नदी की आवाज़ गाँव तक पहुँचती थी। बरसात के बाद वह इतनी तेज़ हो जाती कि रात में बात करने के लिए आवाज़ ऊँची करनी पड़ती। अनिल और सुमित उसी शोर के बीच बड़े हुए थे, शायद इसीलिए उससे डरना कभी सीख नहीं पाए। गाँव में उस नदी को लेकर तरह-तरह की बातें थीं। कोई कहता उसकी धारा में उतरा आदमी लौटता नहीं। कोई कहता आगे का रास्ता किसी ने देखा ही नहीं। पार करने की कोशिश किसी ने नहीं की थी। उस साल, बरसात उतरने के बाद, दोनों ने तय किया कि वे करेंगे।
“क्या तुझे लगता है हम इसे पार कर पाएंगे?” सुमित ने अनिल से पूछा, जब उन्होंने नदी के किनारे खड़े होकर उसकी तेज़ धारा को देखा। नदी का पानी गहरी आवाज के साथ बह रहा था, और उसकी धारा हर एक कदम को चुनौती दे रही थी।
“अगर हम सही तरीके से योजना बनाते हैं, तो हम इसे जरूर पार कर सकते हैं। हमें बस साहस और एक-दूसरे का साथ चाहिए,” अनिल ने उत्साह से कहा। उसने नदी की धारा को देखते हुए अपनी योजनाओं के बारे में सुमित को समझाया, और दोनों ने एक साथ इसे पार करने का दृढ़ निश्चय किया।
हिम्मत का इम्तिहान
दोनों ने अपनी यात्रा की तैयारी की, रस्सी, नाव, और बाकी जरूरी सामान साथ लिया और नदी की ओर बढ़े। जैसे ही वे नदी के पास पहुँचे, उन्होंने देखा कि नदी की धारा बहुत तेज़ थी और कई जगहों पर बड़े-बड़े पत्थर पानी के बीच में अटककर रास्ते को और भी खतरनाक बना रहे थे। रास्ता इतना खतरनाक था कि कई लोग पहले इस नदी को पार करने की सोच भी नहीं सकते थे।
“यह तो बहुत मुश्किल होगा,” सुमित ने कहा, लेकिन अनिल ने दृढ़ता से कहा, “हमें बस धैर्य रखना होगा और एक-दूसरे की मदद करनी होगी।” दोनों ने एक-दूसरे के साहस को बढ़ाया और यह ठान लिया कि कोई भी कठिनाई उन्हें अपने लक्ष्य से रोक नहीं सकती।
नाव पानी में उतरी और तुरंत बह चली। धारा ने उसे सीधा नहीं जाने दिया। अनिल पीछे बैठा चप्पू से दिशा सँभालता रहा और सुमित आगे से पत्थर देखता रहा, चिल्लाकर बताता हुआ, दाएँ, और दाएँ, अब सीधा। पानी ठंडा था। दो बार नाव इतनी झुकी कि किनारा पानी छूने लगा। दोनों ने वज़न दूसरी तरफ़ डाला और वह सीधी हो गई। बात करने का वक़्त नहीं था। एक घंटे में वे बीच धार तक पहुँचे, जहाँ शोर इतना था कि अपनी आवाज़ भी सुनाई नहीं देती।
फिर नाव एक पत्थर से जा लगी और वहीं फँस गई। पानी उसे एक तरफ़ से दबा रहा था। अनिल ने रस्सी पत्थर के ऊपरी सिरे पर फँसाई और खींचकर तानी। सुमित पानी में उतरा, कमर तक, और कंधा लगाकर नाव को धकेला। पहली बार कुछ नहीं हुआ। दूसरी बार भी नहीं। तीसरी बार नाव सरकी, और सरकते ही धारा ने उसे इतनी तेज़ी से खींचा कि सुमित का हाथ छूट गया। अनिल ने उसका कुरता पकड़कर उसे ऊपर घसीट लिया। कुछ देर दोनों नाव के फ़र्श पर पड़े रहे।
कुछ देर बाद, नदी के किनारे एक छोटा सा द्वीप आया, जहां कुछ राहत मिली। लेकिन जल्द ही दोनों को यह अहसास हुआ कि द्वीप केवल एक अस्थायी आराम था, असली चुनौती अभी बाकी थी। दोनों ने पानी को और चुनौतीपूर्ण रूप से देखा, और एक-दूसरे को विश्वास दिलाया कि अगर वे एक-दूसरे का समर्थन करते रहेंगे, तो वे किसी भी मुश्किल को पार कर सकते हैं।
सबसे कठिन हिस्सा
दोपहर ढलते-ढलते नाव दूसरे किनारे की रेत से टकराई। दोनों कुछ देर वहीं पड़े रहे, हाँफते हुए, हथेलियों पर रस्सी के निशान लिए। फिर वे उठकर ऊपर चढ़े। सामने वही जंगल था। वही साल के पेड़, वही झाड़, वही ढलान। गाँव में जो बातें होती थीं, उनके हिसाब से दूसरे किनारे पर कुछ और होना चाहिए था। कुछ नहीं था। सुमित हँसने लगा, फिर चुप हो गया। अनिल आगे बढ़कर एक जगह रुक गया, जहाँ ज़मीन थोड़ी दबी हुई थी।
वहाँ पत्थरों का एक गोल घेरा था और उसके बीच राख, बरसों पुरानी, मिट्टी में दबी हुई। पास ही एक टिन का डिब्बा पड़ा था, जंग खाया हुआ, जिसका ढक्कन नहीं था। कोई यहाँ आया था। शायद एक बार, शायद कई बार। और लौटकर उसने गाँव में किसी को नहीं बताया था। अनिल ने डिब्बा उठाया, उलटकर देखा, फिर वहीं रख दिया। दोनों उसी शाम लौट पड़े, क्योंकि अँधेरे में धारा और तेज़ हो जाती है। गाँव में लोगों ने पूछा कि पार क्या है। सुमित ने कहा, जंगल। बस जंगल। किसी ने आगे कुछ नहीं पूछा। वह डिब्बा अब भी वहीं पड़ा है, और अनिल कभी-कभी सोचता है कि जिसने उसे छोड़ा था, उससे भी गाँव ने यही सवाल पूछा होगा।