गाँव के बुज़ुर्ग उस गुफा का नाम नहीं लेते थे। वे 'उधर' कहते थे और बात बदल देते थे। वीर ने बचपन से यही देखा था। जंगल के उस पार, बहुत भीतर, एक गुफा थी जिसमें जाने वाले लौटते नहीं थे। कितने गए, यह किसी को याद नहीं। बस इतना सबको पता था कि गए ज़रूर थे। वीर के लिए यह चेतावनी नहीं थी। यह एक सवाल था, जिसका जवाब किसी के पास नहीं था।
वीर को इस गुफा के रहस्य में बहुत रुचि थी। वह जानता था कि यह एक खतरनाक यात्रा हो सकती है, लेकिन उसे विश्वास था कि वह अपनी साहसिक यात्रा में सफल होगा। गाँव के बुजुर्गों ने उसे चेतावनी दी थी, लेकिन वीर का मन जानने की लालसा से भरा हुआ था। एक दिन उसने गाँव के बुजुर्गों से गुफा के बारे में और जानकारी प्राप्त की और उसी दिन से वह अपनी यात्रा पर निकल पड़ा। उसकी आँखों में उम्मीद और दिल में साहस था।
वीर जंगल की ओर बढ़ा। पेड़ इतने घने थे कि दोपहर में भी नीचे अँधेरा रहता। गिरी हुई डालें, काँटे, और ऐसी आवाज़ें जिनका नाम उसे नहीं आता था। दिन में वह चलता रहता, और रात में किसी पेड़ की जड़ से पीठ टिकाकर बैठ जाता। नींद पूरी नहीं होती थी। तीसरे दिन उसका पानी ख़त्म हो गया और उसे एक नाले तक उतरना पड़ा, जिसका पानी भूरा था। पाँचवें दिन ढलान पर उसे वह काली दरार दिखी जिसका नाम लेकर गाँव में कोई बात नहीं करता था। वह पहुँच गया था।
सफर का नया मोड़
गुफा का मुँह चौड़ा था। अंदर से हल्की रोशनी आ रही थी, और यह अजीब बात थी, क्योंकि सूरज उसकी पीठ पीछे था। वीर ने मशाल जलाई और भीतर क़दम रखा। हवा ठंडी थी। उसमें गीली मिट्टी और किसी पुरानी राख की गंध थी। दीवारों पर कुछ लिखा हुआ था, किसी ऐसी भाषा में जो उसने पहले कभी नहीं देखी। अक्षर उभरे हुए थे और छूने पर ठंडे लगते थे। वीर ने उन पर उँगली फेरी। कोई बहुत पहले यहाँ बैठकर यह लिखता रहा होगा, घंटों, शायद बरसों।
कुछ समय बाद, वीर ने देखा कि गुफा में एक चमत्कारी पत्थर रखा हुआ था। पत्थर के ऊपर एक दरवाजा था, जो किसी रहस्यमय शक्ति से बंद था। वीर ने पत्थर को छूने की कोशिश की, और अचानक गुफा में एक तेज़ गूंजने वाली आवाज़ आई। फिर उस दरवाजे के सामने एक पंक्ति लिखी हुई दिखाई दी, "जो अपनी आस्था से यात्रा करता है, वही इस दरवाजे को खोल सकता है।" वीर ने उन शब्दों को ध्यान से पढ़ा और तुरंत यह समझा कि यह यात्रा केवल शारीरिक साहस से नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक विश्वास से भी जुड़ी थी।
वीर ने ध्यान से उन शब्दों को पढ़ा और समझा कि इस दरवाजे को खोलने के लिए केवल आस्था की जरूरत है। आस्था का मतलब था पूरी तरह से विश्वास करना, बिना किसी संकोच के। उसने अपनी पूरी आस्था के साथ उस दरवाजे को छुआ और देखते ही देखते दरवाजा खुल गया। दरवाजे के अंदर एक अद्भुत दुनिया थी, जहाँ की हवा भी ताजगी से भरी हुई थी। वहाँ एक तालाब था, जिसमें नीले रंग का पानी था और चारों ओर हरे-भरे पेड़ थे। यह जगह बिल्कुल अलग और जादुई सी लग रही थी, जैसे यह किसी और दुनिया से आती हो।
तालाब का पानी नीला था और इतना साफ़ कि तल दिख रहा था। वीर किनारे पर बैठ गया। उसने पानी में अपनी परछाईं देखी, और उसके नीचे कुछ और भी। एक घड़ा था, मिट्टी का, आधा गाद में धँसा हुआ। उसने हाथ डालकर उसे निकाला। ढक्कन नहीं था। भीतर पानी भरा था और उसी में एक पत्थर पड़ा था, अंगूठे जितना, जो मशाल की रोशनी में हरा दिखता था। वीर ने उसे हथेली पर रखकर बहुत देर देखा। घड़ा किसी ने रखा था। यही बात उसे सबसे अजीब लगी।
वीर ने रत्न को कपड़े में लपेटकर जेब में रखा और गुफा से बाहर निकल आया। लौटने में उसे चार दिन लगे। गाँव में सबसे पहले जो सवाल पूछा गया, वह रत्न के बारे में नहीं था। सबसे बूढ़े आदमी ने, जो बरसों से 'उधर' कहकर बात बदल देता था, बस यह पूछा कि उसे अंदर कोई मिला या नहीं। हड्डियाँ, कपड़े, कुछ भी। वीर ने कहा कि कुछ नहीं मिला। गुफा ख़ाली थी, तालाब साफ़ था, और वहाँ किसी के कभी होने का कोई निशान नहीं था। बूढ़ा आदमी उसे देखता रहा, फिर उठकर चला गया। वीर उस रात देर तक जागता रहा। जो लोग गए थे, वे गुफा तक पहुँचे ही नहीं थे। जंगल ने उन्हें पहले ही रख लिया था, और गुफा बरसों से उस बात का इल्ज़ाम अपने सिर लेती आ रही थी। अब गाँव के बच्चे वीर से पूछते हैं कि उधर क्या है। वीर बात बदल देता है।