आँधी दोपहर में आई और आधे घंटे चली। उसके बाद आँगन में अमरूद के पेड़ के नीचे बहुत सारे पत्ते बिखरे थे और उन्हीं के बीच घोंसला पड़ा था। गौरा ने उसे बरामदे से देखा और वह दौड़कर आँगन में गई।

घोंसला उलटा नहीं था। वह सीधा गिरा था और उसमें तीन बच्चे थे।

बुलबुल के बच्चे तब तक ऐसे दिखते हैं जैसे वे अभी बने ही न हों। उन पर पंख नहीं होते, बस हल्का सा भूरा रोआँ होता है, और उनकी आँखें बंद रहती हैं। तीनों ज़िंदा थे, यह उसने पास जाकर देखा। वे हिल रहे थे और मुँह खोल रहे थे।

गौरा नौ बरस की थी।

उस अमरूद के पेड़ पर बुलबुल हर बरस घोंसला बनाती थी और गौरा को यह मालूम था कि वह कहाँ बनाती है। मार्च के आसपास वह घास के तिनके लाने लगती है और उसमें उसे आठ-दस दिन लगते हैं। यह देखना गौरा के लिए हर बरस की सबसे अच्छी चीज़ों में से एक था और वह उसे नीचे से देखती रहती थी, बिना ऊपर चढ़े।

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उसने पहले उन्हें छुआ नहीं। यह उसे उसकी दादी ने बताया था, कि चिड़िया के बच्चे को हाथ लगाओ तो माँ छोड़ देती है।

बाद में उसे यह पता चला कि यह पूरी तरह सही नहीं है, पर उस दिन उसने यही माना और उसने घोंसले को नीचे से, दोनों हाथों से उठाया, बच्चों को छुए बिना।

पहली कोशिश उसने सीधी की।

उसने घोंसला उसी जगह रखने की कोशिश की जहाँ से वह गिरा था। वह जगह दो शाखाओं के बीच का कोना थी और वह ज़मीन से लगभग आठ फ़ुट ऊपर थी। वह चढ़ी और उसने उसे वहाँ रख दिया। वह नीचे उतरी और दस मिनट में हवा का एक झोंका आया और घोंसला फिर गिर गया।

यह इसलिए हुआ कि घोंसला अपनी जगह चिपका हुआ नहीं था। बुलबुल उसे बनाते वक़्त तिनके शाखा के चारों तरफ़ लपेटती है और वह धीरे-धीरे उससे जुड़ जाता है। एक बार टूट जाने के बाद उसे वापस रखने से वह सिर्फ़ रखा हुआ रहता है, जुड़ा हुआ नहीं, और थोड़ी सी हवा उसे हिला देती है।

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इस बार एक बच्चा बाहर आ गया और उसे गौरा ने पत्ते से उठाकर वापस रखा। दूसरी कोशिश उसने बाँधकर की। उसने घर से सुतली ली और घोंसले के नीचे से लपेटकर उसे शाखा से बाँध दिया। सुतली घोंसले में धँस गई।

बुलबुल का घोंसला घास और पतली टहनियों से बना होता है और वह हाथ के दबाव से ही दब जाता है। बाँधने पर वह एक तरफ़ को टेढ़ा हो गया और उसका किनारा खुल गया।

गौरा ने सुतली खोल दी।

अब उसके सामने दो बातें थीं। घोंसला अपने आप टिकता नहीं था, और उसे बाँधा नहीं जा सकता था।

इस बीच बुलबुल दो बार आ चुकी थी। वह ऊपर वाली शाखा पर बैठकर नीचे देखती और फिर उड़ जाती। वह घोंसले तक नहीं आ रही थी, और गौरा को यह डर लगा कि शायद वह छोड़ चुकी है। बाद में उसे समझ आया कि वह इसलिए नहीं आ रही थी क्योंकि गौरा वहीं खड़ी थी।

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तीसरी कोशिश में उसने घोंसला छुआ ही नहीं। उसने रसोई से एक छोटी टोकरी ली, जिसमें प्याज़ रखा जाता था और जो प्लास्टिक की थी और जिसमें जाली वाले छेद थे। उसने पूरा घोंसला, जैसा था वैसा, उस टोकरी में रख दिया।

फिर उसने माँ की पुरानी साड़ी की तीन पट्टियाँ फाड़ीं और टोकरी को उन्हीं से शाखा के कोने में बाँधा, तीन जगह से। कपड़े की पट्टी सुतली की तरह धँसती नहीं, क्योंकि वह चौड़ी होती है।

टोकरी बाँधते वक़्त उसने एक बात का और ध्यान रखा। उसने उसे उसी कोने में बाँधा जहाँ से घोंसला गिरा था, न कि किसी और आसान जगह पर, क्योंकि चिड़िया अपनी जगह से पहचानती है। और उसने उसे इतना ऊपर रखा कि वह ज़मीन से आठ फ़ुट पर ही रहे, वैसे ही जैसे पहले था।

टोकरी अपनी जगह टिक गई और उसके भीतर घोंसला वैसा का वैसा रहा। फिर गौरा ने वह किया जो सबसे मुश्किल था। वह वहाँ से हट गई, जो सबसे मुश्किल हिस्सा था। वह बरामदे में जाकर बैठ गई, पेड़ से लगभग तीस क़दम दूर, और उसने वहीं से देखा।

बुलबुल पहले पंद्रह मिनट नहीं आई। गौरा को दो बार लगा कि उठकर देख आए और दोनों बार वह बैठी रही। बीस मिनट बाद बुलबुल आई। वह पहले सामने वाली मुंडेर पर बैठी, फिर पेड़ की ऊपरी शाखा पर, फिर नीचे उतरकर टोकरी के किनारे पर।

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फिर वह भीतर उतर गई। तीनों बच्चे उड़ने लायक़ लगभग दो हफ़्ते में हुए और तीनों उड़ गए।

उन दो हफ़्तों में गौरा रोज़ बरामदे से देखती रही और उसने उस टोकरी को दोबारा नहीं छुआ। बुलबुल दिन में कई बार आती थी और हर बार उसकी चोंच में कुछ होता था। आख़िरी तीन-चार दिन में बच्चों के सिर टोकरी के किनारे से ऊपर दिखने लगे थे।

टोकरी वहीं बँधी रह गई।

अगली बरसात में उसमें फिर घोंसला बना, और वह उसी बुलबुल का था या किसी और का, यह गौरा को कभी पता नहीं चला।