गाँव में रामरती के बारे में एक ही बात कही जाती थी और वह तारीफ़ थी।
बाईस बरस से वह अपने देवर को सँभाल रही थी। लोग यह बात नए आने वालों को बताते थे, और बताते हुए उनकी आवाज़ में वह चीज़ आ जाती थी जो किसी मंदिर की बात करते हुए आती है।
रामसिंगार की उम्र उस वक़्त उन्नीस थी जब वह छत से गिरा।
वह छप्पर ठीक कर रहा था और बाँस टूट गया। रीढ़ में चोट आई और कमर से नीचे काम करना बंद हो गया। यह उसी बरस हुआ जिस बरस रामरती उस घर में ब्याहकर आई थी। उसकी शादी को सात महीने हुए थे।
शुरू के दो बरस सब मिलकर करते थे। सास थीं, हुकुम था, और गाँव भी आता-जाता था।
तीसरे बरस सास चली गईं।
हुकुम खेत देखता था और खेत बिना देखे नहीं चलता। यह कोई बहाना नहीं था। दो बीघे में जो होता है, उससे चार लोगों का घर चलता है, और वह भी तब जब कोई पूरे दिन खेत पर हो।
इसलिए जो काम बचा, वह रामरती के पास आ गया।
वह काम क्या है, यह गाँव में किसी ने कभी ठीक से नहीं गिना। गिनने में यह आता है।
सुबह उसे करवट दिलाना, क्योंकि एक ही करवट में पड़े रहने से पीठ पर घाव बन जाता है और वह घाव फिर भरता नहीं। दिन में तीन बार। रात में एक बार। पेशाब की नली हर तीसरे दिन साफ़ करनी होती है और यह काम अस्पताल वाले सिखा देते हैं, पर करना घर पर ही पड़ता है। नहलाना, जो अकेले आदमी से नहीं होता, इसलिए हुकुम को शाम को आना पड़ता था और यही एक काम था जिसमें वह हमेशा आया।
इसके अलावा वही सब जो हर घर में होता है। खाना, बर्तन, भैंस, ईंधन।
और वह भी जो घर में नहीं गिना जाता। रामसिंगार पढ़ा-लिखा था, आठवीं तक, और उसे दिन भर कुछ चाहिए होता था। शुरू के बरसों में वह चिड़चिड़ाता था और चिड़चिड़ाना जायज़ था। बीच के बरसों में वह चुप हो गया। आख़िरी बरसों में वह बहुत बोलने लगा, ज़्यादातर उन्हीं बातों को दोहराते हुए, और सुनने वाला एक ही था।
रामरती ने उसे कभी टोका नहीं, और यह उसकी भलमनसाहत नहीं थी। टोकने से बात लंबी होती और बात लंबी होने का वक़्त उसके पास नहीं था।
रामरती ने खेत जाना दूसरे बरस छोड़ दिया था।
छोड़ने का कोई दिन नहीं था। एक हफ़्ते वह नहीं गई क्योंकि रामसिंगार को बुख़ार था। अगले हफ़्ते इसलिए नहीं गई कि पहले हफ़्ते का काम घर में जमा हो गया था। फिर बरसात आ गई। फिर यह तय-सा हो गया कि वह घर पर रहती है, और जो चीज़ तय हो जाए उसे कोई दोबारा नहीं उठाता।
यह भी एक ऐसी बात है जिसे कोई गिनता नहीं। वह ब्याह से पहले खेत में काम करती थी और उसे यह अच्छा लगता था, इस तरह अच्छा कि वह भोर में सबसे पहले निकल जाती थी। दूसरे बरस से वह घर में रह गई और अठारह बरस घर में रही।
चंद्रकला उन्हीं बरसों में बड़ी हुई।
उसकी शादी उन्नीस की उम्र में कर दी गई। यह उस गाँव में जल्दी नहीं मानी जाती, पर रामरती ने ख़ुद यह चाहा था और वजह उसने किसी को नहीं बताई। बात यह थी कि लड़की घर में रहती तो उसे भी वही काम करना पड़ता, और वह काम एक बार शुरू हो जाए तो छूटता नहीं।
रामसिंगार पिछले जाड़े में गया। बयालीस का था।
जो हुआ वह यह था कि निमोनिया हो गया और तीन दिन में बात ख़त्म हो गई। जो लोग बरसों लेटे रहते हैं, उनके साथ अक्सर यही होता है।
तेरहवीं तक घर भरा रहा। सब आए और सबने रामरती से वही कहा जो कहा जाता है।
एक बात और हुई, जो होती है। घर में जगह खुल गई। जिस कोठरी में रामसिंगार बाईस बरस रहा, वह अब ख़ाली थी, और उसमें अनाज रखा जा सकता था, जो अब तक बरामदे में रखा जाता था और जिसमें चूहे लगते थे। यह किसी ने कहा नहीं। पंद्रहवें दिन हुकुम ने बोरे उठाकर भीतर रख दिए और घर में इस पर कोई बात नहीं उठी।
उन दिनों गाँव ने एक चीज़ नोट की और उस पर बात भी हुई। रामरती रोई नहीं।
इसे लेकर दो तरह की बातें चलीं। एक यह कि सदमे में ऐसा होता है। दूसरी यह जो सीधे नहीं कही गई।
दोनों में से कोई सही नहीं थी।
जो आदमी बाईस बरस आपके हाथों पर रहा हो, उसके जाने पर जो होता है, उसका कोई एक नाम नहीं है, और गाँव के पास दो ही नाम हैं। दुख और बेदिली।
चालीसवें दिन रामरती भोर में उठी और खेत चली गई।
किसी ने उसे भेजा नहीं था और खेत पर उस दिन कोई ख़ास काम भी नहीं था। हुकुम पीछे-पीछे गया और चुपचाप खड़ा रहा, क्योंकि पूछने के लिए उसके पास कोई ठीक सवाल नहीं था।
वह मेड़ पर बैठी नहीं। उसने हँसिया उठाया और उधर की घास काटने लगी जहाँ से काटी जानी थी।
पहले दिन उसने तीन घंटे काम किया।
शाम को उसकी हथेलियों में तीन जगह छाले पड़ गए, वहीं जहाँ हँसिये की मूठ बैठती है। यह उन्नीस बरस की लड़की वाले हाथ नहीं थे। यह उन्नीस बरस घर में रहे हाथ थे, जिनमें और तरह की सख़्ती आ चुकी थी और यह वाली नहीं आई थी।
वह अगले दिन फिर गई। छाले फूटे और उनके नीचे नई खाल आई और दस दिन में हाथ बैठ गया।
अब वह रोज़ जाती है और सबसे पहले जाती है, जैसे बाईस बरस पहले जाती थी।