके बारे में एक बात चलती थी। बाबा के पास एक ख़ज़ाना है। कोई कहता सोना-चाँदी। कोई कहता उससे भी बड़ी कोई चीज़। बाबा से किसी ने कभी सीधे नहीं पूछा, क्योंकि पूछने वाले को डर था कि जवाब मिल गया तो बात ही ख़त्म हो जाएगी।

गाँव में इस बात के दो पक्ष थे। एक कहता था कि ख़ज़ाना है और बाबा उसे किसी सही आदमी के इंतज़ार में रोके हुए हैं। दूसरा कहता था कि ख़ज़ाना होता तो बाबा की कुटिया की छत साल में दो बार क्यों छवानी पड़ती। दोनों पक्ष शाम को चौपाल पर बैठकर यही बहस करते और दोनों को इस बहस में मज़ा आता था। बहस कभी ख़त्म नहीं होती थी, क्योंकि उसे ख़त्म करने का एक ही तरीक़ा था और वह किसी को मंज़ूर नहीं था।

रोहन उस साल गाँव आया था, अपने मामा के यहाँ, क्योंकि शहर में उसका काम नहीं चला था। उम्र चौबीस, हाथ मज़बूत, और जेब में इतना भी नहीं कि वापसी का किराया निकल आए। दिन भर वह मामा के खेत में काम करता और शाम को चौपाल पर बैठ जाता। ख़ज़ाने की बहस उसने पूरे दो महीने सुनी। तीसरे महीने की एक सुबह वह चौपाल नहीं गया। वह सीधा कुटिया चला गया।

सच बोलने की घड़ी

बाबा बाहर बैठे थे और लकड़ी की एक कटोरी घिस रहे थे। रोहन ने प्रणाम किया और सीधे पूछ लिया, "बाबा, ख़ज़ाना है?" बाबा ने कटोरी नीचे नहीं रखी। "है," उन्होंने कहा। रोहन का दिल तेज़ चलने लगा। "कहाँ है?" "खो गया है," बाबा ने कहा, और कटोरी घिसते रहे।

बात इतनी ही थी। बाबा के दादा के पास ज़मीन थी और पैसा भी। लूट का डर हुआ तो उन्होंने घर का सारा सोना एक ताँबे के बक्से में भरकर दो पीपल वाले खेत में गाड़ दिया और किसी को जगह नहीं बताई। वे उसी बरस चल बसे। उसके तीस साल बाद नदी ने रास्ता बदल लिया। अब वहाँ न दो पीपल थे, न वह मेड़, न वह खेत, सिर्फ़ एक बंजर पट्टी थी जिस पर कुछ नहीं उगता था। "ढूँढ़ना चाहो तो ढूँढ़ लो," बाबा ने कहा। "मुझसे नहीं हुआ।"

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रोहन ने उसी दिन से खोदना शुरू किया। ज़मीन बंजर थी और उस पर किसी का दावा नहीं था, इसलिए किसी ने रोका भी नहीं। गाँव वाले पहले हफ़्ते हँसे, दूसरे हफ़्ते देखने आए, तीसरे हफ़्ते भूल गए। रोहन सुबह मामा के खेत में काम करता और दोपहर बाद कुदाल उठाकर बंजर पर चला जाता। शाम को वह मिट्टी से भरा हुआ लौटता और खाना खाते-खाते सो जाता।

जाड़े की एक दोपहर बाबा ख़ुद चलकर वहाँ तक आए। यह गाँव में किसी ने पहले नहीं देखा था। वे मेड़ पर खड़े होकर देर तक गड्ढों को देखते रहे। रोहन ने कुदाल रोक दी और सीधा खड़ा हो गया, इस उम्मीद में कि बाबा कोई निशानी बताएँगे, कोई पत्थर, कोई पेड़। बाबा ने कुछ नहीं बताया। उन्होंने सिर्फ़ पूछा, "थकते नहीं?" रोहन ने कहा कि थकता है। बाबा ने सिर हिलाया, जैसे यही सुनना चाहते हों, और वापस चल दिए। रोहन उस दिन अँधेरा होने तक खोदता रहा।

जाड़े भर वह खोदता रहा। बक्सा नहीं मिला। जो मिला वह पत्थर था, और पत्थर बहुत मिले। नदी पुराने रास्ते में जो कुछ छोड़ गई थी, वह सब उसी ज़मीन के नीचे दबा था। रोहन पत्थर निकालकर किनारे रखता गया और किनारा दीवार बनता गया। एक शाम उसने पीछे मुड़कर देखा और उसे दिखा कि उसने बिना सोचे लगभग आधा बीघा ज़मीन साफ़ कर दी है, और उसकी मिट्टी उलट-पुलटकर भुरभुरी हो गई है।

जब सही राह दिखी

होली के आसपास गाँव का एक किसान, धनीराम, उधर से गुज़रा और रुक गया। उसने झुककर मुट्ठी भर मिट्टी उठाई और उँगलियों में मली। "यह ज़मीन अब बोने लायक़ है," उसने कहा। रोहन ने कहा कि उसने तो सिर्फ़ खोदा है। धनीराम हँसा। "खेत तैयार करने का यही मतलब होता है, भाई।" उसी शाम दोनों ने बात तय कर ली: ज़मीन बंजर की, मेहनत रोहन की, बीज धनीराम के, और फ़सल आधी-आधी।

पहली फ़सल में रोहन को उतना मिला जितना शहर में छह महीने में मिलता था। दूसरे साल उसने धनीराम से बीज लेना बंद कर दिया। पाँचवें साल उसने वह बंजर ख़रीद लिया, काग़ज़ पर, अपने नाम। गाँव में अब कोई नहीं कहता कि वह ख़ज़ाना ढूँढ़ने आया था। लोग बस इतना कहते हैं कि लड़का मेहनती निकला।

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बाबा दो बरस पहले चल बसे। रोहन उनकी कुटिया की छत अब भी साल में दो बार छवाता है, हालाँकि उसमें कोई नहीं रहता। और हर साल बोआई से पहले वह खेत के उस कोने में जाता है जहाँ अब तक कुदाल नहीं चली, और दो-तीन घंटे खोदता है। ताँबे का बक्सा उसे आज तक नहीं मिला। ढूँढ़ना उसने आज तक छोड़ा भी नहीं।