ओमप्रकाश की दुकान सड़क के उस मोड़ पर थी जहाँ ट्रक धीमे होते थे। पंचर की दुकान थी। एक हवा भरने वाली मशीन, एक टब पानी का, रबर के टुकड़े, और एक बेंच जिस पर लोग इंतज़ार करते हुए बैठते थे। मोड़ की वजह से गाड़ियाँ रुकती थीं और रुकने की वजह से काम मिलता था। सत्रह बरस यही चला।
फिर बाइपास बना।
बाइपास की ख़बर दो बरस पहले से थी और सबने उसे अच्छी ख़बर की तरह लिया। सड़क बड़ी होगी, गाड़ियाँ तेज़ चलेंगी, गाँव तक बस आएगी। ओमप्रकाश ने भी यही सोचा। उसने यह नहीं सोचा कि जो गाड़ी तेज़ चलेगी, वह उसके मोड़ पर धीमी नहीं होगी।
बाइपास जेठ में खुला।
पहले हफ़्ते फ़र्क़ नहीं दिखा। दूसरे हफ़्ते दिखा। तीसरे हफ़्ते वह बेंच पर अकेला बैठा था।
पंचर की दुकान का हिसाब सीधा होता है। दिन में आठ-दस पंचर बनें तो घर चलता है। तीन बनें तो नहीं चलता। जुलाई में उसका औसत दो पर आ गया।
वह छह महीने बैठा रहा, क्योंकि दुकान बंद करने का मतलब है कि जो एक-दो गाड़ी आती भी है, वह भी न आए।
उन छह महीनों का दिन कुछ इस तरह जाता था। वह सुबह सात बजे दुकान खोलता, मशीन चालू करके देखता कि हवा बन रही है या नहीं, और फिर बैठ जाता। दोपहर में घर से खाना आ जाता। शाम को वह टब का पानी बदल देता, हालाँकि उसमें दिन भर में एक बार भी ट्यूब नहीं डूबी होती थी। पानी बदलना ज़रूरी नहीं था। वह इसलिए बदलता था कि दिन में कोई एक काम ऐसा हो जो पूरा हो जाए।
इन्हीं महीनों में लोग उसे वह बात कहने लगे। बुरा समय भी गुज़र जाता है।
बात ग़लत नहीं थी। कहने वाले भी बुरे नहीं थे। यह वही बात है जो एक आदमी दूसरे आदमी से तब कहता है जब उसके पास कहने के लिए और कुछ नहीं होता, और इसमें कोई बेईमानी नहीं है।
जाड़े तक कर्ज़ चढ़ गया।
पहला कर्ज़ रबर और सोल्यूशन का था, जो दुकानदार ने उधार दे दिया। दूसरा दो हज़ार का था, ब्याज पर। तीसरा उसके साले से लिया, जिसने ब्याज नहीं लिया और यह बात हर बार बातचीत में आती रही।
छोटे कर्ज़ की सबसे बुरी बात यह होती है कि वह छोटा लगता है। दो हज़ार पर महीने का ब्याज इतना ही होता है कि आदमी उसे चुका देता है और मूल वहीं का वहीं रहता है। ओमप्रकाश ने ग्यारह महीने ब्याज दिया और ग्यारहवें महीने जब उसने जोड़ा तो उसे यह दिखा कि वह अब तक इतना दे चुका है जितना उसने लिया था, और देना अब भी उतना ही बाक़ी है।
फ़ैसला फागुन में हुआ।
देवकी उस बरस आठवीं में थी। स्कूल क़स्बे में था और वहाँ तक जाने का किराया लगता था, और साल में एक बार फ़ीस लगती थी, और कॉपी-किताब अलग। यह सब मिलाकर महीने का जो ख़र्च बनता था, वह उन दिनों दुकान की महीने भर की कमाई के बराबर था।
ओमप्रकाश ने उसे एक साल के लिए बिठा लिया। एक साल के लिए।
उसने यह किसी ग़ुस्से या लापरवाही में नहीं किया। उसने बैठकर हिसाब लगाया था और हिसाब यही निकल रहा था। उसने देवकी से साफ़ कह भी दिया कि यह एक बरस की बात है और अगले बरस वह वापस जाएगी।
बुरा समय गुज़र भी गया।
अगले बरस बाइपास के उस तरफ़ एक छोटा कारख़ाना खुला, प्लास्टिक की बाल्टियों का, और उसमें दो सौ लोग लगे। कारख़ाने के मज़दूर साइकिल और मोटरसाइकिल से आते थे और उनका रास्ता ओमप्रकाश के मोड़ से होकर था। मोटरसाइकिल के टायर छोटे होते हैं और उनमें पंचर ज़्यादा होता है।
दो बरस में दुकान पहले से बेहतर चलने लगी। कर्ज़ उतर गया। साले का पैसा भी लौटा दिया गया।
वह जो एक साल था, वह लौटकर नहीं आया।
देवकी उस साल घर पर रही। घर पर रहने का मतलब घर पर बैठना नहीं होता। वह भैंस देखने लगी, खाना बनाने लगी, और छोटे भाई को तैयार करने लगी। एक बरस में यह सब उसका काम मान लिया गया।
उस बरस वह सुबह पाँच बजे उठने लगी, क्योंकि भैंस को पहले देखना पड़ता है। नौ बजे तक उसका आधा दिन निकल जाता था। दोपहर में उसे कुछ घंटे मिलते थे और शुरू के महीनों में वह उन घंटों में किताब खोलकर बैठती थी, बरामदे में, जहाँ रोशनी अच्छी आती है। जाड़ों तक यह छूट गया। किसी ने उससे किताब छीनी नहीं थी। बस दोपहर के वे घंटे धीरे-धीरे किसी और काम से भर गए, जैसे ख़ाली जगह भर जाती है।
अगले बरस जब उसे वापस भेजने की बात हुई, तो वह नौवीं में नहीं जा सकती थी। उसे आठवीं दोबारा करनी थी और उसकी उम्र की लड़कियाँ दसवीं में थीं। यह उसने ख़ुद कहा। उसने यह भी कहा कि उसे अब जाना नहीं है।
क्या उसे सचमुच नहीं जाना था, यह ओमप्रकाश ने कभी नहीं पूछा और अब पूछने का कोई तरीक़ा नहीं है।
सत्रह की उम्र में देवकी उसी कारख़ाने में लग गई जिसने उसके पिता की दुकान बचाई थी। बाल्टियों के हत्थे लगाने का काम। तनख़्वाह ठीक थी।
अब वह चौबीस की है और उसी कारख़ाने में है, उसी काम पर।
ओमप्रकाश की दुकान अब अच्छी चलती है। उसने मशीन बदल ली है और बेंच पर अब गद्दी लगी है। आठ-दस पंचर रोज़ के हो जाते हैं और गर्मियों में उससे भी ज़्यादा।
बाइपास का पुल उसकी दुकान के ऊपर से जाता है। दोपहर में उसकी छाँव सीधे दुकान पर पड़ती है और जेठ में लोग वहीं बैठना पसंद करते हैं। बेंच अब भरी रहती है। देवकी दिन में दो बार उसी छाँव के नीचे से गुज़रती है, सुबह जाते हुए और शाम लौटते हुए, और लौटते वक़्त वह अक्सर रुककर बैठ जाती है।