लड़के के पास अपनी किताबें नहीं थीं, इसलिए वह उधार लेकर पढ़ता था और लौटाने से पहले ज़रूरी हिस्से कॉपी में उतार लेता था। यह काम रात को होता था, क्योंकि दिन में वह पिता के साथ काम पर जाता। उसे इंजीनियर बनना था। यह बात उसने घर में एक बार कही थी और फिर कभी नहीं दोहराई, क्योंकि पहली ही बार में उसे सबका जवाब मिल गया था।
जवाब यह था कि पैसा नहीं है। यह किसी ने गुस्से में नहीं कहा था। घर में सब उसे चाहते थे, और मुश्किल यहीं थी, क्योंकि जिस बात पर कोई नाराज़ न हो, उससे लड़ा भी नहीं जा सकता।
पिता राजमिस्त्री थे। काम मौसम के हिसाब से मिलता है, यानी बरसात में कम और बाक़ी दिनों में ठीक। लड़का सुबह उनके साथ जाता, मसाला बनाता, ईंट पकड़ाता, और शाम को लौटता। यह मज़दूरी नहीं थी, यह एक आदमी का काम था जो दो आदमियों में बँटा हुआ था।
किताबें उसे स्कूल के एक लड़के से मिलती थीं, जिसके पिता की दुकान थी। शर्त एक ही थी कि किताब चार दिन में लौटानी है, साफ़ हालत में।
चार दिन का हिसाब यूँ बैठता था। पहले दिन वह किताब पूरी पलटता और तय करता कि उतारना क्या है। दूसरे और तीसरे दिन वह लिखता। चौथे दिन सुबह किताब लौटा आता, क्योंकि देर होने पर अगली किताब माँगने में दिक़्क़त होती।
चार दिन में एक पूरी किताब उतारी नहीं जा सकती। इसलिए वह चुनता था। जो हिस्सा किताब में समझाया गया था, उसे वह छोड़ देता। जो हिस्सा सिर्फ़ लिखा था, यानी सूत्र, सवाल, आँकड़े, उसे वह उतार लेता।
रात का काम ग्यारह बजे शुरू होता था, जब बाक़ी घर सो जाता। लालटेन आँगन में नहीं जल सकती थी, क्योंकि तेल का हिसाब था। वह भीतर वाले कमरे में बैठता, दरवाज़ा भिड़ाकर। सर्दियों में उँगलियाँ अकड़ जातीं और अक्षर बड़े हो जाते। इसी वजह से बाद की कॉपियों में लिखाई पहले वाली से मोटी है, और यह फ़र्क़ आज भी साफ़ दिखता है।
तीन बरस में उसकी कॉपियाँ इकतालीस हो गईं।
पहली बार जब उसका नाम सूची में नहीं था, उसने घर में बता दिया कि वह कितने से रह गया। दूसरी बार उसने ख़ुद भी नहीं देखा, क्योंकि सूची में नाम न हो तो नंबर देखने का कोई काम नहीं रहता। दोनों बार वह अगले दिन उसी वक़्त काम पर गया।
पहली बार वह दाख़िले की परीक्षा में नहीं निकला। दूसरी बार भी नहीं। तीसरी बार वह डिप्लोमा वाली सूची में आ गया, इंजीनियरिंग की डिग्री वाली में नहीं। पॉलिटेक्निक क़स्बे से बयालीस किलोमीटर दूर था।
बयालीस किलोमीटर रोज़ आना-जाना नहीं हो सकता था, इसलिए उसे वहीं रहना पड़ा, चार लड़कों के साथ एक कमरे में। किराया दो सौ था और उसमें उसका हिस्सा पचास पड़ता था। महीने में एक बार वह घर आता, इतवार को, और सोमवार की पहली बस से लौट जाता।
तीन साल का कोर्स था। फ़ीस उतनी नहीं थी जितनी वह डरता था। दिक़्क़त फ़ीस नहीं थी।
दिक़्क़त यह थी कि वह सुबह चला जाएगा।
राजमिस्त्री का काम अकेले हो सकता है, पर उसमें दोगुना वक़्त लगता है और तीन गुना ज़ोर। मसाला बनाना, ऊपर पहुँचाना, ख़ुद चिनाई करना, फिर नीचे उतरना। जो काम दो आदमी चार घंटे में करते हैं, एक आदमी दिन भर में करता है।
यह बात घर में किसी ने नहीं उठाई। पिता ने भी नहीं।
जाने से पहले वाली रात उसने पिता से एक ही सवाल पूछा, कि अकेले हो पाएगा क्या। पिता ने कहा कि हो जाएगा। इसके आगे दोनों में से किसी ने बात नहीं बढ़ाई, और यह सवाल दोबारा कभी नहीं उठा।
वह चला गया। तीन साल में वह हर महीने आता रहा और हर बार उसे यह दिखा कि पिता वही काम कर रहे हैं, बस थोड़ा धीरे। दूसरे साल पिता ने ऊँची चिनाई लेना छोड़ दिया, यानी छत का काम, जिसमें पैसा ज़्यादा मिलता है।
एक बार वह इतवार को नहीं, मंगल को आ गया, बिना बताए। पिता छत पर थे। अकेले। मसाला नीचे बना रखा था और वे उसे बाल्टी में भरकर सीढ़ी से ऊपर ले जा रहे थे, एक बार में आधी बाल्टी, क्योंकि पूरी बाल्टी लेकर सीढ़ी नहीं चढ़ी जाती।
तीसरे साल के अंत में उसे नौकरी मिल गई। सिंचाई विभाग में, कनिष्ठ अभियंता के नीचे, ठेके पर। पहली तनख़्वाह में उसने पिता के लिए चश्मा बनवाया, हालाँकि पिता पढ़ते नहीं थे।
चश्मा नाप का था और पिता उसे लगाते भी थे, चिनाई करते वक़्त, क्योंकि उससे लाइन साफ़ दिखती थी।
नौकरी पक्की होने में चार साल और लगे। इस बीच वह दो बार बदला गया और एक बार आठ महीने बिना काम के रहा। यह वह हिस्सा है जो किसी को बताया नहीं जाता, क्योंकि सुनने वाले को उसमें कुछ मिलता नहीं।
पिता ने काम साठ की उम्र तक किया और उसके बाद भी छोटे-मोटे काम लेते रहे। पैसे की ज़रूरत नहीं थी।
इकतालीस कॉपियाँ अब भी घर में हैं। ऊपर वाले कमरे में, एक बक्से में, तिरपाल में लपेटकर रखी हुई। बरसात के बाद हर साल वे धूप में निकाली जाती हैं, एक-एक करके खोली जाती हैं, और फिर वापस रख दी जाती हैं।
यह काम पिता करते हैं। उन्हें उनमें लिखा एक शब्द नहीं आता।