आरा मशीन की आवाज़ सुबह छह बजे शुरू होती थी और समीर उससे पहले उठ जाता था। राज उसी गली में रहता था, तीन मकान छोड़कर, और आठ बजे से पहले कभी नहीं उठता था। दोनों एक ही स्कूल में पढ़े थे। एक ही मास्टर से पिटे भी थे, एक ही दिन, एक ही बात पर। फ़र्क़ बस इतना था कि समीर के हाथ में हमेशा कोई न कोई काम होता था और राज के हाथ में चाय का गिलास।

समीर ने अपने पिता की छोटी सी लकड़ी की दुकान को फ़र्नीचर की वर्कशॉप में बदलने का फ़ैसला किया। दो कारीगर रखे, एक पुरानी आरा मशीन क़र्ज़ पर ली, और शहर के बाज़ार में नमूने भेजने शुरू किए। नौ महीने तक कुछ ख़ास नहीं हुआ। फिर दिवाली से दो महीने पहले पहला बड़ा ऑर्डर आया: एक नए शोरूम के लिए चालीस कुर्सियाँ और आठ मेज़। समीर ने उसी शाम सागौन की पूरी खेप उधार पर मँगवा ली और कारीगरों से कह दिया कि अब छुट्टी दिवाली के बाद ही मिलेगी।

दूसरी ओर, राज को समीर का यह प्रयास बहुत प्रेरणादायक लगा, लेकिन वह खुद व्यवसाय शुरू करने का साहस नहीं जुटा पाया। वह अपनी आलस्य की आदतों से बाहर नहीं निकल पा रहा था। वह समीर से कहता, "तुमने जो किया, वह बहुत अच्छा है, लेकिन मैं यह नहीं कर सकता।" समीर ने उसे हमेशा प्रोत्साहित किया, "तुम भी मेहनत करो, मेहनत और धैर्य से ही हम किसी भी मुश्किल को पार कर सकते हैं।"

सच बोलने की घड़ी

यह कोई नई बात नहीं थी। बारहवीं के इम्तिहान में भी राज ने पर्चा आधा छोड़ दिया था और समीर ने उसे अगले साल फिर से बैठने के लिए तैयार किया था, रोज़ शाम, अपनी दुकान बंद करके। राज पास हो गया था। उसने कभी शुक्रिया नहीं कहा और समीर ने कभी उम्मीद नहीं की। मोहल्ले में लोग कहते थे कि यह दोस्ती एकतरफ़ा है। समीर सुन लेता था और जवाब नहीं देता था, क्योंकि उसे भी कभी-कभी यही लगता था।

शोरूम दिवाली से तीन हफ़्ते पहले बंद हो गया। मालिक शहर छोड़ गया, नंबर बंद हो गया, और चालीस कुर्सियाँ समीर की वर्कशॉप में पॉलिश होकर तैयार खड़ी थीं। सागौन का बिल पंद्रह तारीख़ को चुकाना था। समीर ने कारीगरों को उस हफ़्ते की मज़दूरी दी, उन्हें घर भेजा, और फिर गद्दी पर बैठकर बहीखाता देखता रहा, जैसे उसमें कोई और आँकड़ा छिपा हो जो उसने अब तक नहीं देखा। राज शाम को आया। उसने बहीखाता देखा, फिर कुर्सियों की क़तार देखी, और कहा, "चालीस कुर्सियाँ हैं। दिवाली में बीस दिन हैं। समीर, शहर में एक ही शोरूम तो नहीं है।"

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उस रात दोनों वर्कशॉप में ही रुके। राज ने कुर्सियाँ गिनीं, फिर बैठकर एक काग़ज़ पर मोहल्लों के नाम लिखने लगा। समीर ने कहा कि लोग फ़र्नीचर गली में घूमने वाले से नहीं ख़रीदते। राज ने काग़ज़ से सिर उठाए बिना कहा, "तुझे लकड़ी की समझ है। मुझे लोगों की। नौ महीने से तू नमूने भेज रहा है, समीर। नमूने कोई नहीं देखता। आदमी देखते हैं।" यह पहली बार था जब उसने समीर को कुछ सिखाया था।

अगली सुबह राज ने अपनी साइकिल निकाली और पहले दिन में सिर्फ़ दो कुर्सियाँ बिकीं, वह भी उधार पर। दूसरे दिन एक भी नहीं। तीसरे दिन उसने तरीक़ा बदला। वह हर घर में यह कहकर घुसने लगा कि दिवाली पर घर में नई कुर्सी आए तो साल भर मेहमान आते हैं। यह बात उसने ख़ुद गढ़ी थी और समीर को कभी नहीं बताई। दस दिन में सत्रह कुर्सियाँ बिकीं। बाक़ी तेईस के लिए उसने सब्ज़ी मंडी के मोड़ पर ख़ाली पड़ी दुकान दस दिन के किराए पर ली, बाहर दो कुर्सियाँ रखीं, और एक गत्ते पर लिख दिया: सीधे कारख़ाने से, बिना बिचौलिया।

पंद्रह तारीख़ को समीर ने सागौन का बिल चुकाया और तीन सौ रुपये उसके बाद भी बचे। शाम को वह राज के घर गया और आधे पैसे उसकी तरफ़ बढ़ाए। राज ने नहीं लिए। "कुर्सी मैंने नहीं बनाई," उसने कहा। "मैंने सिर्फ़ बेची।" समीर ने पैसे वापस जेब में रखे और कहा, "तो कल से बनाना भी सीख ले।" राज हँसा और बात टाल दी, जैसे वह हर बात टाल देता था।

जब सही राह दिखी

दिवाली की रात दोनों वर्कशॉप की छत पर बैठे थे। नीचे गली में बच्चे फुलझड़ियाँ जला रहे थे और आरा मशीन दो दिन से बंद पड़ी थी। राज ने पूछा, "अगर कुर्सियाँ न बिकतीं तो?" समीर ने दीये की लौ को हवा से बचाते हुए कहा, "तो मशीन बिक जाती।" फिर वह हँसा। राज नहीं हँसा। वह देर तक नीचे गली की तरफ़ देखता रहा। अगली सुबह छह बजे जब समीर वर्कशॉप पहुँचा, ताला पहले से खुला था। राज अंदर खड़ा था, आरा मशीन के पास, और उसके हाथ में चाय का गिलास नहीं था।