लड़के का काम छोटा था, दुकान से भी छोटा। एक ठेला, कुछ सामान, और दिन भर की भागदौड़। वह मेहनत करता था और ईमानदार भी था, फिर भी हर महीने हिसाब गड़बड़ा जाता। रात को वह बैठकर सोचता कि कमी कहाँ रह गई। कागज़ पर सब ठीक लगता था। असल में कुछ ठीक नहीं था।

गली में उसका ठेला साढ़े छह बजे लगता था, नुक्कड़ वाले हैंडपंप के पास। ग्राहक ज़्यादातर वही औरतें थीं जो उसे बचपन से जानती थीं और इसी वजह से भाव कम कराने में उन्हें कोई झिझक नहीं होती थी। मुकेश कभी झगड़ता नहीं था। वह तराजू में एक पलड़ा हल्का झुका देता, ऊपर से कुछ और डाल देता, और अगली आवाज़ लगा देता। शाम को ठेला ख़ाली हो जाता और उसे लगता कि दिन अच्छा गया।

नाम मुकेश था, उम्र इक्कीस, और ठेले पर सब्ज़ी। सुबह चार बजे मंडी, छह बजे गली, और शाम तक सात-आठ सौ की बिक्री। महीने के आख़िर में हाथ में लगभग कुछ नहीं बचता था। उसकी दादी सिलाई करती थीं और उन्होंने एक बार, बिना किसी ख़ास मौके के, कहा था, "जो चीज़ छोटी लगती है, उसी का हिसाब नहीं रखा जाता। और गड़बड़ भी वहीं से शुरू होती है।" मुकेश ने तब सुना नहीं था। उसे लगा था कि दादी सिलाई की बात कर रही हैं।

एक छोटा फैसला, बड़ा असर

उस साल जुलाई में मंडी वाले बद्री ने उसे उधार देना बंद कर दिया। "तीन महीने से एक ही हिसाब चल रहा है, मुकेश," उसने कहा। "तू घाटे में नहीं है, फिर भी पैसे नहीं हैं। ऐसा कैसे होता है?" मुकेश के पास जवाब नहीं था। उस दिन वह आधा ठेला ही भर सका। शाम को ठेला ख़ाली हुआ, बिक्री ठीक रही, और घर पहुँचकर उसने जेब से जो निकाला वह गिनने लायक़ भी नहीं था। वह छत पर बैठकर देर तक सोचता रहा कि सब्ज़ी बेचना छोड़कर शहर चला जाए। पर शहर में करता क्या, यह उसे नहीं पता था।

उस रात दादी ने अपनी अलमारी से एक पतली कॉपी निकाली और उसके सामने रख दी। "आज से एक काम करो," उन्होंने कहा। "जो भी दो, लिखो। जो भी लो, लिखो। एक रुपया भी छोड़ा तो कॉपी झूठी हो जाएगी और झूठी कॉपी से कोई फ़ायदा नहीं।" मुकेश हँस पड़ा। उसे लगा कि दादी को धंधे की समझ नहीं है। कॉपी उसने फिर भी रख ली, सिर्फ़ इसलिए कि मना करना ठीक नहीं लगा।

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पहले तीन दिन कॉपी में कुछ ख़ास नहीं निकला। मंडी का ख़र्च, ठेले का किराया, तराजू का टूटा बाट, दो चाय। सब जगह का हिसाब मिल रहा था। चौथे दिन उसने एक अलग पन्ना खोला और उस पर वह लिखना शुरू किया जो वह ग्राहकों को मुफ़्त देता था। हरी मिर्च की एक मुट्ठी। धनिया का एक गुच्छा। एक नींबू, अगर कोई बच्चा साथ हो। दिन भर वह हर बार पेंसिल से एक लकीर खींचता रहा। शाम को उसने लकीरें गिनीं। इकतालीस।

मुकेश उस रात कॉपी लेकर बैठ गया। एक मुट्ठी मिर्च का दाम दो रुपये। इकतालीस मुट्ठी यानी बयासी रुपये। महीने के पच्चीस सौ। यह ठीक उतना ही था जितना उसे हर महीने कम पड़ता था। वह देर तक उस आँकड़े को देखता रहा। कोई चोरी नहीं हुई थी। किसी ने धोखा नहीं दिया था। मंडी का भाव भी ठीक था। उसने अपनी पूरी बचत ख़ुद, अपने ही हाथों से, मुट्ठी-मुट्ठी करके बाँट दी थी, और हर बार उसे इतना अच्छा लगा था कि उसने कभी गिनने की ज़रूरत ही नहीं समझी।

अगली सुबह उसने मुट्ठी देना बंद नहीं किया। उसने सिर्फ़ इतना किया कि हर सब्ज़ी का भाव पचास पैसे बढ़ा दिया और मुफ़्त वाली मुट्ठी थोड़ी और बड़ी कर दी। किसी ग्राहक ने भाव पर सवाल नहीं किया। दो-तीन ने इतना ज़रूर कहा कि आजकल मुट्ठी भारी हो गई है। एक बुज़ुर्ग औरत, जो पहले सामने वाले ठेले से लेती थीं, अब उसी से लेने लगीं। दूसरे महीने के आख़िर में उसके हाथ में उन्नीस सौ रुपये बचे। उसने कॉपी बंद नहीं की।

नीयत का फर्क

दिवाली से पहले उसने दादी के लिए एक नई सिलाई मशीन ख़रीदी और उसे बिना कुछ कहे कमरे में रख दिया। दादी ने मशीन देखी। फिर उन्होंने उसकी कॉपी उठाई, जो अब तीसरी थी। "कितने की आई?" उन्होंने पूछा। मुकेश ने दाम बताया। दादी ने उसे वह दाम कॉपी में लिखवाया, तारीख़ डलवाई, और तब जाकर मशीन पर हाथ रखा।

अब भी वह सुबह चार बजे मंडी जाता है। ठेला वही है, हैंडपंप वाली जगह वही है, और मिर्च की मुट्ठी अब भी मुफ़्त जाती है। बस उसके गल्ले में एक पतली कॉपी हमेशा पड़ी रहती है, पेंसिल के साथ, और उसमें आज तक एक भी दिन ख़ाली नहीं गया।