अकबरी को सर्दी से डर नहीं लगता था। ठंडी हवा से लगता था। यह फ़र्क़ उसे समझाना मुश्किल पड़ता था। धूप में वह घंटों बैठ सकती थी, चाहे कितनी भी ठंड हो। पर जैसे ही हवा चलती और गर्दन के पीछे से भीतर घुसती, वह सब छोड़कर भीतर भाग जाती और चादर में लिपट जाती। घर में सबसे मोटी चादर उसी की थी।

माँ ने कहा कि ऐसी कोई चादर नहीं होती।

यह सही जवाब था और अकबरी को यह पसंद नहीं आया। उसने वह बात पूरे दिन अपने पास रखी।

घर में उसे चादर से चिढ़ थी और इसकी वजह भी थी। मोटी चादर भारी होती है और उसमें हाथ फँसे रहते हैं। ओढ़कर खेला नहीं जाता। पानी नहीं पिया जाता, क्योंकि दोनों हाथ उसे पकड़ने में लगे रहते हैं। और उसे उतारते ही ठंड पहले से ज़्यादा लगती है, जो सबसे ख़राब हिस्सा है।

माँ ने हँसकर मना कर दिया। पर अकबरी ने ज़िद नहीं छोड़ी। वह पूरे दिन यही सोचती रही। दोपहर तक एक बात समझ आ गई। चादर बनाई नहीं जा सकती। पर धूप में बैठा तो जा सकता है। यह अलग बात थी, और शायद इसीलिए किसी ने उसे बताई नहीं थी।

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पहले हफ़्ते उसने बस बैठकर देखा। धूप एक जैसी नहीं रहती। सुबह वह लंबी और तिरछी आती है और उसमें गरमी कम होती है। दोपहर में वह सीधी ऊपर से पड़ती है और तब सबसे तेज़ होती है, पर तब हवा भी सबसे तेज़ चलती है।

दूसरे हफ़्ते उसने वह पकड़ा जो असल बात थी।

वह ऐसे हुआ। एक दोपहर वह आम के पेड़ के नीचे बैठी थी और वहाँ धूप छनकर आ रही थी, यानी कम थी, और उसे ठंड नहीं लग रही थी। उसी दिन शाम को वह छत पर गई, जहाँ धूप पूरी थी, और वहाँ उसे ठंड लगी। छत पर हवा थी। पेड़ के नीचे नहीं थी।

धूप से गरमी मिलती है। पर ठंड धूप की कमी से नहीं लगती। ठंड हवा से लगती है, और हवा को रोका जा सकता है।

यह उसने अपने आप निकाला और उसे इसके लिए शब्द नहीं मिले। जो उसने किया वह यह था कि उसने ऐसी जगहें ढूँढ़नी शुरू कीं जहाँ धूप हो और हवा न हो।

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अगले हफ़्तों में उसने बगीचे की जगहें छाँटनी शुरू कीं। दीवार के पास सुबह नौ बजे तक धूप रहती। आम के पेड़ के नीचे दोपहर में। पश्चिम वाला कोना शाम चार बजे सबसे गरम होता। उसने ये सब बातें एक कागज़ पर लिख लीं और उसे अपनी किताब में रख दिया। माँ ने वह कागज़ बाद में देखा और कुछ नहीं बोला।

उस काग़ज़ पर आठ जगहें थीं और हर जगह के आगे समय लिखा था। लिखावट टेढ़ी थी और आधे अक्षर उल्टे थे, क्योंकि अकबरी दूसरी में थी।

काग़ज़ बनाने में उसे एक महीना लगा और उसमें सबसे मुश्किल समय लिखना था, क्योंकि घड़ी घर में एक ही थी और वह भीतर वाले कमरे में टँगी थी। इसलिए अकबरी ने समय अपने तरीक़े से लिखा। स्कूल से आने के बाद। भैंस के दुहने से पहले। जब परछाईं आम के पेड़ तक पहुँच जाए।

सबसे अच्छी जगह पश्चिम वाला कोना निकला।

उससे पहले उसने तीन और जगहें आज़माई थीं। दरवाज़े के पास वाली जगह अच्छी लगी थी और वहाँ दोपहर तक धूप रहती थी, पर वहाँ से लोग आते-जाते हैं। भैंस वाले छप्पर के पीछे हवा बिलकुल नहीं आती थी, और वहाँ बदबू आती थी। तीसरी जगह अच्छी थी और वह पड़ोस के घर की थी।

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वहाँ दो दीवारें कोना बनाती हैं और उनके बीच शाम की धूप भरकर रुक जाती है, और हवा दोनों दीवारों से टकराकर ऊपर से निकल जाती है। यह अकबरी को समझ नहीं आया। उसे बस इतना दिखा कि वहाँ बैठने पर गर्दन के पीछे कुछ नहीं आता।

जाड़ों के बीच में एक कबूतर बग़ीचे में उतरा और उठ नहीं पाया। उसका एक पंख टूटा हुआ था।

अकबरी उसे उठाकर पश्चिम वाले कोने में ले गई और वहाँ ज़मीन पर रख दिया।

उसने उसे उठाकर गोद में नहीं रखा। यह भी उसकी अपनी सोची हुई बात थी। उसने पिछले बरस एक चूज़े को गोद में रखा था और वह मर गया था, और माँ ने कहा था कि उसे डर से मरना कहते हैं।

कबूतर वहाँ दो दिन रहा। तीसरे दिन वह उड़ गया।

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दो दिन में अकबरी ने उसके लिए एक और काम किया। उसने कोने में एक तरफ़ टूटी बाल्टी रख दी, ताकि जिधर से थोड़ी हवा आती थी उधर से भी रुक जाए। यह उसने पहले अपने लिए किया था, दो हफ़्ते पहले, और उस दिन माँ ने बाल्टी उठाकर वापस रख दी थी।

इस बार माँ ने उसे नहीं उठाया।

कबूतर उड़ गया। अकबरी वहीं बैठी रही। उसे एक बात समझ आ रही थी। शब्द नहीं मिल रहे थे। सर्दी वहीं थी। हवा भी वहीं थी। कुछ नहीं बदला था। बस जगह बदल गई थी।

उस जाड़े के बाद उसने वह काग़ज़ किताब में से निकालकर दीवार पर चिपका दिया, जहाँ सबको दिखे। किसी ने उसे पढ़ा नहीं, क्योंकि घर में और भी काम होते हैं।

उस साल की आख़िरी सर्दी में अकबरी ने अपनी मोटी चादर छोटी बहन को दे दी। बहन ने पूछा कि उसे अब ठंड नहीं लगती क्या। अकबरी ने कहा कि लगती है। फिर उसने बहन का हाथ पकड़ा और उसे बगीचे के पश्चिम वाले कोने में ले गई, जहाँ शाम चार बजे सबसे ज़्यादा धूप आती थी।