बकरी का नाम धूमा था और वह भूरी थी, कान लंबे, और एक सींग दूसरे से छोटा।
उसका दाहिना सींग छोटा इसलिए था कि वह बचपन में कहीं फँस गया था और आधा टूट गया था। इससे उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था और गाँव में उसे इसी से पहचाना जाता था। दूध वह ज़्यादा नहीं देती थी, पर उसके दो बच्चे हर बरस होते थे और उन्हीं से घर का काम चलता था।
फुद्दन आठ बरस का था और धूमा को चराने ले जाना उसी का काम था। घर की सीढ़ियाँ बाहर की तरफ़ से चढ़ती थीं, जैसी गाँव के घरों में होती हैं। न रेलिंग, न दरवाज़ा। सीधे छत पर।
उस दोपहर फुद्दन पानी पीने भीतर गया। वह दो मिनट में लौट आया, इतनी देर में जितनी देर में एक लोटा पानी पिया जाता है। धूमा नीचे नहीं थी। वह ऊपर थी। छत पर। बीच में खड़ी। और वह नीचे देख रही थी, जैसे उसे भी हैरत हो रही हो।
छत पक्की नहीं थी। उस पर मिट्टी और भूसे का लेप था, जो हर बरसात से पहले चढ़ाया जाता था, और उस पर चलने से पैरों के निशान बन जाते थे। धूमा के खुरों के निशान सीढ़ी से लेकर बीच तक बने हुए थे और वे साफ़ दिख रहे थे, इसलिए इसमें कोई शक नहीं था कि वह ख़ुद चढ़ी थी।
बकरियाँ चढ़ जाती हैं और यह बात गाँव में सब जानते हैं। जो बात कम लोग जानते हैं वह यह है कि चढ़ने के बाद वे उतरना पसंद नहीं करतीं, क्योंकि उतरते वक़्त उन्हें नीचे देखना पड़ता है। फुद्दन सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर गया और छत के बीच तक चलकर धूमा के सामने जा खड़ा हुआ।
पहली कोशिश उसने उसी रस्सी से की जो धूमा के गले में बँधी रहती थी। धूमा के गले में रस्सी बँधी थी। उसने उसका सिरा पकड़ा और खींचा। धूमा ने चारों पैर जमा लिए।
बकरी छोटी होती है पर जब वह पैर जमा ले तो आठ बरस का लड़का उसे हिला नहीं सकता। फुद्दन ने दोनों हाथ लगाए और अपनी एड़ी जमाई और खींचा।
धूमा एक इंच नहीं हिली और उसने अपने अगले दोनों पैर और आगे कर लिए। उसने बस अपना सिर नीचे कर लिया, जो बकरियाँ तब करती हैं जब वे तय कर लेती हैं। दूसरी कोशिश में उसने खींचना छोड़कर धकेलना शुरू किया, यह सोचकर कि शायद पीछे से ज़ोर लगाने पर वह चल पड़े।
वह उसके पीछे गया और उसने उसे सीढ़ी की तरफ़ धकेला। धूमा अपनी जगह घूम गई और उसका मुँह फिर छत के बीच की तरफ़ हो गया। उसने फिर धकेला। धूमा फिर घूम गई। तीसरी बार धूमा ने उसे सिर से हल्का सा ठेल दिया और फुद्दन छत पर बैठ गया।
उसे ग़ुस्सा नहीं आया। उसे यह मज़ेदार लगा और वह हँस पड़ा, और उसकी हँसी सुनकर धूमा ने कान हिलाए।
तीसरी कोशिश उसने पत्तों से की।
नीम के पत्ते बकरियों को बहुत पसंद होते हैं और यह फुद्दन को पहले दिन से मालूम था, क्योंकि चराने ले जाते वक़्त धूमा हर नीम के नीचे रुक जाती थी। पत्ते तोड़ने के लिए उसे नीचे उतरकर, दीवार पर चढ़कर, टहनी झुकानी पड़ी, और इसमें उसे दस मिनट लगे।
नीचे नीम का पेड़ था। उसने कुछ पत्तियाँ तोड़ीं और उन्हें छत पर लाकर धूमा के सामने रखा। धूमा ने वे पत्तियाँ चट कर लीं और उसके बाद उसने फुद्दन के हाथ सूँघे कि और हैं या नहीं। उसने अगली मुट्ठी सीढ़ी के पहले पत्थर पर रखी।
धूमा वहाँ तक आई और खा लीं। उसने अगली मुट्ठी दूसरी सीढ़ी पर रखी। धूमा ने वहाँ से नीचे देखा और लौट गई।
यह सबसे मुश्किल हिस्सा था। धूमा को पत्ते चाहिए थे और वह नीचे नहीं जाना चाहती थी, और उसने दूसरा रास्ता चुन लिया, यानी वह वापस छत पर आ गई। फुद्दन नीचे उतरा और वहीं बैठ गया। उसने ऊपर देखा।
और तब उसे वह बात याद आई जो सबको मालूम थी और जो किसी को याद नहीं थी। धूमा का बच्चा। दस दिन का। जो नीचे बाड़े में बँधा था। फुद्दन बाड़े में गया, बच्चे को गोद में उठाया, और उसे सीढ़ी के नीचे लाकर खड़ा हो गया।
दस दिन का बकरी का बच्चा गोद में उठाने पर बिल्ली से थोड़ा ही भारी लगता है और वह पूरे रास्ते हाथ-पैर चलाता रहता है। फुद्दन ने उसे दोनों हाथों से पेट के नीचे से पकड़ा हुआ था और उसका मुँह ऊपर की तरफ़ था, छत की तरफ़।
बच्चे ने नीचे से आवाज़ लगाई, वैसी ही पतली आवाज़ जैसी दस दिन के बच्चे की होती है। छत पर धूमा किनारे तक आई। बच्चा फिर मिमियाया। धूमा सीढ़ियों पर आई, रुकी, और फिर एक-एक करके उतरी। पूरे चौदह पत्थर। नीचे आकर उसने पहले बच्चे को सूँघा और फिर फुद्दन को।
फुद्दन ने रस्सी उठाई और दोनों को बाड़े में बाँध दिया। शाम को उसके बाबा घर लौटे और उन्होंने कुछ नहीं पूछा, क्योंकि उन्हें इस पूरे मामले की कोई ख़बर ही नहीं थी, और फुद्दन ने भी नहीं बताया।
उस दिन के बाद फुद्दन ने सीढ़ी के नीचे एक टूटी हुई खाट टिकाकर रख दी, तिरछी, जिससे बकरी ऊपर न जा सके। वह खाट अब भी वहीं टिकी है और उसे कोई हटाता नहीं, और घर में जो लोग बाद में आए उन्हें यह नहीं मालूम कि वह वहाँ क्यों है।