उस नगर में एक युवक था जिसे लोग जल्दबाज़ नहीं कह सकते थे, और डरपोक भी नहीं। वह कोई काम शुरू करने से पहले उसे उलट-पलटकर देखता, और एक बार शुरू कर देता तो बीच में नहीं छोड़ता। यह आदत उसने अपने पिता से नहीं सीखी थी। उसके पिता जल्दी फ़ैसला लेते थे और अक्सर पछताते थे। लड़के ने बचपन में यह देखा, और चुपचाप उल्टा रास्ता चुन लिया।
रामखिलावन के पास नाव थी और वह उसी से रोज़ी कमाता था। नदी पार वाली बस्ती के लोग सुबह इस पार आते हैं और शाम को लौटते हैं, और पुल दस किलोमीटर नीचे है।
नाव में छह आदमी बैठते हैं। सात में वह पानी के बराबर आ जाती है और आठ में उससे ऊपर। यह गिनती उसने ख़ुद नहीं बनाई थी। यह नाव की बनावट है।
बीस बरस में उसने कभी सात नहीं बिठाए और इसके लिए उसने कई बार लोगों से बहस की।
बहस हमेशा एक ही तरह की होती थी। कोई कहता कि एक आदमी से क्या फ़र्क़ पड़ता है, और यह बात सुनने में ठीक लगती है। फ़र्क़ यह पड़ता है कि नाव की क्षमता एक सीधी लकीर नहीं है। छह पर वह ठीक चलती है, सात पर वह चलती तो है पर मुड़ने में देर लगाती है, और आठ पर वह उस दिन डूबती है जिस दिन कुछ और भी हो जाए। बीस बरस में ऐसा दिन दो बार आया था और दोनों बार नाव में छह ही थे।
उस बरस भादों में पानी आया।
ऊपर के ज़िले में बाँध खुला और ख़बर दोपहर में आई, और ख़बर के हिसाब से पानी रात में पहुँचता।
बस्ती नीची है। वहाँ अड़तीस घर हैं और उनमें से बीस कच्चे हैं।
शाम तक ज़्यादातर लोग इस पार आ चुके थे। जो नहीं आए थे, वे इसलिए नहीं आए थे कि उनके पास मवेशी थे और मवेशी नाव में नहीं जाते।
यह बात बाहर वालों को समझ नहीं आती और भीतर वालों को समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। जिस घर में एक भैंस है, उस घर की पूरी कमाई उसी भैंस से है। भैंस छोड़कर चले जाने का मतलब है कि आदमी बच जाएगा और उसका आगे का बीस बरस डूब जाएगा। इसलिए लोग रुकते हैं और आख़िरी वक़्त तक रुकते हैं, और यह मूर्खता नहीं है, हिसाब है।
नौ बजे पानी दिखने लगा।
रामखिलावन ने पहला फेरा नौ बजकर बीस मिनट पर लगाया। छह लोग लाए। दूसरा फेरा दस बजे।
दूसरे फेरे में धार बदल चुकी थी।
चढ़ते पानी में नदी सीधी नहीं बहती। जहाँ किनारा कटता है वहाँ पानी घूमता है और घूमते पानी में नाव का पिछला हिस्सा खिंचता है। ऐसे में नाव का वज़न कम रखना पड़ता है, क्योंकि भारी नाव मुड़ती नहीं।
उस फेरे में घाट पर ग्यारह लोग खड़े थे।
रामखिलावन ने पाँच को बिठाया।
छह नहीं। पाँच।
यह उसका फ़ैसला था और उसने वह अकेले लिया, वहीं खड़े-खड़े, बीस-पच्चीस सेकंड में।
जिन पाँच को उसने बिठाया, उनमें दो बच्चे थे, एक बूढ़ी औरत थी, और दो औरतें थीं। बाक़ी छह मर्द थे।
यह क्रम भी उसने वहीं तय किया और इसमें कोई नियम नहीं है। नियम होता तो आसान होता। रामखिलावन ने वही देखा जो सामने था, यानी कौन तैर सकता है और कौन नहीं, और कौन पेड़ पर चढ़ सकता है और कौन नहीं।
जीतन उन छह में था और उसने उसी वक़्त कहा कि वह भी आ जाएगा, वह दुबला है।
रामखिलावन ने मना कर दिया।
यह मना करना उस रात का असली हिस्सा है और गाँव में इसकी चर्चा आज तक नहीं हुई, क्योंकि इसमें किसी का दोष नहीं निकलता।
तीसरे फेरे के लिए वह लौटा तो घाट पानी में जा चुका था।
वह लौट नहीं सका। यह उसकी हिम्मत की बात नहीं थी। ग्यारह बजे के बाद उस धार में नाव उतारने का मतलब है कि नाव पलटेगी, और पलटने पर एक की जगह दो जाएँगे।
वह किनारे पर रात भर बैठा रहा।
उस रात के बारे में एक बात और है, जो इस कहानी में सबसे कम कही जाती है। किनारे पर वह अकेला नहीं था। जो पाँच वह लाया था, उनके घर वाले भी वहीं थे और वे भी रात भर वहीं रहे। कोई उससे कुछ नहीं बोला और किसी ने उसे दोष नहीं दिया। पर वे सब वहीं बैठे थे और वह भी वहीं बैठा था, और इन दोनों बातों में फ़र्क़ था।
सुबह जो हुआ वह यह था कि छहों बच गए।
वे पेड़ों पर चढ़ गए थे और सुबह चार बजे ऊपर वाले गाँव की एक नाव उधर से निकली और उसने उन्हें उतार लिया। यह इत्तिफ़ाक़ था। वह नाव किसी और काम से जा रही थी।
जीतन उन्हीं में था।
अब वह इसी गाँव में रहता है और उसकी और रामखिलावन की बातचीत होती है, जैसी दो आदमियों की होती है। उस रात का ज़िक्र दोनों में से किसी ने आज तक नहीं किया, और यह भी कोई असाधारण बात नहीं है।
जो चीज़ रामखिलावन के भीतर बची, वह यह है कि वह उन बीस-पच्चीस सेकंड को अब भी दोहरा सकता है, क़दम दर क़दम, और हर बार वह वही करता है जो उसने उस रात किया था। यह उसे तसल्ली नहीं देता।
उस बरस के बाद ब्लॉक से एक आदेश आया। हर नाव पर सफ़ेद रंग से उसकी क्षमता लिखवाई गई। छह, आठ, बारह, जैसी जिसकी हो।
रामखिलावन की नाव पर छह लिखा गया।
दो बरसात में वह रंग उतर गया। किसी नाव पर दोबारा नहीं लिखा गया और किसी ने माँगा भी नहीं।