बंदरगाह के मछुआरे पश्चिम की तरफ़ जाल नहीं डालते थे। उधर, जहाँ पानी गहरा होता है, एक द्वीप था। नक्शों में वह कभी नहीं आया। बातों में हमेशा रहा। जो उधर गए, वे लौटे नहीं। अमरजीत ने यह कहानी पहली बार आठ साल की उम्र में सुनी थी, और तब से हर साल एक बार ज़रूर सुनी। हर बार कहने वाला बदल जाता था। कहानी वही रहती थी।

अमरजीत मछुआरा नहीं था। वह नाव के इंजन ठीक करता था, कच्छ की उस खाड़ी में जहाँ पानी दिन में दो बार पूरा बदल जाता है। इंजन ठीक करने वाले को ज्वार का हिसाब मछुआरे से ज़्यादा रखना पड़ता है, क्योंकि जो नाव कीचड़ में बैठ गई, उसे बारह घंटे तक कोई नहीं हिला सकता।

उसके पास एक चीज़ थी जो और किसी के पास नहीं थी। एक पुराना ज्वार-पत्रक, बंदरगाह के दफ़्तर से फेंका हुआ, जिसमें साल भर के पानी चढ़ने और उतरने के वक़्त छपे थे। उसने उस पर पश्चिम वाले हिस्से की तारीख़ें गोल कर रखी थीं। तीन साल में सिर्फ़ ग्यारह दिन ऐसे निकले जब सुबह का पानी इतना उतरता कि उधर जाया जा सके।

अठारह मार्च उन ग्यारह में से एक था। उस दिन पानी तड़के चार बजे सबसे नीचे होता और साढ़े नौ बजे लौटना शुरू करता। यानी रास्ता साढ़े पाँच घंटे खुला रहता। अमरजीत ने किसी को नहीं बताया, इसलिए नहीं कि छिपाना था, बल्कि इसलिए कि बताने पर उसे रोका जाता।

वह अकेला गया, छोटी नाव में, और जहाँ पानी घुटनों तक रह गया वहाँ से नाव खींचकर चला। कीचड़ काला था और पैर आधी पिंडली तक धँसता था। नक़्शे पर वह फ़ासला तीन किलोमीटर था। तय करने में दो घंटे लगे।

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द्वीप था। नक़्शे में न होने की वजह भी वहीं दिख गई। वह ठोस ज़मीन नहीं थी, दबा हुआ रेत का टीला था, जो हर बरसात में अपनी जगह थोड़ी बदल लेता है। उस पर घास थी, कुछ झाड़ियाँ, और पक्षी इतने कि आवाज़ से कान भर गए।

उसने द्वीप पर सत्रह मिनट बिताए, जो उसने घड़ी देखकर गिने। घास कमर तक थी और उसमें चलने पर पैर के नीचे कुछ चटकता था, सीपियाँ या हड्डियाँ, उसने झुककर नहीं देखा। पक्षी उसके चलने से उड़ते और फिर उसी जगह बैठ जाते। उन्हें आदमी की आदत नहीं थी।

और एक नाव थी। पुरानी, उलटी पड़ी हुई, लकड़ी की, जिसका पेंदा घिस चुका था। उसके आगे दो और थीं, आधी रेत में दबी। अमरजीत ने उन्हें गिना, और तब उसे वह बात समझ आई जो बंदरगाह में तीस साल से कहानी बनकर घूम रही थी।

जो उधर आए वे लौट नहीं पाए, और इसकी वजह कोई भूत नहीं था। वजह पानी था। जो आदमी सुबह पहुँचा और द्वीप देखकर रुक गया, उसके लिए साढ़े नौ बजे के बाद रास्ता ख़त्म हो जाता है। कीचड़ पानी में बदल जाता है, नाव के नीचे ज़मीन नहीं रहती, और तैरकर तीन किलोमीटर कोई नहीं जाता।

अमरजीत की घड़ी में सवा आठ थे। लौटने में दो घंटे लगते। यानी चलना उसी वक़्त था। और तभी उसने उस उलटी नाव के नीचे कुछ देखा।

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नाव के नीचे टीन का एक डिब्बा था। भीतर कपड़े में लिपटे काग़ज़ थे और काग़ज़ों पर नाम। किसी ने वहाँ बैठकर लिखा था। अमरजीत ने डिब्बा उठाया, और उठाते ही यह भी समझ लिया कि अब वह उतनी रफ़्तार से कीचड़ में नहीं चल सकेगा।

वह साढ़े नौ के बाद तक कीचड़ में था। पानी पीछे से आता है और उसकी आवाज़ पहले पहुँचती है। आख़िरी आठ सौ क़दम उसने नाव छोड़कर तय किए, डिब्बा सिर पर रखकर। पक्की ज़मीन पर पैर पड़ा तब पानी कमर तक आ चुका था।

नाव उसे नहीं मिली। वह उसके मामा की थी और उसकी क़ीमत अमरजीत ने चार साल में चुकाई, हर महीने थोड़ा-थोड़ा। मामा ने कभी माँगा नहीं और अमरजीत ने कभी छोड़ा नहीं।

बंदरगाह लौटकर उसने तीन दिन यह बात अपने पास रखी। तीसरे दिन मामा ने नाव के बारे में पूछा और अमरजीत ने पूरी बात बता दी, शुरू से आख़िर तक। मामा ने सुनी और इतना कहा कि वह उधर दोबारा न जाए। यह मना करना नहीं था, हिसाब था। मामा के पास दूसरी नाव नहीं थी।

काग़ज़ों में तीन नाम थे और एक तारीख़, उन्नीस सौ बयासी की। अमरजीत ने वे काग़ज़ बंदरगाह के दफ़्तर में जमा किए और दफ़्तर वालों ने रसीद दे दी। एक परिवार तक ख़बर पहुँची। उस परिवार में तब तक सिर्फ़ एक बूढ़ी औरत बची थी।

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मछुआरे अब भी पश्चिम की तरफ़ जाल नहीं डालते। अमरजीत ने उन्हें ज्वार-पत्रक दिखाया, गोल की हुई तारीख़ें दिखाईं, और वह जगह बताई जहाँ ज़मीन ठोस है। उन्होंने सुना और सिर हिलाया। अगले बरस कहानी वैसी की वैसी सुनाई जा रही थी। बस उसमें एक नाव और जुड़ गई थी।