नीलेश छत पर लेटकर घंटों पक्षियों को देखता था। ख़ास तौर पर चीलों को, जो पंख हिलाए बिना बहुत देर तक हवा में टिकी रहती थीं। वह यह समझने की कोशिश करता था कि वे गिरती क्यों नहीं। गाँव वालों को लगता था कि लड़का निकम्मा है। नीलेश को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता था। उसके पास एक कॉपी थी जिसमें उसने पंखों के कोण बना रखे थे।
नीलेश का सपना गाँव में मज़ाक़ का विषय था। लोग कहते थे कि लड़का दिन भर आसमान देखता रहता है और खेत का काम नहीं करता। यह सच भी था। उसके पिता उसे दो बार खेत पर ले गए, और दोनों बार वह दोपहर में मेड़ पर लेटकर ऊपर देखता हुआ मिला। तीसरी बार वे उसे नहीं ले गए। नीलेश ने कॉपी में लिखना बंद नहीं किया। उसमें अब चीलों के अलावा गिद्ध थे, बगुले थे, और वह छोटी चिड़िया भी थी जो हवा में एक ही जगह रुकी रह जाती है। उसने यह भी लिख रखा था कि कौन सा पक्षी किस पहर उड़ता है। सुबह की हवा अलग होती है। दोपहर की अलग।
एक दिन, उसने सुनी एक अजीब सी कहानी एक पुराने यात्री से, जिसमें बताया गया था कि एक दूरस्थ पर्वत की चोटी पर एक जादुई पक्षी रहता है, जो किसी भी व्यक्ति को अपनी शक्तियों से उड़ने की क्षमता दे सकता है। यह कहानी नीलेश के दिल में गहरी छाप छोड़ गई, और उसने फैसला किया कि वह उस पर्वत की चोटी तक पहुँचेगा और उस जादुई पक्षी का सामना करेगा। इस कहानी ने उसे और भी प्रेरित किया कि यदि वह उस पक्षी से मिल सकता है, तो वह अपनी उड़ान को असलियत में बदल सकता है।
नदी पार करनी थी
नीलेश ने अपनी यात्रा शुरू की। चढ़ाई खड़ी थी और हवा लगातार सामने से आती रही। पहले दिन उसके जूते का तला उखड़ गया और उसने उसे रस्सी से बाँध लिया। दूसरे दिन वह फिसलकर एक ढलान पर काफ़ी नीचे तक गिरा। वह उठा और फिर चढ़ने लगा। उसकी आँखों में एक ही उद्देश्य था। उड़ान भरने की चाह। रात में वह अपनी कॉपी निकालकर उस दिन देखे हुए पक्षियों के कोण बनाता रहता, जब तक उँगलियाँ ठंड से अकड़ न जातीं।
कई दिनों की चढ़ाई के बाद नीलेश चोटी पर पहुँचा। हवा पतली थी। साँस छोटी पड़ती थी। एक चौड़े पत्थर पर वह पक्षी बैठा था। वह बड़ा था, बहुत बड़ा, और उसके पंख आधे खुले हुए थे, जैसे वह अभी-अभी कहीं से उतरा हो। नीलेश उसके सामने जाकर खड़ा हो गया। फिर उसने वही पूछा जो वह बरसों से पूछना चाहता था। क्या वह भी उड़ सकता है। पक्षी ने गरदन घुमाकर उसे देखा। उसकी आँख काली और गोल थी, और उसमें कोई हैरानी नहीं थी, जैसे यह सवाल उससे पहले भी कोई पूछ चुका हो।
पक्षी ने नीलेश की आँखों में देखा और कहा, "तुमने साहस और धैर्य से इस पर्वत की चोटी तक पहुँचने की यात्रा पूरी की है। अब तुम्हें अपनी इच्छाओं और सपनों की सच्चाई जाननी होगी। उड़ान भरने के लिए तुम्हें अपने भीतर की शक्ति को पहचानना होगा।" पक्षी ने नीलेश को अपने पंखों के बीच बैठने का इशारा किया। नीलेश समझ गया कि यह मौका केवल बाहरी ताकत को नहीं, बल्कि उसकी भीतरी ताकत को उजागर करने का था।
नीलेश पक्षी के पंखों के बीच बैठा। ज़मीन नीचे चली गई। पहली बात जो उसे महसूस हुई, वह ऊँचाई नहीं थी, हवा थी, जो नीचे से आकर उन्हें ऊपर धकेल रही थी। पक्षी ने पंख हिलाए ही नहीं। वह बस उन्हें फैलाए रहा और वे ऊपर उठते चले गए। नीलेश ने अपनी पीठ पर वह दबाव महसूस किया। नीचे गाँव एक हथेली जितना था। खेत, तालाब, और वह छत जिस पर वह बरसों से लेटा करता था।
फिर पक्षी ने उसे उतार दिया। नीलेश चोटी पर खड़ा था और आसमान ख़ाली था। उसने बहुत देर इंतज़ार किया। पक्षी वापस नहीं आया। नीचे उतरते हुए उसने एक बार हाथ फैलाकर देखे, फिर शर्मिंदा होकर नीचे कर लिए। गाँव पहुँचने में उसे छह दिन लगे। किसी ने नहीं पूछा कि वह कहाँ गया था। जो पूछते, उन्हें वह बताता भी क्या। उस रात वह फिर छत पर लेट गया। चीलें वैसे ही घूम रही थीं, वैसे ही बिना पंख हिलाए। पर अब वह जानता था कि हवा नीचे से उठती है, और चील पंख फैलाकर उसी उठती हवा पर टिकी रहती है। यह उसने ऊपर बैठकर अपनी पीठ पर महसूस किया था। उसने कॉपी निकाली और एक नया कोण बनाया। यह पहला कोण था जो उसने देखकर नहीं, जानकर बनाया था। अगली गर्मियों में गाँव का एक और लड़का अपनी छत पर लेटकर आसमान देखने लगा। लोग कहते थे कि वह भी निकम्मा है।