सूरज को जंगल के किनारे बैठना अच्छा लगता था। वहाँ सिर्फ़ दो आवाज़ें होती थीं: चिड़ियों की और पत्तों की। गाँव का शोर वहाँ तक नहीं आता था। वह अक्सर दोपहर में जाता और शाम को लौटता, और किसी को यह अजीब नहीं लगता था। फिर एक दिन उसने एक बूढ़े शिकारी से एक बात सुनी। जंगल के भीतर, बहुत भीतर, एक जगह है जहाँ वक़्त वैसे नहीं चलता जैसे यहाँ चलता है। उसके बाद सूरज किनारे पर बैठकर भीतर की तरफ़ देखने लगा।
सूरज की जिज्ञासा और साहस उसे उस खोई हुई दुनिया को खोजने के लिए प्रेरित करते गए। गाँव में लोग कहते थे कि जंगल के भीतर एक अदृश्य शक्ति छिपी है, जो हर किसी को अपनी ओर खींचती है। सूरज ने ठान लिया कि वह उस खोई हुई दुनिया की तलाश में निकलेगा। वह अपने सपने को पूरा करने के लिए हर मुश्किल से जूझने के लिए तैयार था। उसने अपनी यात्रा की तैयारी की और जंगल के अंदर गहरे तक जाने का फैसला किया। सूरज ने अपनी मशाल, कुछ ज़रूरी सामान और पानी की बोतल साथ ली और जंगल की ओर चल पड़ा।
जंगल के भीतर घुसते ही आवाज़ें बदल गईं। बाहर चिड़ियाँ थीं। यहाँ कुछ और था, जिसका नाम सूरज को नहीं आता था। पेड़ इतने पास पास थे कि रास्ता हर दस क़दम पर ग़ायब हो जाता। उसने मशाल जलाई, हालाँकि अभी दिन ही था। दो बार उसे लगा कि कोई उसके साथ चल रहा है, और दोनों बार मुड़कर देखने पर कुछ नहीं मिला। वह रुका नहीं। लौटने का रास्ता उसने पेड़ों पर चाकू से निशान बनाकर रखा था, और वह हर निशान गिनता जा रहा था।
जब मौसम बदला
फिर हवा बदली। सूरज को पहले लगा कि यह उसका वहम है, पर पत्ते सचमुच रुक गए थे। कोई आवाज़ नहीं। न चिड़िया, न कीड़ा, न पत्ता। वह खड़ा रहा और अपनी ही साँस सुनता रहा। आगे ढलान थी, और उसके नीचे रोशनी अलग थी, जैसे वहाँ दिन का कोई और पहर चल रहा हो। सूरज उतरा। नीचे पेड़ों के पत्ते हरे नहीं थे। कुछ लाल थे, कुछ सुनहरे, और इस मौसम में वे वैसे नहीं होने चाहिए थे।
उस जगह सूरज ने देखा कि हर दिशा में जानवर घूम रहे थे। वे आम जंगल के जानवरों से अलग थे। उनकी आँखों में एक गहरी चमक थी, और वे सूरज को देखकर भागते नहीं थे। एक हिरन उसके पास आकर खड़ा हो गया, इतना पास कि सूरज उसकी साँस सुन सकता था। फिर वह मुड़कर चला गया। कहीं कोई डर नहीं था, न उनमें, न उसमें। सूरज बहुत देर वहीं खड़ा रहा और उसे लगा जैसे वह किसी और ही दुनिया में आ गया हो।
सूरज की आँखें अब इस नए वातावरण में और गहरी डुबकी लगाने लगीं। वह इस रहस्यमयी दुनिया में खो जाने का मन बना चुका था, लेकिन तभी एक अद्भुत आवाज ने उसे चेतावनी दी। "यह दुनिया तुम्हारे साथ नहीं है," आवाज ने कहा। सूरज ने देखा कि एक प्राचीन वृक्ष के नीचे एक बुजुर्ग महिला खड़ी थी, जिनके चेहरे पर एक अजीब सी शांति और ज्ञान की झलक थी। महिला ने सूरज से कहा, "तुमने जिस दुनिया की खोज की है, वह किसी और के लिए नहीं है। यह जगह उन लोगों के लिए है, जो अपने दिल और दिमाग में शांति और संतुलन रखते हैं।"
महिला ने सूरज से कहा, "यह जगह तुम्हारी यात्रा के अंतिम पड़ाव के रूप में नहीं है, बल्कि यह तुम्हारे भीतर की यात्रा का एक हिस्सा है।" सूरज ने महसूस किया कि यह खोई हुई दुनिया असल में बाहरी दुनिया की नहीं, बल्कि उसके भीतर के गहरे अनुभवों और सोच का प्रतीक थी। महिला ने सूरज को एक पत्थर दिया और कहा, "यह पत्थर तुम्हारी आत्मा का प्रतीक है। जब भी तुम अपनी यात्रा के मार्ग में उलझन महसूस करो, इसे देखना और यह याद रखना कि असली खोई हुई दुनिया तुम्हारे भीतर है।"
सूरज ने पत्थर जेब में रखा और लौटने लगा। बाहर निकलने में उसे उतना वक़्त नहीं लगा जितना भीतर जाने में लगा था, और यह बात उसे बाद में बहुत दिनों तक खटकती रही। गाँव पहुँचकर उसने किसी को कुछ नहीं बताया। बताता भी तो क्या। अगली बार वह मशाल, रस्सी और तीन दिन का खाना लेकर गया। उसे वह जगह नहीं मिली। अगले बरस भी नहीं मिली। वह उसी दिशा में जाता, उसी ढलान से उतरता, उसी सूखे नाले को पार करता, और आगे बस जंगल होता। वह बूढ़ा शिकारी, जिससे उसने पहली बार यह बात सुनी थी, उसी जाड़े में गुज़र गया, इसलिए अब पूछने को भी कोई नहीं बचा। पत्थर आज भी उसके पास है। वह एक साधारण भूरा पत्थर है जिसके एक तरफ़ हल्की सी दरार है। सूरज अब भी दोपहर में जंगल के किनारे जाकर बैठता है। चिड़ियाँ, पत्ते, और वही चुप्पी। फ़र्क़ इतना है कि अब वह भीतर की तरफ़ नहीं देखता।