तेजा के दादा हर कहानी एक ही तरह ख़त्म करते थे: 'और वह ख़ज़ाना आज भी वहीं है।' बचपन में तेजा इसे कहानी का हिस्सा समझता था। बड़े होने पर उसने दादा का पुराना संदूक खोला। भीतर एक मुड़ा-तुड़ा नक्शा था, जिस पर उसी मठ का नाम लिखा था जिसका ज़िक्र हर कहानी में आता था। नक्शे के कोने पर दादा की लिखावट में एक तारीख़ थी। उनकी मौत से तीन दिन पहले की।

उन तीन दिनों के बारे में घर में किसी को कुछ याद नहीं था। दादी ने इतना बताया कि आख़िरी हफ़्ते में दादा ने दो बार बस अड्डे तक जाने की बात कही थी और दोनों बार लौट आए थे। दूसरी बार वे टिकट भी ले चुके थे। तीसरे दिन उन्हें दौरा पड़ा।

दुकान अब तेजा के बाप चलाते थे। अनाज की दुकान, चार पुश्तों पुरानी, और क़स्बे में उसका नाम था। लोग वहाँ इसलिए आते थे कि वहाँ तौल में गड़बड़ नहीं होती। यह बात लोग ख़ुद कहते थे, और बाप उसे सुनकर हँस देता था।

नक़्शा साफ़ था। बेतवा के उस पार, देवगढ़ की तरफ़, पहाड़ी पर बने मंदिरों के पीछे एक पुराना मठ है जो अब ढह चुका है। तेजा ने दुकान से चार दिन की छुट्टी ली, जो उस मौसम में लेना आसान नहीं था, क्योंकि बैसाख में गेहूँ की आवक चलती है। बाप ने पूछा कि जा कहाँ रहे हो। उसने कहा, घूमने।

बैसाख में बेतवा पतली हो जाती है और उसका पाट पत्थरों का मैदान बन जाता है। पानी बीच में एक धारी भर रह जाता है और बाकी सब गरम पत्थर होता है, जिस पर दोपहर में नंगे पैर नहीं चला जाता। तेजा ने वह पाट सुबह पार किया। उस तरफ़ से चढ़ाई शुरू होती है।

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चढ़ाई तीन घंटे की थी। रास्ता कहीं-कहीं ग़ायब हो जाता था। ऊपर कँटीली झाड़ी है और नीचे सीधी ढाल, और बीच में वे मंदिर हैं जिन्हें देखने साल में गिने-चुने लोग आते हैं। मठ उनसे भी आगे था। वहाँ कोई नहीं जाता, इसलिए नहीं कि डर है, बल्कि इसलिए कि वहाँ देखने को कुछ बचा नहीं है।

मठ की छत कब की गिर चुकी थी और अंदर एक पेड़ उग आया था। दीवारें कमर तक खड़ी थीं। तेजा ने नक़्शा खोलकर उसे दीवारों से मिलाया और तब उस पर खुला कि नक़्शा उस जगह का नहीं है। नक़्शा उस जगह के अंदर की एक जगह का था।

उत्तर वाली दीवार में ताखे बने थे, कुल नौ, और नक़्शे पर उनमें से एक पर निशान था, बाएँ से चौथा। तेजा वहाँ पहुँचा तो पाया कि उसमें ईंटें भरी हुई हैं और उन पर चूना पुता है। चूना बाकी दीवार से नया था। उसने पत्थर से उसे तोड़ा और इसमें उसे आधा घंटा लगा।

अंदर कपड़े में लिपटी कोई चीज़ थी। कपड़ा गल चुका था। हाथ लगाते ही झड़ गया। भीतर पीतल के बाट रखे थे। आठ बाट। अलग-अलग नाप के। हर एक पर सरकारी मुहर लगी हुई।

तेजा ने उन्हें हथेली पर तौलकर देखा, और तभी बात समझ में आ गई। एक किलो का बाट एक किलो का नहीं था। वह हल्का था, इतना हल्का कि हाथ में लेते ही पता चल जाए। बाकी सातों भी वैसे ही थे। मुहर असली थी। बाट नहीं।

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चार पुश्तों की दुकान का नाम इन्हीं आठ टुकड़ों पर खड़ा था। हर बोरी में थोड़ा कम, हर ग्राहक के साथ थोड़ा कम, इतना कम कि किसी को कभी शक न हो। तेजा वहीं दीवार से टिककर बैठ गया और शाम तक बैठा रहा। ऊपर से बेतवा का पूरा पाट दिखता है, और शाम को उस पर पत्थर सफ़ेद पड़ जाते हैं।

अब उसे उन तीन दिनों की समझ आई। दादा दो बार बस अड्डे तक गए थे। वे इन्हें वापस लाने नहीं जा रहे थे, क्योंकि लाने की कोई ज़रूरत नहीं थी। वे इन्हें कहीं और, किसी और के सामने रखने जा रहे थे। तीसरे दिन वह मौक़ा उनके हाथ से निकल गया।

नीचे उतरते हुए तेजा के पास चार दिन में से डेढ़ बचा था। उसके पास रास्ते तीन थे और तीनों उसने गिने। बाट वहीं छोड़ देना। घर लाकर बाप के सामने रख देना। या तीसरा।

क़स्बे लौटकर वह सीधे दुकान नहीं गया। वह बाट-माप वाले दफ़्तर गया, जहाँ साल में एक बार दुकानों के बाट जँचवाने पड़ते हैं, और वहाँ से उसने नए बाट ख़रीदे, पूरे आठ, और उन पर उसी साल की मुहर लगवाई। पैसा उसने अपनी उस जमा-पूँजी से दिया जो शादी के लिए रखी थी।

रात में दुकान बंद होने के बाद उसने पुराने बाट तराज़ू के पास से उठाए और नए वहाँ रख दिए। पुराने वाले उसने दादा के उसी संदूक में रख दिए, ठीक उसी जगह जहाँ नक़्शा रखा हुआ था, और संदूक बंद कर दिया।

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बाप ने कभी नहीं पूछा। हो सकता है उसका ध्यान ही न गया हो, क्योंकि बाट देखने में एक जैसे होते हैं। यह भी हो सकता है कि ध्यान गया हो और पूछने की हिम्मत न पड़ी हो। तेजा ने भी कभी बात नहीं छेड़ी।

फ़र्क़ सिर्फ़ एक पड़ा, और वह गिनने में आ जाने वाला था। उस साल दुकान का मुनाफ़ा पिछले बरस से कम रहा। इतना कम कि बाप ने बहीखाता दो बार दोबारा जोड़ा। तेजा दोनों बार उसके सामने बैठा रहा और उसे जोड़ते हुए देखता रहा, और दोनों बार हिसाब सही निकला।