जगन्नाथ का एक उसूल था, जो उसने किसी से सीखा नहीं था। जो कह दिया, वह करना है। यह सुनने में आसान लगता है और होता नहीं है। कई बार उसे नुकसान हुआ, क्योंकि हालात बदल जाते हैं और वादा वहीं का वहीं रह जाता है। जगन्नाथ ने फिर भी उसूल नहीं बदला। उसका मानना था कि आदमी की क़ीमत उसके दिए हुए वचन में होती है।

जो बात इस कहानी में है, वह उसने खड़े-खड़े कही थी और जाते-जाते कही थी।

उसके बड़े भाई की तेरहवीं थी। घर में लोग थे, आँगन में दरी बिछी थी, और जगन्नाथ बाहर निकल रहा था।

भाई का लड़का उस वक़्त नौ बरस का था और वह दरवाज़े के पास बैठा था।

किसी ने कहा कि अब इसका क्या होगा।

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जगन्नाथ ने कहा कि नहर वाला टुकड़ा इसका है।

बस इतना। छह शब्द।

नहर वाला टुकड़ा डेढ़ बीघे का था और वह जगन्नाथ के हिस्से में आया था, बँटवारे में, बड़े भाई के जीते-जी। भाई का अपना हिस्सा दूसरी तरफ़ था और वह पहले ही गिरवी जा चुका था।

जो लोग वहाँ बैठे थे, उन्होंने सुन लिया। सात-आठ लोग रहे होंगे।

सात-आठ लोगों का सुन लेना गाँव में काग़ज़ से कम नहीं होता और ज़्यादा भी नहीं होता। कम इस मायने में कि उससे मालिकाना नहीं बदलता। ज़्यादा इस मायने में कि उससे आदमी का नाम बँध जाता है। जिस बात को सात लोगों ने सुना हो, उससे पलटने वाले को गाँव जीते-जी नहीं भूलता।

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जगन्नाथ को यह उसी वक़्त मालूम था। उसने फिर भी कहा, और यही उसका उसूल था।

काग़ज़ पर कुछ नहीं हुआ। तेरहवीं पर काग़ज़ नहीं बनते। किसी को यह अजीब भी नहीं लगा।

अगले तीन बरस में जगन्नाथ ने वह बात कई बार सोची और हर बार उसे यही लगा कि उसने ठीक कहा था।

चौथे बरस से हालात बदलने लगे।

नहर के उस तरफ़ सड़क बनी। सड़क बनने पर उस पूरी पट्टी की ज़मीन के भाव चढ़ गए, क्योंकि वह अब खेती की ज़मीन नहीं रह गई थी, वह प्लॉट बन गई थी।

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आठ बरस में उस डेढ़ बीघे का भाव इतना हो चुका था कि उससे जगन्नाथ का अपना पूरा घर दोबारा बन सकता था।

उन्हीं बरसों में उसका अपना बेटा बड़ा हुआ।

यह कहना ग़लत होगा कि लड़का उस ज़मीन की वजह से नहीं पढ़ पाया। शहर में रखने का ख़र्च तीन बरस का था और उतना उस ज़मीन को बेचकर भी शायद पूरा न होता। बात इतनी नहीं है।

बात यह है कि घर में एक चीज़ ऐसी थी जिससे कुछ हो सकता था, और वह किसी और के लिए रखी हुई थी, और यह हर उस दिन दिखता था जब पैसे की बात होती थी।

बेटा बारहवीं के बाद पढ़ नहीं पाया, क्योंकि आगे की पढ़ाई शहर में होती और शहर में रहना महँगा है। उसने वही किया जो ऐसे लड़के करते हैं। वह एक दुकान पर लग गया।

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इन नौ बरसों में जगन्नाथ से यह बात कई बार कही गई। उसकी पत्नी ने कही। उसकी अपनी बहन ने कही। एक बार पंचायत के एक आदमी ने भी कह दिया कि ज़ुबान की बात ज़ुबान तक होती है और उस वक़्त हालत दूसरी थी।

सबकी बात में दम था। जगन्नाथ के पास इनमें से किसी का जवाब नहीं था और उसने कोई जवाब दिया भी नहीं। वह हर बार यही कहता था कि कह चुका हूँ।

नौवें बरस में भाई का लड़का, जो अब अठारह का था, नहर वाले टुकड़े की बात लेकर आया।

जगन्नाथ ने उसे लिखवा दिया। उसी हफ़्ते।

रजिस्ट्री के दिन उसका अपना बेटा साथ नहीं गया। घर पर भी नहीं मिला।

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उस दिन के बाद बेटे ने तीन बरस तक उससे ठीक से बोला नहीं। घर में रहा, खाना खाता रहा, काम पर जाता रहा, और बोलता कम था।

इसे कोई नाटक नहीं समझना चाहिए। अठारह-बीस बरस के लड़के के पास नाराज़ होने का यही एक तरीक़ा होता है।

अब उस बात का दूसरा हिस्सा।

भाई के लड़के ने वह ज़मीन बेच दी। दो बरस में।

उसने उसे ग़लत काम में नहीं लगाया। उसने एक गाड़ी ख़रीदी, टैक्सी चलाने के लिए, और वह चली भी। पैसा बाक़ी घर में लगा।

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चार बरस बाद गाड़ी बिक गई। लड़का अब दूसरे शहर में है।

तो जो हुआ वह यह हुआ कि जगन्नाथ ने अपनी बात रखी, उसकी क़ीमत उसके बेटे ने चुकाई, और जिसके लिए चुकाई गई उसके पास भी वह चीज़ नहीं बची।

इस पर एक तरह की बात यह होती है कि वादा फिर भी वादा है।

दूसरी तरह की बात यह होती है कि आदमी को उतना ही कहना चाहिए जितना बाद में उठा सके।

दोनों बातें सही हैं और दोनों उस दिन के काम नहीं आतीं जिस दिन कहनी पड़ती है, क्योंकि वह दिन ऐसा होता है जिसमें आदमी सोचकर नहीं बोलता।

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बेटे ने चौथे बरस से बात करनी शुरू कर दी। अब ठीक है। ऊपर से तो ठीक ही है। इस पर घर में कभी बात नहीं हुई और शायद कभी होगी भी नहीं।

नहर वाले टुकड़े पर अब मकान बना हुआ है, दो मंज़िल का, और वह किसी तीसरे आदमी का है।

उस टुकड़े के कोने पर जगन्नाथ ने बरसों पहले एक पत्थर गाड़ा था, हद बताने के लिए, अपने हाथ से।

मकान की दीवार उसी कोने से उठी है। पत्थर अब दीवार के भीतर है।