साइकिल आरव के बाप की थी, हरे रंग की, और उसका पिछला ब्रेक काम नहीं करता था। धमतरी ज़िले के उस गाँव से रायपुर चौहत्तर किलोमीटर है। बस सुबह छह बजे एक ही जाती थी। जिस दिन प्रदेश की दौड़ का चुनाव था, उस दिन बस नहीं चली, क्योंकि ड्राइवर की लड़की की शादी थी।
चुनाव सुबह आठ बजे शुरू होना था और नाम आठ बजे ही पुकारे जाते हैं। एक बार नाम कट गया तो अगला मौक़ा अगले साल। आरव सत्रह का था और यह उसका दूसरा साल था। पहली बार भी वह पहुँच नहीं पाया था, उसी बस की वजह से।
उसका सबसे अच्छा समय दो मिनट सात सेकंड था, जो स्कूल के मैदान पर लिया गया था, जहाँ ट्रैक की नाप कभी ठीक से हुई ही नहीं। कोच नहीं था। जो मास्टर घड़ी पकड़ते थे वे विज्ञान पढ़ाते थे और दौड़ के बारे में उतना ही जानते थे जितना आरव जानता था। फिर भी दो मिनट सात सेकंड ज़िले में किसी और का नहीं था।
रात के ग्यारह बजे उसने साइकिल निकाली। रास्ता उसे मालूम था, कम से कम काग़ज़ पर। धमतरी तक सड़क ठीक है। उसके आगे सिहावा की तरफ़ वाला हिस्सा जंगल से होकर जाता है, सीतानदी वाला, और उस हिस्से में रात को गाड़ियाँ रुकती नहीं।
उस जंगल में हाथी रहते हैं। यह कोई कहानी नहीं है। वन विभाग के बोर्ड लगे हुए हैं और उन पर तारीख़ें लिखी रहती हैं। हाथी रात में चलते हैं और सड़क पर आ जाते हैं, क्योंकि सड़क उनके रास्ते के बीच से निकाली गई है।
पहले तीस किलोमीटर आसान थे। सड़क सपाट थी और हवा पीछे से थी। आरव ने हिसाब लगाया कि इसी रफ़्तार से वह चार बजे तक पहुँच जाएगा। हिसाब में उसने चढ़ाई नहीं जोड़ी थी।
धमतरी में उसने एक ढाबे के नल से पानी पिया और दस मिनट बैठा। ढाबे वाले ने पूछा कि इतनी रात कहाँ। आरव ने रायपुर कहा। ढाबे वाले ने कहा कि आगे जंगल है और इस वक़्त उधर कोई नहीं जाता, फिर उसने बिना पूछे चाय बना दी और पैसे नहीं लिए।
जंगल एक बजे शुरू हुआ। वहाँ का अँधेरा दूसरी तरह का होता है, ऊपर से भी बंद। आरव ने टॉर्च नहीं जलाई। टॉर्च से आदमी दिख जाता है, यह उसे किसी ने बताया था और उसने मान लिया था।
बाईस किलोमीटर वाले पत्थर के पास उसे आवाज़ सुनाई दी। पेड़ टूटने की नहीं। साँस की। दाईं तरफ़, सड़क से थोड़ा भीतर। आरव ने पैडल मारना बंद कर दिया और साइकिल को अपने आप चलने दिया, और चलने देता रहा, जब तक ढाल ख़त्म नहीं हुई।
फिर सड़क चढ़ने लगी और चढ़ाई पर साइकिल अपने आप नहीं चलती। उसे पैडल मारना पड़ा। चेन की आवाज़ उस रात की सबसे तेज़ आवाज़ थी। पीछे से कुछ नहीं आया। यह उसे तब मालूम हुआ जब वह जंगल पार कर चुका था, क्योंकि पीछे उसने एक बार भी नहीं देखा।
रायपुर वह सवा सात बजे पहुँचा। पैर काँप रहे थे और पानी उसने आख़िरी बार धमतरी में पिया था। मैदान पर उसने नाम लिखवाया, नंबर लिया, और घास पर लेट गया।
दौड़ आठ बजकर चालीस मिनट पर हुई। आठ सौ मीटर। आरव ने पहले दो सौ मीटर अच्छे दौड़े और उसके बाद उसकी जाँघें जवाब दे गईं। वह आठ में छठा आया। उसका समय उसके अपने सबसे अच्छे समय से ग्यारह सेकंड ख़राब था।
मैदान से निकलते वक़्त एक अधिकारी ने पूछा कि वह कहाँ से आया है। आरव ने गाँव का नाम बताया। अधिकारी ने पूछा कि किस गाड़ी से आया। आरव ने कहा कि साइकिल से। अधिकारी ने सुना, सिर हिलाया, और अगले लड़के का नाम पुकार दिया। यह बात कहीं दर्ज नहीं हुई और आरव ने भी इसे किसी को नहीं बताया।
चुनाव में पहले तीन जाते हैं। लौटते वक़्त उसने साइकिल बस की छत पर बँधवाई और ख़ुद भीतर बैठा। किराया उसके पास नहीं था। कंडक्टर ने उसे यह देखकर बिठा लिया कि लड़का बैठ भी ठीक से नहीं पा रहा।
बाप ने साइकिल देखी। पिछला पहिया टेढ़ा था। उसने इतना ही पूछा कि कहाँ तक गया था, और आरव ने कहा कि रायपुर तक। अगले दिन बाप ने पहिया ख़ुद सीधा कर दिया और ब्रेक भी कस दिया, जो बारह साल से ढीला था।
अगले साल बस चली और आरव उसी से गया, और चुना गया, और ज़िले की तरफ़ से खेलने लगा। जंगल वाली रात का ज़िक्र उसने किसी से नहीं किया, कोच से भी नहीं। बाईस किलोमीटर वाले पत्थर के पास अब भी वही बोर्ड लगा है, और उस पर तारीख़ें हर साल बदल दी जाती हैं।