भेड़ें गिनने का सही वक़्त शाम होता है, जब वे अपने आप एक जगह जुट जाती हैं। उस शाम तेक सिंह ने दो सौ चार गिनीं। ऊपर वाली चरागाह में घास ख़त्म हो चुकी थी और सांगला की तरफ़ उतरने का एक ही रास्ता था, दर्रे से होकर। दर्रा हर साल कातिक में बंद हो जाता है। इस बार बर्फ़ जल्दी आ गई थी।
उसके साथ एक छोकरा था, चौदह साल का, उसकी बहन का लड़का, जिसका नाम भी तेक था। इसीलिए सब उसे छोटा कहते थे। दोनों को दर्रे तक दो दिन चलना था, फिर उतार, फिर चितकुल के नीचे वाला पड़ाव। गद्दी लोग यह रास्ता तीन पीढ़ियों से लेते आए थे। रास्ता कहीं लिखा नहीं था। वह याद में था।
पिछले बरस वे कातिक की पहली तारीख़ को उतर गए थे। तब भी दो भेड़ें कम पड़ी थीं। इस बार देर इसलिए हुई कि ऊपर वाली चरागाह में घास अच्छी थी और तेक सिंह ने चार दिन और रुकने का फ़ैसला किया। चार दिन में भेड़ का वज़न बढ़ता है और वज़न पर ही दाम मिलता है। यह फ़ैसला उसने अकेले लिया था, और यह बात उसे बाद में बहुत बार याद आई।
अनजानी राह की ओर
दूसरे दिन दोपहर बाद हवा बदली। पहले उसकी दिशा बदली, फिर आवाज़। तेक सिंह ने ऊपर देखा और चलने की रफ़्तार बढ़ा दी। भेड़ें रफ़्तार नहीं समझतीं। वे उतना ही चलती हैं जितना आगे वाली चलती है।
शाम को उन्होंने एक चट्टान की आड़ में रात काटी। तेक सिंह सोया नहीं। वह हर घंटे बाहर निकलकर बर्फ़ की मोटाई देखता रहा, अँगूठे से नापकर। रात भर में वह तीन उँगली बढ़ी।
तूफ़ान दर्रे से एक घंटा पहले आया। बर्फ़ सीधी नहीं गिरती। वह बग़ल से आती है। आँख खोलना मुश्किल हो जाता है। तेक सिंह ने छोटे को अपने आगे कर लिया, ताकि वह उसे देखता रहे। रस्सी उसके पास एक ही थी।
दर्रे से पहले एक जगह रास्ता एक आदमी भर चौड़ा रह जाता है, बाईं तरफ़ चट्टान। दाईं तरफ़ कुछ नहीं। गर्मियों में वहाँ से भेड़ें एक क़तार में निकल जाती हैं। बर्फ़ में क़तार नहीं बनती। भेड़ें डरकर एक-दूसरे से चिपक जाती हैं और गोल घूमने लगती हैं, और गोल घूमती भेड़ें किनारे की तरफ़ बढ़ती हैं।
उसने बीस-बीस के झुंड बनाकर निकालना शुरू किया। छोटा उस पार खड़ा होकर सीटी बजाता रहा, ताकि भेड़ें आवाज़ की तरफ़ चलें। पहले चार झुंड निकल गए। पाँचवें में एक भेड़ बैठ गई। पीछे वाली सब रुक गईं।
नदी पार करनी थी
बर्फ़ में बैठी हुई भेड़ दोबारा नहीं उठती। तेक सिंह ने उसे उठाने की कोशिश की, फिर कंधे पर डाला और पार किया, और लौटा। ऐसा उसने तीन बार किया। तीसरी बार लौटते वक़्त उसे अपने दाहिने हाथ की उँगलियाँ महसूस होनी बंद हो गईं।
चौथी बार वह नहीं जा सका। हाथ काम नहीं कर रहे थे। रस्सी पकड़ने के लिए मुट्ठी बंद करनी पड़ती है। उसने छोटे को इशारा किया कि वह न आए। छोटा फिर भी दो क़दम आगे बढ़ा, और तेक सिंह पहली बार उस पर चिल्लाया, पूरे सफ़र में पहली बार।
उस तरफ़ अभी अड़तालीस बची थीं और उनमें ज़्यादातर इस साल के मेमने वाली थीं, कमज़ोर, और वही सबसे पीछे रह जाती हैं। अँधेरा होने में एक घंटा था। अँधेरे में उस जगह से कोई नहीं निकलता।
तेक सिंह ने छोटे से कहा कि वह आगे चले और पीछे मुड़कर न देखे। छोटे ने पूछा कि बाक़ी भेड़ों का क्या होगा। तेक सिंह ने उसकी बाँह पकड़ी और उसे आगे धकेल दिया।
उतार पर बर्फ़ कम थी पर पैर धँसता था। दोनों रात भर चले। छोटा दो बार गिरा और दूसरी बार रोया, और तेक सिंह ने उसे रोने दिया, क्योंकि रोने से आदमी जागता रहता है।
चितकुल के नीचे वाले पड़ाव पर वे सुबह पहुँचे। एक सौ छप्पन भेड़ें साथ थीं। पड़ाव पर बैठे लोगों ने गिनती पूछी और तेक सिंह ने बता दी। इसके आगे किसी ने कुछ नहीं पूछा, क्योंकि वहाँ बैठे हर आदमी ने कभी न कभी वैसी ही गिनती बताई थी।
उसके दाहिने हाथ की दो उँगलियाँ काली पड़ गईं। रामपुर के अस्पताल में वे काट दी गईं। ऊन कतरने के लिए दो उँगलियाँ चाहिए ही होती हैं। अब वह कैंची बाएँ हाथ से चलाता है, धीरे, और एक भेड़ में उतना वक़्त लगाता है जितने में पहले तीन हो जाती थीं।
अगले जेठ में वह फिर ऊपर गया। उस जगह पर हड्डियाँ बिखरी थीं, बर्फ़ हटने के बाद जितनी बचती हैं उतनी। उसने गिनने की कोशिश की और बीच में छोड़ दी। छोटा अब उसके साथ ऊपर नहीं जाता। वह शिमला में एक ढाबे पर काम करता है और साल में एक बार आता है, और दोनों उस रात की बात नहीं करते।