नीरज हर सुबह घर से निकलने से पहले माता-पिता के पैर छूता था। यह दिखावा नहीं था। घर में तीन कमरे थे, दो कमाने वाले, और खर्चा हमेशा आमदनी से थोड़ा ज़्यादा। नीरज पढ़ने में तेज़ था, और यही बात उसके पिता को सबसे ज़्यादा चिंता में डालती थी, क्योंकि तेज़ लड़के को पढ़ाना महँगा पड़ता है।
बारहवीं के बाद नीरज का दाख़िला शहर के इंजीनियरिंग कॉलेज में हो गया। यह ख़ुशी की ख़बर थी और घर में किसी ने ख़ुशी नहीं मनाई। फ़ीस का काग़ज़ पिता ने दो बार पढ़ा, फिर तीसरी बार पढ़ा, फिर तह करके जेब में रख लिया। माँ ने पूछा कि रहना कहाँ होगा, और उतना ही पूछा। उस रात नीरज ने दरवाज़े के पीछे से उन दोनों की बात सुनने की कोशिश की, पर वे बहुत धीरे बोल रहे थे।
जाने के दिन पिता उसे बस अड्डे तक छोड़ने आए। बस चलने से ठीक पहले उन्होंने जेब से एक लिफ़ाफ़ा निकालकर उसके हाथ में रख दिया। "पहले महीने का," उन्होंने कहा। "हॉस्टल का खाना ख़राब हो तो बाहर खा लेना।" नीरज ने वहाँ खोलकर नहीं देखा। बस चल दी तो उसने खोला। अंदर तीन हज़ार रुपये थे, सौ-सौ के नोटों में, और नोट पुराने थे।
माफ़ी की ताकत
हॉस्टल का खाना ख़राब था और नीरज ने पहले महीने बाहर एक बार भी नहीं खाया। उसने वे तीन हज़ार अलमारी में एक क़मीज़ के नीचे रख दिए और सिर्फ़ तब निकाले जब कोई किताब ख़रीदनी पड़ी। दूसरे महीने भी नहीं निकाले। यह कोई फ़ैसला नहीं था। बस उन नोटों को ख़र्च करने का मन नहीं करता था, और वजह उस वक़्त उसे भी ठीक से पता नहीं थी।
शहर आसान नहीं रहा। पढ़ाई ठीक चली, पर बाकी हर चीज़ में वह पीछे था। उसके कमरे के लड़कों के पास फ़ोन थे, जूते थे, और वे शनिवार को बाहर जाते थे। नीरज महीने में एक बार घर फ़ोन करता और हर बार कहता कि सब ठीक है। घर से भी हर बार यही जवाब आता। दोनों तरफ़ यही चलता रहा, चार साल।
तीसरे साल गर्मी की छुट्टी में वह घर आया तो देखा कि आँगन वाली दीवार की मरम्मत अब भी नहीं हुई है, जो पिछले साल भी नहीं हुई थी। उसने पूछा। पिता ने कहा कि इस साल बारिश कम होगी, दीवार निकल जाएगी। नीरज ने बात आगे नहीं बढ़ाई।
चौथे साल के आख़िर में उसे नौकरी मिल गई। पहली तनख़्वाह उसने पूरी की पूरी घर भेज दी। पिता ने फ़ोन पर कहा कि इसकी ज़रूरत नहीं थी। नीरज ने कहा कि उसे भेजनी है। उधर से कुछ देर कोई आवाज़ नहीं आई। फिर पिता ने कहा कि ठीक है, और फ़ोन रख दिया।
तीन साल बाद वह छुट्टी में घर आया। पड़ोस के शर्मा जी गली में मिल गए और बातों-बातों में बोले, "अब तो सब ठीक है न, बेटा? तुम्हारे पापा ने चौदह महीने में पूरा लौटा दिया था। एक-एक पैसा, बिना कहे।" नीरज ने पूछा कि किस चीज़ का। शर्मा जी को पहले लगा कि उसे पता है। फिर लगा कि शायद नहीं पता। उन्होंने बात बदल दी और आगे बढ़ गए।
बदलाव की शुरुआत
नीरज उस शाम घर में बैठा हिसाब लगाता रहा। तीन हज़ार रुपये उस वक़्त उनके घर के लिए क्या थे, यह उसे अब समझ आ रहा था। पिता की उस महीने की पूरी तनख़्वाह इससे थोड़ी ही ज़्यादा रही होगी। उसने माँ से नहीं पूछा। पूछने पर वे मना कर देतीं, और अगर मना न करतीं तो और बुरा होता।
उसे वह दिन याद आया। पिता बस अड्डे तक साथ आए थे और पूरे रास्ते कोई ख़ास बात नहीं की थी। लिफ़ाफ़ा उन्होंने आख़िरी वक़्त पर दिया था, जब बस चलने ही वाली थी, ताकि कोई सवाल पूछने का मौका न मिले। नीरज को अब यह भी समझ आ रहा था कि फ़ीस का वह तह किया हुआ काग़ज़ जेब में लेकर वे कहाँ-कहाँ गए होंगे, और शर्मा जी के घर तक पहुँचने से पहले उन्होंने कितने दरवाज़े खटखटाए होंगे।
रात के खाने पर पिता ने दफ़्तर की कोई बात बताई और माँ ने पड़ोस की। नीरज सुनता रहा। दो-तीन बार उसने बात छेड़ने की सोची और हर बार रुक गया, क्योंकि छेड़ने पर पिता कहते कि यह कोई बात ही नहीं थी, और वह बात सच नहीं होती।
अगली सुबह वह जल्दी उठ गया। पिता आँगन में चारपाई पर सो रहे थे और चादर आधी नीचे लटकी हुई थी। नीरज कुछ देर वहीं खड़ा रहा। फिर वह झुका और उसने उनके पैर छू लिए, वैसे ही जैसे बचपन से हर सुबह छूता आया था। पिता नहीं जागे। नीरज सीधा हुआ, चादर ठीक की, और अंदर चला गया।