रीवा की उस गली में रोहित की दुकान आठ फ़ुट की थी। गैस के रेगुलेटर, रबर की नली, चूल्हे की टोंटी, और वह सब जो रसोई में ख़राब होता है। काम सीखने में दो साल लगे। दुकान जमने में चार। लोग उसे इसलिए बुलाते थे कि वह जल्दी आ जाता था।
नली पर एक तारीख़ छपी होती है। पाँच साल की। तारीख़ निकलने के बाद रबर ऊपर से वैसा ही दिखता है और भीतर से सूख जाता है। रोहित के पास पिछले साल का माल पड़ा था, इक्कीस नलियाँ, जिनकी तारीख़ निकल चुकी थी। लौटाने पर आधे पैसे मिलते।
उसने उन्हें फेंका नहीं। उसने बेचा। तारीख़ छोटी छपती है और नली मुड़ी हुई बिकती है, और कोई ग्राहक उसे खोलकर नहीं पढ़ता। इक्कीस नलियाँ चार महीने में निकल गईं। उन पैसों से उसने दुकान में एक पंखा लगवाया।
जब आईना सामने आया
पंखा लगने के बाद दुकान में गर्मी कम हो गई और ग्राहक थोड़ी देर और रुकने लगे। रुकने वाला ग्राहक कुछ न कुछ और ख़रीद लेता है। साल के आख़िर में रोहित ने हिसाब लगाया तो पंखे ने अपनी क़ीमत तीन महीने में निकाल दी थी। यह बात उसने अपनी बीवी को बताई थी, गर्व से।
डेढ़ साल तक कुछ नहीं हुआ। इतना वक़्त बीत जाने पर आदमी को लगने लगता है कि बात ख़त्म हो गई। रोहित ने उन नलियों के बारे में सोचना बंद कर दिया था।
जेठ की एक दोपहर गली के आख़िरी मकान की रसोई में आग लगी। नली सिलेंडर के जोड़ के पास से फटी थी और गैस भरती रही, और औरत ने माचिस जलाई। मकान नहीं जला। रसोई जली, और उसके साथ उस औरत के दोनों हाथ, कलाई से ऊपर तक।
जाँच जैसी कोई चीज़ नहीं हुई। दमकल आई। बात ख़त्म हुई। मोहल्ले ने तय कर लिया कि सिलेंडर पुराना रहा होगा। रोहित उस रसोई में गया, दूसरे दिन, और जली हुई नली का एक टुकड़ा उठा लाया। उस पर तारीख़ वाला हिस्सा बचा हुआ था। वह उसकी बेची हुई नली थी।
उस औरत का नाम शन्नो था और वह रोहित से कोई पंद्रह साल बड़ी थी। उसके घर वह दो बार पहले भी जा चुका था, एक बार चूल्हे की टोंटी बदलने और एक बार रेगुलेटर देखने। दूसरी बार उसी ने नली भी बदली थी। तारीख़ उसने तब भी नहीं पढ़ी थी, क्योंकि पढ़ने की ज़रूरत उसे कभी महसूस ही नहीं हुई थी।
बदले हुए कदम
उसने वह टुकड़ा किसी को नहीं दिखाया। यह उसकी दूसरी ग़लती थी और यह बात वह आज तक जानता है। पर उसने एक काम किया। उसने अपनी कॉपी निकाली और उन चार महीनों के सारे ग्राहक ढूँढने शुरू किए।
कॉपी में पूरे नाम नहीं थे। मोहल्ला लिखा था, कभी मकान का कोई निशान। रोहित घर-घर गया और कहा कि कंपनी ने पुराना माल वापस माँगा है और नई नली मुफ़्त लगेगी। यह झूठ था। नली उसने अपने पैसे से ख़रीदी। इक्कीस में से सत्रह उसने ढूँढ लीं।
चार नहीं मिलीं। उनमें एक वही थी जो फट चुकी थी। बाक़ी तीन कहाँ हैं, यह उसे आज तक नहीं मालूम, और यही वह चीज़ है जो उसे रात में जगाती है।
उन तीन नलियों के लिए उसने एक काम और किया। उसने गली-गली में यह बात फैलाई कि उस साल का माल ख़राब निकला था और जिसकी नली दो साल से पुरानी हो, वह दिखा ले। लोग आए। बहुत आए। उसने सबकी देखी, मुफ़्त। जो तीन उसे चाहिए थीं, वे इनमें नहीं निकलीं।
उस औरत का इलाज ग्यारह महीने चला। रोहित हर महीने उस घर के दरवाज़े पर पैसे रख आता था, लिफ़ाफ़े में, बिना नाम लिखे। पहले दो महीने लिफ़ाफ़ा बाहर ही पड़ा रहा। तीसरे महीने से घरवाले उसे उठाने लगे। उन्होंने कभी नहीं पूछा कि किसका है, और रोहित को लगता है कि वे जानते हैं।
अब रोहित हर नली पर, बेचने से पहले, काले मार्कर से तारीख़ बड़ी करके ऊपर लिख देता है, जहाँ ग्राहक को दिखे। इससे कुछ ग्राहक चले गए, क्योंकि पुरानी दिखने वाली चीज़ कोई नहीं ख़रीदता। पुराना माल वह अब लौटा देता है, आधे पैसे पर।
मोहल्ले में उसे ईमानदार नहीं कहा जाता। उसे थोड़ा सनकी कहा जाता है, क्योंकि वह ग्राहक को रोककर तारीख़ पढ़वाता है और इसमें वक़्त लगता है। दुकान अब भी आठ फ़ुट की है और पंखा वही लगा हुआ है।
उस घर के लोग उससे बात नहीं करते। औरत अब हाथ इस्तेमाल कर लेती है, ज़्यादातर कामों में। कभी-कभी वह गली से गुज़रती है और रोहित की दुकान के सामने से निकलती है। रोहित तब हाथ का काम रोक देता है और तब तक नहीं उठाता जब तक वह निकल न जाए।