रमेश की सबसे बड़ी ख़ूबी यह थी कि वह कभी जल्दी में नहीं रहता था। गाँव में किसी का झगड़ा होता तो लोग उसे बुला लाते। हल उसके पास नहीं होता था। वह पूरी बात सुन लेता था, और गाँव में इतना ही काफ़ी है। वह सुनता, फिर थोड़ा ठहरता, और तब बोलता। यह ठहराव उसने कहीं से सीखा नहीं था। लोग कहते थे कि उसका स्वभाव ही ऐसा है।
यह तरीक़ा काम करता था और उसका काम करना कोई इत्तिफ़ाक़ नहीं था।
गाँव के ज़्यादातर झगड़े इसलिए बढ़ते हैं कि दोनों तरफ़ को यह लगता है कि उनकी पूरी बात सुनी नहीं गई। बात दो मिनट में बताई जा सकती है, पर आदमी उसे दो मिनट में बताना नहीं चाहता। उसे यह चाहिए कि सामने वाला बैठा रहे।
रमेश बैठा रहता था। बीस बरस में उसने यही किया।
मुँहबोले हिसाब में इस तरीक़े ने बहुत कुछ बचाया। दो कुओं का झगड़ा, जिसमें मार-पीट हो चुकी थी। एक शादी, जो टूटते-टूटते बची। कई छोटी बातें, जिनका नाम भी अब किसी को याद नहीं, और यही उनके निपट जाने का सबूत है।
शहतूत वाला मामला उन्हीं में से एक होना चाहिए था।
गिरधारी और भोलानाथ भाई थे और उनका बँटवारा बाप के मरने पर हुआ था। ज़मीन बराबर बँटी थी और उसमें कोई विवाद नहीं था। विवाद एक पेड़ पर था।
शहतूत का वह पेड़ ठीक मेड़ पर खड़ा था। जड़ें दोनों तरफ़ थीं। फल गिरता दोनों तरफ़ था। छाँव दोपहर तक एक तरफ़ पड़ती थी और उसके बाद दूसरी तरफ़।
बात पेड़ की भी नहीं थी।
काग़ज़ में मेड़ की लकीर पेड़ के बीच से गुज़र रही थी और यह लिखने वाले की चूक थी, पचास बरस पुरानी। बाप के वक़्त इससे कुछ नहीं बिगड़ा, क्योंकि ज़मीन एक ही थी। बँटवारे के बाद वह लकीर दो कागज़ों में अलग-अलग तरीक़े से उतरी। एक में पेड़ गिरधारी की तरफ़ था और दूसरे में भोलानाथ की तरफ़।
दोनों काग़ज़ सही थे और दोनों एक साथ सही नहीं हो सकते थे।
रमेश को अगहन में बुलाया गया।
उसने वही किया जो वह हमेशा करता था। उसने दोनों को अलग-अलग सुना, फिर साथ सुना, फिर उनकी औरतों को सुना, फिर उस बूढ़े पटवारी को खोजा जिसने बँटवारे के वक़्त नाप लिया था और जो अब दूसरे गाँव में रहता है। पटवारी को याद नहीं था। रमेश ने उससे तीन बार बात की, क्योंकि कभी-कभी तीसरी बार में याद आ जाता है।
इस सब में सैंतालीस दिन लगे।
इन्हीं सैंतालीस दिनों के बीच में वे ग्यारह दिन पड़े जो असल में मायने रखते थे।
पूस में तहसील का अभिलेख दुरुस्ती शिविर गाँव में लगता है। वह ग्यारह दिन बैठता है। उन ग्यारह दिनों में नाप की ग़लती मौक़े पर ठीक कराई जा सकती है, दोनों पक्ष हाज़िर हों और दोनों राज़ी हों तो। इसमें कोई फ़ीस नहीं लगती।
शिविर उस बरस भी लगा और ग्यारह दिन बैठा रहा।
रमेश को इसकी ख़बर थी। यह छिपी हुई बात नहीं थी, मुनादी हुई थी। उसे यह भी मालूम था कि दोनों भाई उन दिनों राज़ी थे, क्योंकि दोनों को यक़ीन था कि नाप उन्हीं के हक़ में निकलेगी।
उसने सोचा कि पहले पूरी बात साफ़ हो जाए। आधी समझ के साथ काग़ज़ में कुछ लिखवा देना उसे ठीक नहीं लगा, और यह सोच ग़लत नहीं थी। बीस बरस में उसे इसी सोच ने सही रखा था।
उन ग्यारह दिनों में रमेश दो बार शिविर के पास से गुज़रा। दोनों बार वहाँ भीड़ थी और दोनों बार उसने सोचा कि अभी तो पटवारी वाली बात बाक़ी है। नौवें दिन गिरधारी ने ख़ुद उससे पूछा कि शिविर में चला जाएँ क्या, और रमेश ने कहा कि दो-चार दिन और रुक जाओ। गिरधारी रुक गया, क्योंकि रमेश ने कहा था।
शिविर बारहवें दिन उठ गया।
उसके बाद वही काम अदालत से होना था। ज़िले की अदालत में हद-बंदी का मुक़दमा चार से छह बरस लेता है और उसमें वकील लगता है।
मुक़दमा दूसरे बरस दायर हुआ। तीसरे बरस भोलानाथ ने अपना हिस्सा बेच दिया।
उसने पूरा हिस्सा नहीं बेचा, मेड़ वाला किनारा बेचा, और सस्ते में बेचा, क्योंकि विवाद वाली ज़मीन सस्ते में ही बिकती है। ख़रीदने वाला हरखचंद था, जो पास के क़स्बे से था और जिसका किसी से कोई पुराना रिश्ता नहीं था।
हरखचंद ने वह काम एक दोपहर में निपटा दिया।
उसने पेड़ कटवा दिया और उसकी जगह दीवार खड़ी करवा दी। पेड़ कटने पर किसी काग़ज़ की ज़रूरत नहीं पड़ी, क्योंकि जब तक विवाद बना हुआ था तब तक पेड़ को कोई नहीं छू सकता था, और बिक जाने के बाद उसका आधा हिस्सा साफ़ तौर पर हरखचंद का था। आधा शहतूत खड़ा नहीं रह सकता।
गिरधारी ने मुक़दमा वापस ले लिया। लड़ने को कुछ बचा नहीं था।
दोनों भाइयों के घर आज भी आमने-सामने हैं। बात नहीं होती। यह भी नहीं कि कोई दुश्मनी हो। बस ग्यारह बरस हो गए और अब शुरू करने का कोई मौक़ा नहीं बनता।
रमेश अब भी बुलाया जाता है और अब भी पूरी बात सुनता है। वह तरीक़ा वैसा ही है और उसने उसमें कुछ नहीं बदला। बदलने लायक़ उसमें कुछ था भी नहीं। एक चीज़ ज़रूर हुई कि अब वह पहले पूछ लेता है कि इसमें कोई तारीख़ तो नहीं लगी है।
दीवार अब भी वहीं है। वह पक्की है, दो हाथ ऊँची, और बिलकुल सीधी। मेड़ पर उतनी सीधी लकीर पहले कभी नहीं थी। जो चीज़ दोनों भाई चाहते थे, वह अब मौजूद है, और वह किसी की नहीं है।